लेखक: सय्यद अंजुम रज़ा
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी मध्य पूर्व ऐसे नाजुक दौर से गुजर रहा है, जहाँ युद्ध, कूटनीति, क्षेत्रीय सुरक्षा और नई रणनीतिक गठजोड़ों के बीच संतुलन तेजी से बदल रहा है। ऐसे वातावरण में पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की ओर से क्षेत्र में तनाव कम करने, बातचीत का रास्ता आसान बनाने और शांतिपूर्ण तथा समृद्ध भविष्य के लिए किए जा रहे कूटनीतिक प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय हैं। विशेष रूप से फिलिस्तीन के मुद्दे और अवैध कब्जे वाली ज़ायोनी सरकार के संबंध में पाकिस्तान का सैद्धांतिक रुख ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के संस्थापक कायदे-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना के रुख से जुड़ा हुआ है और पाकिस्तानी राज्य की नीति में यह रुख लगातार प्रमुख रहा है।
हालिया ईरान-अमेरिका तनाव के संदर्भ में पाकिस्तान की कूटनीतिक गतिविधियों को भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। यदि इस्लामाबाद के कूटनीतिक प्रयास किसी ऐसे ढाँचे तक पहुँचने में सहायक रहे हैं, जिसके माध्यम से दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम, बातचीत और तनाव में कमी का रास्ता आसान हुआ है, तो इसे पाकिस्तान की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता माना जा सकता है। "इस्लामाबाद समझौते" के चौदह बिंदुओं को भी इसी संदर्भ में एक सम्मानजनक, संतुलित और न्यायपूर्ण व्यवस्था की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
इस पूरे प्रयास में पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व, फील्ड मार्शल हाफिज़ सैयद आसिम मुनीर, प्रधानमंत्री मियां शहबाज़ शरीफ और गृहमंत्री मोहसिन नकवी के कूटनीतिक तथा नेतृत्व संबंधी प्रयास भी विशेष ध्यान देने योग्य हैं।
विशेष रूप से यदि संघर्षरत या विरोधी पक्ष पाकिस्तान के नेतृत्व को एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में देखते हैं, तो यह पाकिस्तान के कूटनीतिक महत्व में वृद्धि का संकेत है। ईरान, अमेरिका, चीन और अन्य महत्वपूर्ण शक्तियों के साथ पाकिस्तान के संबंधों को देखते हुए इस्लामाबाद एक ऐसे पुल की भूमिका निभा सकता है, जो युद्ध के बजाय बातचीत और टकराव के बजाय कूटनीति को मजबूत करे।
मक्का समझौता: एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे की शुरुआत?
इसी व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हालिया रक्षा सहयोग भी असाधारण महत्व रखता है। यदि तीनों देशों के बीच हुए समझौतों में यह सिद्धांत शामिल है कि किसी एक देश के खिलाफ सशस्त्र आक्रमण को सामूहिक सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देखा जाएगा, तो यह केवल पारंपरिक रक्षा सहयोग नहीं, बल्कि क्षेत्र में एक नई सुरक्षा अवधारणा की नींव बन सकता है।
हालांकि तुर्की की ओर से इस सहयोग को केवल आपसी समझ के रूप में बताया जाना इस बात का संकेत है कि तीनों देश फिलहाल इस सहयोग को किसी औपचारिक सैन्य गुट या किसी विशेष देश के खिलाफ आक्रामक गठबंधन के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहते। इसका मूल उद्देश्य संयुक्त रक्षा, रक्षा तकनीक, खुफिया सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना बताया जा रहा है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यदि भविष्य में मिस्र या क्षेत्र के अन्य देश भी इस प्रकार के क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे का हिस्सा बनते हैं, तो इसके प्रभाव केवल तीन देशों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे मध्य पूर्व की भौगोलिक और रणनीतिक राजनीति बदल सकती है।
तुर्की की ओर से इस सहयोग को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 में मान्यता प्राप्त आत्मरक्षा के अधिकार के संदर्भ में प्रस्तुत करना भी ध्यान देने योग्य है। इससे यह धारणा बनती है कि इस नई सुरक्षा अवधारणा को किसी बाहरी शक्ति के खिलाफ युद्ध गठबंधन के बजाय राज्यों के आत्मरक्षा के अधिकार और क्षेत्रीय सुरक्षा के एक ढाँचे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
यमन का संकट और सऊदी अरब की नई प्राथमिकताएँ
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग के महत्व को यमन के संदर्भ में भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सऊदी अरब और अंसारुल्लाह के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष ने पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित किया है। बाब अल-मंदब और लाल सागर की भौगोलिक महत्ता ने इस विवाद को केवल सऊदी-यमनी मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे वैश्विक व्यापार, ऊर्जा की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ दिया है।
हालांकि सऊदी-हूती विवाद का स्थायी समाधान अंततः बातचीत के माध्यम से ही संभव होगा। केवल सैन्य दबाव किसी जटिल राजनीतिक और क्षेत्रीय विवाद को स्थायी रूप से समाप्त नहीं कर सकता। यहाँ ईरान की संभावित सकारात्मक भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि तेहरान, रियाद और क्षेत्र की अन्य राजधानियों के बीच संवाद आगे बढ़ता है, तो यमन में तनाव कम करने और राजनीतिक समाधान का रास्ता आसान होने की संभावनाएँ पैदा हो सकती हैं।
क्या क्षेत्र अमेरिकी सुरक्षा छतरी से बाहर निकल रहा है?
