हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन नासिर रफ़ीई ने हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी (अ.) की विलादत के अवसर पर अपने भाषण में उनके धार्मिक, शैक्षिक और आध्यात्मिक स्थान पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि हज़रत अब्दुल अज़ीम (अ.) अहलेबैत (अ.) के अत्यंत आज्ञाकारी और विलायत के प्रति समर्पित व्यक्तित्व थे। उन्होंने इमाम रज़ा (अ.), इमाम जवाद (अ.) और इमाम हादी (अ.) के समय को देखा तथा उनसे धार्मिक ज्ञान प्राप्त किया।
उन्होंने बताया कि इमाम हादी (अ.) हज़रत अब्दुल अज़ीम (अ.) के उच्च स्थान से परिचित थे। एक रिवायत में इमाम हादी (अ.) ने इमाम हुसैन (अ.) की ज़ियारत से लौटे एक व्यक्ति को रई में हज़रत अब्दुल अज़ीम (अ.) की ज़ियारत करने की सलाह दी। एक अन्य रिवायत में इमाम ने अबू हम्माद रज़ी को निर्देश दिया कि यदि रई में किसी धार्मिक मसले को समझने में कठिनाई हो तो हज़रत अब्दुल अज़ीम (अ.) से संपर्क करें। इससे उनके उच्च इल्मी और धार्मिक स्थान का पता चलता है।
हुज्जतुल-इस्लाम रफ़ीई ने ‘हदीस-ए-अर्ज़-ए-दीन’ का उल्लेख करते हुए कहा कि हज़रत अब्दुल अज़ीम (अ.) ने इमाम हादी (अ.) के सामने तौहीद, नुबूवत, इमामत, क़यामत और अन्य धार्मिक सिद्धांतों के बारे में अपने विश्वास प्रस्तुत किए। इमाम ने उनके विश्वासों की पुष्टि की और उनके लिए दुआ की।
उन्होंने कहा कि हज़रत अब्दुल अज़ीम (अ.) मुहद्दिस, मुफस्सिर और विद्वान थे तथा उन्होंने सौ से अधिक रिवायतें यादगार के रूप में छोड़ीं। अहलेबैत (अ.) की शिक्षाओं को शियाओं तक पहुंचाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजनीतिक परिस्थितियों और बनी अब्बास की सरकार की निगरानी के कारण उन्होंने इराक़ से रई की ओर हिजरत की और वहां अपनी धार्मिक तथा शैक्षिक गतिविधियां जारी रखीं।
भाषण के दूसरे हिस्से में उन्होंने सूरह आले-इमरान की आयतों का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी इलाही पैग़म्बरों की दावत के मूल सिद्धांत समान रहे हैं। तौहीद, क़यामत, न्याय, अच्छे अख़लाक़ तथा अत्याचार और ताग़ूत से दूरी सभी पैग़म्बरों की शिक्षाओं का हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि कुछ लोग पैग़म्बरे इस्लाम (स.) को पहचानने और उनकी निशानियां अपनी किताबों में देखने के बावजूद पूर्वाग्रह, हठ, लालच, मन की इच्छाओं और अंधी नकल के कारण सत्य को स्वीकार नहीं कर सके। इसलिए आज भी इंसान को पूर्वाग्रह और हठ से बचना चाहिए।
अंत में उन्होंने ‘250 साल के इंसान’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग परिस्थितियों के बावजूद सभी इमाम (अ.) एक ही सत्य, मार्ग और मूल उद्देश्यों के लिए कार्य करते रहे।
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