हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आगा सैयद हसन अल-मूसवी अस-सफ़वी ने अपने ख़ुत्बे में तौबा व इस्तिग़फ़ार की अहमियत और आत्मसुधार के साथ आध्यात्मिक परिवर्तन के दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सच्ची तौबा का अर्थ केवल अल्लाह से क्षमा मांगना नहीं, बल्कि अपने भीतर बुनियादी बदलाव लाना, गुनाहों से बचना और अपने चरित्र को सुधारना है।

आगा साहब ने कहा कि इंसान ग़लतियों और चूकों से पूरी तरह पाक नहीं है, लेकिन अल्लाह तआला ने अपने बंदों के लिए तौबा और इस्तिग़फ़ार का दरवाज़ा खुला रखा है। इंसान की वास्तविक सफलता इसी में है कि वह अपनी कमियों को पहचाने, अपने आमाल का जायज़ा ले, सच्ची नीयत के साथ अल्लाह की बारगाह में रुजू करे और भविष्य में गुनाहों से बचने का पक्का इरादा करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्तिग़फ़ार इंसान के लिए एक बड़ा आध्यात्मिक ख़ज़ाना है, जिससे उसे कभी ग़ाफ़िल नहीं होना चाहिए।

शहीद आयतुल्लाह मुर्तज़ा मुतह्हरी के विचारों का हवाला देते हुए आगा सैयद हसन अल-मूसवी अस-सफ़वी ने तौबा को आंतरिक क्रांति क़रार दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह बाहरी क्रांति सामाजिक, राजनीतिक और संस्थागत ढांचों में बदलाव का नाम है, उसी तरह आंतरिक क्रांति के लिए इंसान को अपने भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों, नफ़्सानी इच्छाओं और नैतिक कमज़ोरियों के ख़िलाफ़ संघर्ष करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि सच्ची तौबा करने वाला व्यक्ति केवल अपनी पिछली ग़लतियों पर पछतावा नहीं करता, बल्कि उन कारणों और आदतों को भी बदलने की कोशिश करता है, जो उसे गुनाह की ओर ले जाती हैं।

आगा साहब ने आगे कहा कि अल्लाह तआला ने इंसान को सोचने-समझने, इरादा करने और आध्यात्मिक विकास की क्षमताओं से नवाज़ा है। जब इंसान अपनी अनुचित इच्छाओं, स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों और शैतानी वसवसों पर काबू पाकर नेकी, तक़वा और सच्चाई का रास्ता अपनाता है, तो वह आध्यात्मिक बुलंदी और क़ुर्बे इलाही की ओर आगे बढ़ता है।
इसके विपरीत, जब इंसान अपनी इच्छाओं का ग़ुलाम बन जाता है, तो वह अपने उच्च मानवीय स्थान और नैतिक ज़िम्मेदारियों से दूर हो जाता है। इसलिए वास्तविक सफलता के लिए ज़रूरी है कि इंसान अपने भीतर की इस्लाह को अपनी ज़िंदगी का स्थायी उद्देश्य बनाए।
ख़ुत्बे के अंत में आगा साहब ने दुआए अबू हमज़ा सुमाली और क़ुरआन मजीद की इस्तिग़फ़ार से संबंधित आयतों पर ग़ौर-व-फ़िक्र करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि तौबा, दुआ और इस्तिग़फ़ार इंसान को अल्लाह तआला की रहमत से जोड़े रखते हैं और आत्मसुधार का रास्ता दिखाते हैं।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ज़बानी इस्तिग़फ़ार उसी समय वास्तविक अर्थ रखता है, जब उसके साथ गुनाहों से व्यावहारिक रूप से बचने, चरित्र सुधारने और नेक आमाल करने का पक्का इरादा भी शामिल हो।
अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला मुहम्मद व आले मुहम्मद (अ.स.) के सदक़े में तमाम बीमारों को शिफ़ा अता फ़रमाए और सभी मोमिनों व मोमिनात को अपनी रहमत और मग़फ़िरत से मालामाल फ़रमाए।











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