हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, अल्लाह के अनेक पैग़म्बरों का आगमन और विभिन्न आसमानी शरीअतों में अंतर ऐसे सवालों को जन्म देता है कि नए धर्मों के आने की आवश्यकता क्यों पड़ी और उनका पहले से मौजूद धर्मों से क्या संबंध है। यह विषय हमें पैग़म्बरों की नियुक्ति के उद्देश्य और मानवता के मार्गदर्शन की प्रक्रिया पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
इस लेख में ईसाई धर्म के बाद इस्लाम के आगमन और विभिन्न ईश्वरीय शरीअतों के बीच अंतर से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर दिया गया है।
सवाल क्या है?
कल्पना कीजिए कि इतिहास में अल्लाह की ओर से अनेक पैग़म्बर आए। सभी ने एक ही ईश्वर की बात की, लोगों को अच्छाई और न्याय की शिक्षा दी तथा उन्हें सही जीवन जीने का रास्ता दिखाया। लेकिन हर नए पैग़म्बर के आगमन पर यह सवाल उठता है कि यदि पिछले पैग़म्बर अल्लाह की ओर से आए थे, तो फिर एक और पैग़म्बर भेजने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या नया पैग़म्बर पिछले पैग़म्बर की शिक्षाओं को गलत साबित करने आया था या उसकी कोई अलग जिम्मेदारी थी?
यह सवाल हज़रत ईसा (अ.) और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.) के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। हज़रत ईसा (अ.) का आगमन पैग़म्बरे इस्लाम (स.) से कई शताब्दियों पहले हुआ था और उनके बाद ईसाई धर्म भी प्रचलित था। फिर पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने ईसाई धर्म का अनुसरण करने के बजाय स्वयं पैग़म्बर बनकर इस्लाम की शरीअत क्यों पेश की? क्या इस्लाम के आगमन का अर्थ पिछले धर्म को अस्वीकार करना था?
इस सवाल का जवाब देने से पहले एक महत्वपूर्ण बात समझना ज़रूरी है। सभी ईश्वरीय पैग़म्बर अपनी मूल शिक्षा में एकमत थे, लेकिन उनकी शरीअतों के सभी आदेश और नियम एक जैसे होना आवश्यक नहीं था।
उदाहरण के लिए, एक शिक्षक किसी कक्षा में विद्यार्थियों को कुछ विषय पढ़ाता है और अगली कक्षा में दूसरा शिक्षक उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए नई बातें सिखाता है। दूसरे शिक्षक का आना इस बात का प्रमाण नहीं है कि पहले शिक्षक की शिक्षा गलत थी। बल्कि संभव है कि शिक्षा के अलग-अलग चरणों में विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुसार नए विषयों की जरूरत हो। हालांकि, यह उदाहरण केवल विषय को समझाने के लिए है, क्योंकि पैग़म्बरी एक ईश्वरीय जिम्मेदारी है और सामान्य शिक्षा से अलग है।
इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, अल्लाह ने इतिहास के विभिन्न दौरों में मानवता के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बर भेजे। उनकी मूल शिक्षा एकेश्वरवाद, अल्लाह की इबादत और पाप तथा बुराई से दूर रहने पर आधारित थी। हालांकि, प्रत्येक पैग़म्बर की जिम्मेदारी और उसके दौर की आवश्यकताओं के अनुसार कुछ आदेशों और नियमों में अंतर हो सकता था। इसलिए शरीअतों में अंतर का अर्थ यह नहीं कि ईश्वरीय संदेश की मूल शिक्षा में विरोधाभास था या पहले पैग़म्बर की शिक्षा गलत थी।
पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने पिछली शरीअत का अनुसरण क्यों नहीं किया?
यह सवाल अब भी बाकी है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने पहले से मौजूद शरीअत का अनुसरण करने के बजाय नई शरीअत क्यों पेश की?
