हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, बग़दाद के इमाम-ए-जुमा आयतुल्लाह सय्यद यासीन अल-मूसवी ने शुक्रवार के ख़ुत्बे के दौरान कहा कि सत्य के सामने चुप रहना अब न तो शरीअत की दृष्टि से और न ही नैतिक रूप से उचित है। वर्तमान परिस्थितियों में उलेमा, बुद्धिजीवियों और आम जनता सभी पर यह ज़िम्मेदारी है कि वे सत्य का साथ दें और अत्याचार तथा साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाएँ।
उन्होंने कहा कि शहीद रहबर (र) की करोड़ों लोगों की अंतिम यात्रा केवल एक शोक समारोह नहीं थी, बल्कि उसने इराक़ की सरकार के लिए भी एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया। इस विशाल जनसमूह ने यह सिद्ध कर दिया कि इराक़ की जनता किसी भी विदेशी प्रभाव और बाहरी हस्तक्षेप को अस्वीकार करती है तथा उन नेताओं के प्रति निष्ठावान है जो अपनी जनता, अपने सिद्धांतों और अपने पवित्र मूल्यों के लिए बलिदान देते हैं।
बग़दाद के इमाम-ए-जुमा ने कहा कि इराक़ की जनता ने इस ऐतिहासिक अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में भाग लेकर यह साबित कर दिया कि वह प्रतिरोध के मार्ग, स्वतंत्रता, सम्मान और इस्लामी मूल्यों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।
उन्होंने आगे कहा कि जनता की इस विशाल उपस्थिति को केवल एक धार्मिक सभा के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह इराक़ की राजनीतिक समझ और जनचेतना की भी सशक्त अभिव्यक्ति थी।
आयतुल्लाह अल-मूसवी ने कहा कि आज इस्लामी उम्मत को पहले से कहीं अधिक एकता, दूरदर्शिता और दृढ़ता की आवश्यकता है, और ऐसे संवेदनशील समय में सत्य का समर्थन करना तथा असत्य का विरोध करना हर ईमान वाले व्यक्ति का कर्तव्य है।
आपकी टिप्पणी