मध्य पूर्व में हालिया संकटों ने एक बुनियादी सवाल जरूर खड़ा किया है: क्या अरब देश और अन्य क्षेत्रीय राज्य भविष्य में अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रहना जारी रखेंगे?
ईरान-अमेरिका तनाव और क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन ने इस सवाल को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। यदि क्षेत्रीय राज्य इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें एक-दूसरे के करीब आना होगा, संयुक्त रक्षा क्षमता विकसित करनी होगी और बाहरी शक्तियों पर निर्भरता कम करनी होगी, तो "मक्का समझौते" जैसे समझौते एक व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे की नींव बन सकते हैं।
यही वह अवधारणा है जिसकी ओर इस्लामी गणराज्य ईरान लंबे समय से "मुस्लिम रक्षा सहयोग" और क्षेत्रीय देशों द्वारा अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने के संबंध में संकेत देता रहा है। ईरान के शहीद रहबर आयतुल्लाह खामेनेई की ओर से मुस्लिम देशों के बीच संयुक्त रक्षा पंक्ति बनाने का सुझाव भी इसी व्यापक अवधारणा का हिस्सा माना जा सकता है।
लेकिन किसी भी क्षेत्रीय रक्षा व्यवस्था की सफलता तब तक संभव नहीं है, जब तक उसकी नींव आपसी विश्वास, संप्रभुता, आक्रामकता से परहेज और राजनीतिक संवाद पर आधारित न हो। यदि यह सहयोग किसी एक देश के खिलाफ टकराव के बजाय पूरे क्षेत्र की सामूहिक रक्षा, संप्रभुता और शांति के लिए हो, तो इसके परिणाम अधिक स्थायी हो सकते हैं।
ईरान: युद्ध से प्रतिरोध तक
हालिया ईरान-अमेरिका तनाव ने यह भी स्पष्ट किया है कि ईरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और रक्षा क्षमता के मामले में बेहद संवेदनशील है। ईरानी राज्य ने संकट के दौरान राष्ट्रीय एकता, सैन्य तैयारी और अपनी रक्षा रणनीति पर भरपूर भरोसे का प्रदर्शन किया। इस स्थिति ने क्षेत्र के कई देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि भविष्य की सुरक्षा केवल बाहरी शक्तियों की सैन्य गारंटी से नहीं, बल्कि स्थानीय रक्षा क्षमता, राजनीतिक एकता और क्षेत्रीय सहयोग से भी जुड़ी हुई है।
ईरान के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस पूरे संकट ने उसके लंबे समय से चले आ रहे रुख को मजबूती दी है कि मुस्लिम देशों को अपनी सुरक्षा के लिए एक-दूसरे पर भरोसा करना चाहिए और बाहरी सैन्य निर्भरता को कम करना चाहिए। यही कारण है कि तेहरान क्षेत्रीय सुरक्षा की ऐसी किसी भी व्यवस्था को महत्वपूर्ण मान सकता है, जो बाहरी प्रभुत्व के बजाय क्षेत्रीय स्वामित्व पर आधारित हो।
पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका और तीसरे विश्व युद्ध का खतरा
इस पूरे परिदृश्य में पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत उसकी सैन्य शक्ति से अधिक उसकी कूटनीतिक स्थिति बन सकती है। पाकिस्तान के ईरान के साथ ऐतिहासिक और भाईचारे वाले संबंध हैं, सऊदी अरब के साथ उसके गहरे रक्षा और आर्थिक संबंध हैं, तुर्की के साथ रणनीतिक निकटता है और अमेरिका तथा चीन दोनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं।
यह अनोखी स्थिति इस्लामाबाद को एक संभावित "कूटनीतिक पुल" बनाती है।
यदि पाकिस्तान विभिन्न संघर्षरत पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने, युद्धविराम का रास्ता आसान बनाने और क्षेत्रीय विवादों को विश्व युद्ध में बदलने से रोकने में सफल होता है, तो इसका प्रभाव केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।
यह धारणा भी चर्चा में है कि अमेरिका अपने कुछ सैन्य संसाधनों और हथियारों के भंडार को क्षेत्र में अपने सहयोगियों, विशेष रूप से इज़राइल, के लिए स्थानांतरित या पुनर्गठित कर रहा है। यदि यह रुझान जारी रहता है, तो मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन और अधिक संवेदनशील हो सकता है और किसी भी नई सैन्य कार्रवाई के परिणाम असाधारण रूप से व्यापक हो सकते हैं।
