हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मौलाना सैयद अली सज्जीर रिज़वी ने शिया ईदगाह हुसैनाबाद, झारखंड में नमाज़-ए-जुमा के खुत्बे में “तमाम बंद रास्तों से निजात का रास्ता” विषय पर बयान किया। उन्होंने क़ुरआन की आयतों और अहादीस-ए-मासूमीन (अ.स.) की रोशनी में मुश्किल हालात, परेशानियों और बंद रास्तों से निकलने के लिए तक़वा और अल्लाह पर तवक्कुल की अहमियत पर प्रकाश डाला।
उन्होंने सूरह अनफ़ाल और सूरह तलाक़ की आयतों का हवाला देते हुए कहा कि जब इंसान अल्लाह की हिदायतों पर अमल करते हुए तक़वा अपनाता है और अपनी शरई ज़िम्मेदारियों पर डटा रहता है, तो अल्लाह उसके लिए निजात की राहें पैदा कर देता है। रसूले अकरम (स.ल..) की शिक्षाओं की रोशनी में क़ुरआन की इन हिदायतों पर अमल को मुश्किलों और बंद रास्तों से निकलने का प्रभावी ज़रिया बताया गया है।
मौलाना सैयद अली सज्जीर रिज़वी ने कहा कि इंसान और समाज की ज़िंदगी में आने वाले कुछ ज़ाहिरी बंद रास्ते वास्तव में परीक्षा का हिस्सा होते हैं। ऐसे हालात में डर, दबाव या मुश्किलों की वजह से अपनी शरई ज़िम्मेदारी से पीछे हटने के बजाय तक़वा और साबित-क़दमी अपनाना ज़रूरी है, क्योंकि यही रवैया अल्लाह की मदद के दरवाज़े खोलने का कारण बनता है।
उन्होंने कहा कि जब इंसान दुश्मन के दबाव या प्रतिकूल परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना अपनी इलाही ज़िम्मेदारी निभाता है, तो अल्लाह उसके लिए ऐसे ज़रियों से मदद और रिज़्क़ का इंतज़ाम करता है, जिनका उसे पहले से अंदाज़ा भी नहीं होता।
ख़तीब-ए-जुमआ ने हज़रत मूसा (अ.स.) और हज़रत यूसुफ़ (अ ल.) के वाक़िआत को क़ुरआनी उदाहरण के रूप में पेश करते हुए कहा कि हज़रत मूसा (अ.स. के सामने दरिया और पीछे फ़िरऔन का लश्कर था, लेकिन अल्लाह पर भरोसे और साबित-क़दमी के परिणामस्वरूप दरिया में रास्ता पैदा हो गया।
इसी तरह हज़रत यूसुफ़ (अ.स.) ने गुनाह से परहेज़ और तक़वा अपनाया, तो मुश्किलों के बावजूद आख़िरकार हक़ीक़त सामने आई और उनकी बेगुनाही साबित हुई।
उन्होंने तवक्कुल के वास्तविक अर्थ की व्याख्या करते हुए कहा कि तवक्कुल का मतलब अपनी ज़िम्मेदारियों से हाथ खींचकर हर मामला अल्लाह के हवाले कर देना नहीं है, बल्कि इंसान अपनी बंदगी और शरई ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह निभाए और अल्लाह के फ़ैसले पर भरोसा रखे।
मौलाना ने कहा कि मुश्किलों और मानसिक दबाव के दौरान अल्लाह की याद इंसान को देती है और उसे केवल ज़ाहिरी साधनों तक सीमित रहने के बजाय अल्लाह पर भरोसा रखते हुए सही फ़ैसला करने की क्षमता प्रदान करती है। उनके अनुसार, यही स्थिति इंसान को साधनों की गुलामी और शैतानी वसवसों से निजात दिलाती है।
अपने बयान के अंत में उन्होंने मौजूदा वैश्विक हालात का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया के मज़लूमों, विशेष रूप से यमन और ईरान की स्थिरता और लोकप्रियता को तक़वा और तवक्कुल अलल्लाह के व्यावहारिक परिणामों के रूप में देखा जा सकता है। उनके अनुसार, जब कोई क़ौम दुश्मन के दबाव और ज़ाहिरी साधनों की सीमाओं से भयभीत हुए बिना अल्लाह पर भरोसा करते हुए अपने मौक़िफ़ पर क़ायम रहती है, तो अल्लाह की मदद के रास्ते खुल सकते हैं।
अंत में आलम ए इस्लाम के मज़लूमों और मुजाहिदीन की सलामती, उम्मत ए मुस्लिमा की सरबुलंदी और दुश्मनाने-इस्लाम की तबाही के लिए दुआ की गई।
आपकी टिप्पणी