हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह सुब्हानी ने क़ुम स्थित संस्थान-ए-इमाम सादिक़ (अ.) में नए शैक्षणिक वर्ष के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने ज्ञान के महत्व को बयान करते हुए कहा कि हर वह ज्ञान जो मानवता के लिए उपयोगी हो और समाज की समस्याओं के समाधान में सहायक साबित हो, मूल्यवान है। हालांकि किसी भी ज्ञान की श्रेष्ठता उसके विषय की गरिमा के अनुरूप होती है। इस दृष्टि से अल्लाह तआला, अस्तित्व, इलाही गुणों और मूलभूत आस्थागत विषयों से संबंधित ज्ञान को उच्च स्थान प्राप्त है।
उन्होंने इल्म-ए-कलाम को “फ़िक़्ह-ए-अकबर” बताते हुए कहा कि जिस प्रकार किसी इमारत के लिए मजबूत नींव आवश्यक होती है, उसी प्रकार धार्मिक मआरिफ़ के लिए भी मजबूत आस्थागत आधार अनिवार्य है। छात्रों को चाहिए कि वे इल्म-ए-कलाम, फ़िक़्ह, उसूल और अरबी साहित्य सहित सभी विषयों को गंभीरता से हासिल करें, हालांकि आस्थागत विषयों की बुनियाद को विशेष महत्व दें।
आयतुल्लाह सुब्हानी ने कुरआन की समझ में इल्म-ए-कलाम और दर्शन की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि कुरआन में अल्लाह तआला की इंसान से निकटता और उसके साथ होने का उल्लेख मिलता है, जबकि इल्म-ए-कलाम में यह सिद्ध किया जाता है कि अल्लाह तआला शरीर, स्थान, दिशा और समय से पाक है। इन दोनों विषयों को सही ढंग से समझने के लिए कलामी और दार्शनिक सिद्धांतों से परिचित होना आवश्यक है।
उन्होंने नास्तिकतापूर्ण और आस्थागत शंकाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक बुनियादों पर बौद्धिक हमले समाप्त नहीं हुए हैं, बल्कि अलग-अलग दौर में नए सवाल और शंकाएं सामने आती रहती हैं। इनका मुकाबला केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि मजबूत विद्वतापूर्ण तर्क के माध्यम से किया जा सकता है। इसलिए हौज़ा-ए-इल्मिया को ऐसे विशेषज्ञ तैयार करने चाहिए, जो आधुनिक शंकाओं का तार्किक और विद्वतापूर्ण उत्तर दे सकें।
आयतुल्लाह सुब्हानी ने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) की शैक्षिक और बौद्धिक सीरत का उल्लेख करते हुए कहा कि इमाम ने विभिन्न बौद्धिक और आस्थागत विचारधाराओं के मुकाबले के लिए ऐसे शिष्यों को प्रशिक्षित किया, जो बहस और विद्वतापूर्ण चर्चाओं में इस्लामी अक़ीदों का बचाव कर सकें। हिशाम बिन हकम और अन्य शिष्य इस शैक्षिक प्रशिक्षण के प्रमुख उदाहरण थे।
उन्होंने कहा कि आज भी अक़ायद, अहकाम और धार्मिक मआरिफ़ के संबंध में विभिन्न सवाल और शंकाएं मौजूद हैं। इसलिए हौज़ा-ए-इल्मिया को विभिन्न विशेषज्ञतापूर्ण क्षेत्रों के माध्यम से उनका उत्तर देना चाहिए। विशेषज्ञता और मजबूत विद्वतापूर्ण आधार के बिना आधुनिक शंकाओं का प्रभावी उत्तर देना संभव नहीं है।
आयतुल्लाह सुब्हानी ने क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया की लगभग 105 वर्षों की शैक्षिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इस हौज़े ने धर्म, नैतिकता और समाज की धार्मिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने छात्रों को ताकीद की कि वे अपनी शैक्षिक पढ़ाई को गंभीरता से जारी रखें, नियमित रूप से कक्षाओं में भाग लें और उच्च स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने का सिलसिला जारी रखें।
समारोह के अंत में संस्थान-ए-इमाम सादिक़ (अ.) के कई छात्रों की दस्तारबंदी भी आयतुल्लाहिल उज़्मा सुब्हानी के हाथों संपन्न हुई।
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