रविवार 6 सितंबर 2026 - 17:37
नबी-ए-करीम (स) के सार्वभौमिक शांति, सौहार्द और मानवता के संदेश को फैलाने की जोरदार अपील!

पैगंबर हजरत मोहम्मद (स) के सार्वभौमिक मानवीय आदर्शों, शांति, सौहार्द, सहअस्तित्व और मानव कल्याण के संदेश को सामने रखकर आयोजित यह सम्मेलन कोलकाता के धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में विशेष महत्व रखता है। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य—मानवता के लिए रहमत, शांति के लिए एकता और आपसी सम्मान के आधार पर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व था।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार,  कोलकाता, ६ सितंबर:भारत की सांस्कृतिक राजधानी कोलकाता में आज ‘रहमतुल लिल आलमीन कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन किया गया। ‘नूरुल इस्लाम अकादमी’ और ‘तक्रीबे मजाहिब’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस्लामिक चिंतकों, उलेमा-ए-किराम, शिक्षाविदों, कवियों-साहित्यकारों और विभिन्न धर्मों व समुदायों की प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया।
यह गरिमामयी सम्मेलन मौलाली के 'स्वामी विवेकानंद ऑडिटोरियम' में आयोजित हुआ।
पैगंबर हजरत मोहम्मद (स) के सार्वभौमिक मानवीय आदर्शों, शांति, सौहार्द, सहअस्तित्व और मानव कल्याण के संदेश को सामने रखकर आयोजित यह सम्मेलन कोलकाता के धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में विशेष महत्व रखता है। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य—मानवता के लिए रहमत, शांति के लिए एकता और आपसी सम्मान के आधार पर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व था।
सम्मेलन को संबोधित करने वाले प्रमुख वक्ताओं में ‘तक्रीबे मजाहिब’ के सचिव हुज्जतुल इस्लाम मौलाना डॉ. सैयद मोहम्मद सादिक हुसैनी, ‘पूबर कलम’ अखबार के संपादक जनाब अहमद हसन इमरान, पीर-ए-तरीकत जनाब सैयद रशाद अली कादरी, प्रोफेसर रामचंद्र चंद्र करण-विद्यालंकार, फादर सैमुअल घोड़ोई, जनाब स्वरिन सिंह, जनाब नूर हसन शाह वारसी, मौलाना कामरुज जमान, मौलाना शाहिद निजामी, मौलाना तफजुल हुसैन मल्लिक, मौलाना मुनीर अब्बास, मौलाना सरवर गाजी, बंगाली अल्पसंख्यक संगठन के कार्यकारी सचिव मौलाना अब्दुर रऊफ, ‘नूरुल इस्लाम अकादमी’ के सचिव मौलाना डॉ. रिजवान इस्लाम खान और बंगवासी कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर जनाब हैदर हसीन काजमी आदि शामिल रहे।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा: "हजरत मोहम्मद (स) केवल किसी एक विशिष्ट जाति, क्षेत्र या समुदाय के लिए नहीं भेजे गए थे; बल्कि उनका जीवन और आदर्श पूरी मानवता के लिए शांति, न्याय, दया, सहिष्णुता और मानवीय गरिमा का एक अनूठा उदाहरण है।"
उनकी शिक्षाएं इंसानों के बीच विभाजन के बजाय भाईचारे, द्वेष के बजाय प्रेम और संघर्ष के बजाय शांति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। वक्ताओं ने विशेष रूप से वर्तमान दुनिया में धार्मिक द्वेष, सांप्रदायिक विभाजन, हिंसा और असहिष्णुता के माहौल में नबी-ए-करीम (स) के जीवन-दर्शन को नए सिरे से लोगों के सामने लाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए केवल राजनीतिक समझौते पर्याप्त नहीं हैं; बल्कि इंसानों के दिलों में करुणा, न्याय की भावना और एक-दूसरे के प्रति सम्मान पैदा करने की आवश्यकता है। और उन मानवीय मूल्यों के एक उज्ज्वल आदर्श हजरत मोहम्मद (स) हैं।
धार्मिक सौहार्द का अनोखा संदेश:
इस सम्मेलन का एक सबसे उल्लेखनीय पहलू विभिन्न धार्मिक और सामाजिक परिवेश की शख्सियतियों की भागीदारी थी। मुस्लिम उलेमाओं और विचारकों के साथ-साथ हिंदू, ईसाई और सिख समुदायों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस आयोजन में अंतर-धार्मिक सौहार्द का एक सुंदर संदेश दिया।
वक्ताओं का मानना था कि कोलकाता जैसे बहुसंस्कृतिवादी समाज में इस तरह के आयोजनों का महत्व बहुत अधिक है। धर्म इंसानों के बीच दीवारें खड़ी करने के लिए नहीं है; बल्कि नैतिकता, मानवता और सच्चाई के मार्ग पर आगे बढ़ाने की एक बड़ी ताकत है। आपसी सम्मान और संवाद के माध्यम से ही एक शांतिपूर्ण समाज का निर्माण संभव है।
कविता और साहित्य में नबी-प्रेम:
कार्यक्रम का एक अन्य आकर्षक हिस्सा कविता और शायरी का सत्र था। आघा सज्जाद वारसी, मुश्ताक अहमद और आघा फिरोज हुसैन सहित कई कवियों और शायरों ने हजरत मोहम्मद (स) के प्रति प्रेम, उनके चरित्र की मिठास और मानवता के प्रति उनकी असीम दया को अपनी कविताओं और काव्यात्मक प्रस्तुतियों के माध्यम से बयां किया।
उनकी प्रस्तुतियों ने सभागार के माहौल को बेहद भावुक और आध्यात्मिक बना दिया। उपस्थित श्रोताओं ने पूरी तल्लीनता और अकीदत के साथ कलामों का आनंद लिया।
कोलकाता से विश्व मानवता के लिए संदेश:
नूरुल इस्लाम अकादमी के इस आयोजन के माध्यम से कोलकाता की धरती से एक महत्वपूर्ण संदेश दिया गया—कि धार्मिक पहचान अलग हो सकती है, लेकिन मानवीय गरिमा सभी के लिए समान है।
हजरत मोहम्मद (स) के जीवन-दर्शन को केंद्र में रखकर आयोजित यह सम्मेलन केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा; बल्कि यह शांति, सौहार्द, मानवता और आपसी सम्मान के एक व्यापक सामाजिक संदेश में परिवर्तित हो गया।
आयोजकों की ओर से कहा गया कि नबी-ए-करीम (स) के जन्म की याद तभी सार्थक हो सकती है जब उनकी शिक्षाएं हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में झलकें। उनके प्रति प्रेम की वास्तविक अभिव्यक्ति केवल भावनाओं में नहीं—बल्कि न्याय की स्थापना, असहायों की सहायता, पड़ोसियों के अधिकारों की रक्षा, इंसानों पर दया और समाज में शांति की स्थापना में निहित है।
कोलकाता की धरती से ‘रहमतुल लिल आलमीन कॉन्फ्रेंस’ का संदेश यही है कि—नबी-ए-करीम (स) की रहमत और मानवीय आदर्शों को अपने दिलों में बसाकर विभाजन नहीं, एकता को मजबूत करें; द्वेष नहीं, प्रेम फैलाएं; और संघर्ष नहीं, बल्कि शांति की स्थापना करें।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha