हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , गुवाहाटी, 13 सितंबर: गौहाटी हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि तलाक-ए-हसन भारत में तलाक का एक वैध रूप है और इस पर प्रतिबंध नहीं है। न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी ने यह फैसला मुस्लिम तलाक के पंजीकरण से जुड़े एक मामले में सुनाया।
अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह असम अनिवार्य मुस्लिम विवाह एवं तलाक पंजीकरण अधिनियम, 2024 के तहत तलाक के पंजीकरण के लिए संबंधित विवाह एवं तलाक रजिस्ट्रार के समक्ष आवेदन करे।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उनकी पत्नी वर्ष 2018 में वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थीं। दंपति के बीच सुलह कराने के कई प्रयास किए गए, लेकिन सभी प्रयास विफल रहे। इसके बाद याचिकाकर्ता ने 22 मार्च, 26 अप्रैल और 27 मई, 2026 को तलाक-ए-हसन की घोषणा की।
तलाक-ए-हसन मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत तलाक का एक रूप है, जिसमें तीन अलग-अलग अवसरों पर तलाक की घोषणा की जाती है और प्रत्येक घोषणा के बीच अंतराल होता है।
गौहाटी हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रजिस्ट्रार को यह सत्यापित करना होगा कि तलाक वास्तव में लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार हुआ है या नहीं। इसके अलावा, पंजीकरण पर निर्णय लेने से पहले याचिकाकर्ता की पहचान की भी पुष्टि करनी होगी।
अदालत के इस फैसले से असम में तलाक-ए-हसन की कानूनी स्थिति और मुस्लिम तलाक के पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता मिली है। हालांकि, तलाक का पंजीकरण सक्षम प्राधिकारी द्वारा आवश्यक सत्यापन पर निर्भर करेगा।
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