महत्वपूर्ण बात यह है कि पैग़म्बरों की रिसालत के समाप्त होने का समय निर्धारित करना अल्लाह का अधिकार है, मनुष्य का नहीं। हम केवल अपनी सोच के आधार पर यह निर्णय नहीं कर सकते कि मानवता को अब किसी पैग़म्बर की आवश्यकता है या नहीं। इसके लिए यह देखना होगा कि अल्लाह ने इस बारे में क्या बताया है और उसके क्या प्रमाण हैं।
इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार, अल्लाह ने हज़रत मुहम्मद (स.) को अपना अंतिम पैग़म्बर बनाकर भेजा। क़ुरआन की सूरह अल-अहज़ाब की आयत 40 में उन्हें ‘ख़ातमुन्नबिय्यीन’, अर्थात पैग़म्बरों की अंतिम कड़ी, कहा गया है।
दूसरी ओर, नए पैग़म्बर का आगमन इस बात का प्रमाण नहीं है कि पहले के पैग़म्बर की शिक्षाएं महत्वहीन थीं। कभी-कभी किसी अंतिम चरण तक पहुंचने के लिए पहले कई चरणों से गुजरना आवश्यक होता है। किसी बड़ी योजना के सभी उद्देश्य शुरुआत में ही पूरे हो जाएं, यह जरूरी नहीं है। पहले के चरण आगे आने वाले अंतिम चरण की जमीन तैयार कर सकते हैं।
इस्लामी दृष्टिकोण में भी पिछले पैग़म्बरों की रिसालत मानवता के मार्गदर्शन की इसी प्रक्रिया का हिस्सा थी और उसने पैग़म्बरे इस्लाम (स.) के आगमन की जमीन तैयार की।
क़ुरआन में हज़रत ईसा (अ.) की ओर से अपने बाद आने वाले एक पैग़म्बर की शुभसूचना का उल्लेख भी मिलता है। सूरह अस-सफ़ की आयत 6 में कहा गया है:
«وَمُبَشِّرًا بِرَسُولٍ یَأْتِی مِنْ بَعْدِی اسْمُهُ أَحْمَدُ»
अर्थात, “और मैं अपने बाद आने वाले एक पैग़म्बर की शुभसूचना देता हूं, जिसका नाम अहमद होगा।”
इसलिए इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार, पैग़म्बरे इस्लाम (स.) का आगमन पिछले पैग़म्बरों की शिक्षाओं से अलग कोई असंबंधित घटना नहीं था, बल्कि वह उसी मार्गदर्शन की निरंतरता में था।
आज भी इस्लाम का अनुसरण क्यों किया जाए?
एक और सवाल यह उठता है कि यदि इस्लाम लगभग 1400 वर्ष पहले आया था, तो आज भी उसका अनुसरण क्यों किया जाना चाहिए?
इसका जवाब यह है कि किसी संदेश का पुराना होना अपने आप में उसके गलत होने का प्रमाण नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे किसी विचार का नया होना अपने आप में उसके सही होने का प्रमाण नहीं है। महत्वपूर्ण बात उस संदेश की सत्यता और उसके प्रमाण हैं।
यदि यह साबित हो जाए कि अल्लाह ने मानवता के मार्गदर्शन के लिए कोई शरीअत भेजी और उसे अंतिम शरीअत निर्धारित किया, तो केवल समय बीत जाने से उसकी वैधता समाप्त नहीं हो जाती।
हालांकि, इस दावे को साबित करने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की नुबूवत और क़ुरआन की सत्यता से संबंधित प्रमाणों का अध्ययन आवश्यक है। केवल यह कह देना कि इस्लाम अंतिम धर्म है, अपने आप में इस दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
इस्लाम और ईसाई धर्म की शिक्षाओं में अंतर
यहां एक और बात समझना आवश्यक है। इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार, आज ईसाई धर्म के नाम से प्रचलित सभी मान्यताओं को बिना जांच-पड़ताल के हज़रत ईसा (अ.) की मूल शिक्षाएं नहीं माना जा सकता।
मुसलमानों का विश्वास है कि हज़रत ईसा (अ.) ने लोगों को एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया था। लेकिन ईसाई धर्म की कुछ प्रचलित मान्यताएं, जैसे हज़रत ईसा (अ.) को ईश्वर मानना और त्रित्व का सिद्धांत, इस्लामी एकेश्वरवाद की धारणा से मेल नहीं खातीं।
इसलिए इस्लामी दृष्टिकोण में हज़रत ईसा (अ.) की मूल शिक्षाओं का अनुसरण करने का अर्थ यह नहीं है कि ईसाई धर्म की सभी वर्तमान मान्यताओं को भी स्वीकार कर लिया जाए।
निष्कर्ष
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.) के सामने हज़रत ईसा (अ.) की पैग़म्बरी को स्वीकार करने और अपनी पैग़म्बरी को मानने में से किसी एक को चुनने का सवाल नहीं था। इस्लामी मान्यता के अनुसार, दोनों अल्लाह के पैग़म्बर थे, लेकिन हज़रत मुहम्मद (स.) को अंतिम ईश्वरीय शरीअत पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
जिस अल्लाह ने हज़रत ईसा (अ.) को लोगों के मार्गदर्शन के लिए भेजा, उसी ने हज़रत मुहम्मद (स.) को भी पैग़म्बर बनाया और उनके माध्यम से मार्गदर्शन के अंतिम चरण को मानवता तक पहुंचाया।
इसलिए मूल सवाल यह नहीं है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने पिछले धर्म का अनुसरण क्यों नहीं किया, बल्कि यह है कि क्या हमारे पास ऐसे विश्वसनीय प्रमाण हैं जो यह साबित करते हैं कि अल्लाह ने उन्हें पैग़म्बर चुना और इस्लाम को अंतिम शरीअत निर्धारित किया? मुसलमानों के दृष्टिकोण में पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की नुबूवत और क़ुरआन की सत्यता इसी विश्वास का आधार हैं।
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