अमेरिका का भविष्य और बदलता हुआ मध्य पूर्व
अमेरिकी नीति के संदर्भ में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या वाशिंगटन भविष्य में मध्य पूर्व में उसी स्तर की सैन्य मौजूदगी बनाए रख सकेगा, जिस तरह वह अतीत में रखता आया है। क्षेत्र में बढ़ती जन-असंतुष्टि, युद्धों की आर्थिक कीमत, ऊर्जा संकट और क्षेत्रीय देशों द्वारा अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने के प्रयास अमेरिकी प्रभाव के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि अमेरिका मध्य पूर्व से वियतनाम की तरह निकल जाएगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि क्षेत्र में "केवल अमेरिकी सुरक्षा छतरी" पर निर्भर रहने की धारणा पहले जैसी मजबूत नहीं रही है।
यदि क्षेत्रीय देश अपनी रक्षा, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और राजनीतिक सहयोग के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बनाने में सफल हो जाते हैं, तो भविष्य का मध्य पूर्व एक ऐसे क्षेत्र का रूप ले सकता है, जहाँ बाहरी शक्तियों के बजाय क्षेत्रीय देश सुरक्षा के मुख्य गारंटर हों।
मक्का समझौता: सैन्य गठबंधन या शांति का नया द्वार?
असल परीक्षा "मक्का समझौते" के नाम या इसमें शामिल देशों की नहीं, बल्कि इसकी व्यावहारिक दिशा की होगी। यदि यह समझौता केवल सैन्य गठबंधन तक सीमित रहता है, तो यह क्षेत्र में एक नए गुट के गठन का कारण बन सकता है। लेकिन यदि इसे रक्षा सहयोग, कूटनीतिक संवाद, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान, आर्थिक संबंधों और सामूहिक सुरक्षा की व्यापक अवधारणा से जोड़ा जाता है, तो यही समझौता मध्य पूर्व में शांति के एक नए अध्याय की शुरुआत भी बन सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि यदि क्षेत्र के देश धीरे-धीरे यह समझने लगें कि उनकी सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, तो भविष्य में "मक्का समझौता" एक व्यापक मुस्लिम क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे की नींव बन सकता है। हालांकि, फिलहाल इसे किसी "ग्रेट इस्लामिक सैन्य गठबंधन" का अंतिम रूप मानना जल्दबाजी होगी।
आज की सबसे बड़ी जरूरत युद्ध नहीं, बातचीत है; सैन्य प्रतिस्पर्धा नहीं, सामूहिक सुरक्षा है; और बाहरी संरक्षण नहीं, क्षेत्रीय संप्रभुता है।
यदि पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और ईरान अपने-अपने मतभेदों के बावजूद बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, तो मध्य पूर्व के लिए एक नई संभावना पैदा हो सकती है: ऐसा क्षेत्र, जहाँ शक्ति का मानदंड युद्ध शुरू करने की क्षमता नहीं, बल्कि युद्ध रोकने, मतभेदों को सुलझाने और शांति कायम रखने की क्षमता हो।
इसी संदर्भ में इस्लामाबाद समझौते और मक्का समझौते को केवल दो अलग-अलग कूटनीतिक या रक्षा संबंधी घटनाओं के बजाय बदलती हुई वैश्विक और क्षेत्रीय व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण संकेतों के रूप में देखा जा सकता है। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो संभव है कि आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व की राजनीति का केंद्रीय सवाल यह न रहे कि "अमेरिका किसकी रक्षा करेगा?" बल्कि यह हो कि "क्षेत्र के देश अपनी सामूहिक सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं किस तरह संभालेंगे?"
और शायद यही सवाल आने वाले मध्य पूर्व के नए राजनीतिक इतिहास की शुरुआत बन जाए।
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