बुधवार 2 सितंबर 2026 - 18:05
शहादत की भावना और दृढ़ता के साथ ईरानी जनता अमेरिका के सामने विजयी है: अब्दुर्रहमान आरिफ़ी

मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी में सिस्तान और बलूचिस्तान के प्रतिनिधि ने ईरानी राष्ट्र की जीत में शहादत की संस्कृति और दृढ़ता की भूमिका पर ज़ोर देते हुए कहा कि जो राष्ट्र दुनिया की मोह-माया से दूर होकर इस्लाम और अपने आदर्शों की रक्षा के लिए बलिदान देने को तैयार रहता है, उसे पराजित नहीं किया जा सकता।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी में सिस्तान और बलूचिस्तान के प्रतिनिधि अब्दुर्रहमान आरिफ़ी ने कहा है कि जो राष्ट्र दुनिया की मोह-माया से दूर रहकर इस्लाम और अपने आदर्शों की रक्षा के लिए बलिदान देने को तैयार रहता है, उसे पराजित नहीं किया जा सकता। उन्होंने ईरानी राष्ट्र की सफलता का मुख्य कारण उसकी शहादत की भावना, दृढ़ता और दुनिया से बेनियाज़ी को बताया।

टेलीविजन कार्यक्रम ‘आफ़ताब-ए-शर्क़ी’ में बोलते हुए आरिफ़ी ने मुसलमानों से गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करने का आह्वान किया। उन्होंने पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स) की उस शिक्षा का उल्लेख किया, जिसमें पड़ोसी के भूखे रहने की स्थिति में स्वयं पेट भरकर खाने वाले व्यक्ति को सच्चा मुसलमान नहीं बताया गया है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों ने आज पैगंबर (स) की कई शिक्षाओं को भुला दिया है।

ग़ज़्ज़ा की स्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका और इस्राइली शासन के हमलों में ग़ज़्ज़ा के लोगों को नरसंहार, भूख और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जबकि इस्लामी दुनिया के पास पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं। उनके अनुसार, ग़ज़्ज़ा की जनता पूरे इस्लामी जगत की रक्षा कर रही थी और ईरान का नेतृत्व, सेना तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स भी पूरी इस्लामी उम्मत के रक्षक हैं। उन्होंने कहा कि बैतुल मुक़द्दस केवल फिलिस्तीनियों का नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी जगत का पहला क़िबला है।

आरिफ़ी ने मुसलमानों के बीच बिखराव और भय को बड़ी कमजोरी बताते हुए कहा कि दुनिया की मोहब्बत और मौत का डर इंसान को संघर्ष और सफलता से दूर कर देता है। उन्होंने कहा कि दुनिया की मोहब्बत अनेक गुनाहों और समस्याओं की जड़ है, जबकि ईरानी राष्ट्र ने इस मोह-माया से दूरी बनाकर शहादत और बलिदान की संस्कृति को अपनाया है। इसी कारण वह दुश्मनों के सामने मजबूती से खड़ा है।

उन्होंने शहीद कमांडर हाज क़ासिम सुलेमानी को याद करते हुए कहा कि ईरान के सैनिक, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और बसीज के अनेक सदस्य शहादत को अपना लक्ष्य मानते हैं। उनके अनुसार, शहादत की भावना रखने वाला और दुनिया से बेनियाज़ राष्ट्र ही वास्तविक रूप से विजयी हो सकता है।

आरिफ़ी ने कहा कि इस्लामी देशों को जिहाद से भयभीत नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, जिहाद क़यामत तक जारी रहेगा और दुश्मन इसी भावना से भयभीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर कुरआन की जिहाद से संबंधित आयतों को शिक्षा से हटाने की कोशिश की जा रही है, ताकि नई पीढ़ी के भीतर संघर्ष और प्रतिरोध की भावना पैदा न हो।

उन्होंने मुसलमानों से आरामतलबी छोड़कर इस्लाम के लिए त्याग और बलिदान की भावना अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि इस्लामी देशों के पास तेल, गैस, इस्पात, तांबा और अन्य महत्वपूर्ण संसाधन मौजूद हैं और उन्हें अपनी क्षमताओं पर भरोसा करना चाहिए। उन्होंने अमेरिका से हथियार और सुरक्षा मांगने वाले देशों की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका पुराने हथियार देकर उनका इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करता है और उनके संसाधनों पर भी कब्जा करता है।

आरिफ़ी ने अंत में कहा कि यदि मुस्लिम राष्ट्र एकजुट होकर अपनी शक्ति और संसाधनों का इस्तेमाल करें तथा भय को त्याग दें, तो वे अपने दुश्मनों के सामने मजबूती से खड़े हो सकते हैं।

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