हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाहिल उज़्मा जवादी आमोली ने इस्लामी नैतिकता में स्वतंत्रता, गैरत और युद्ध के मैदान में बहादुरी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य को भ्रष्टाचार और अनुचित आर्थिक लाभ से दूर रहना चाहिए। वहीं, देश और समाज की रक्षा के लिए दुश्मन की आक्रामकता के सामने डटे रहना और रक्षा संबंधी जिम्मेदारियों को पूरी तरह निभाना आवश्यक है।
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने क़ुम स्थित मस्जिदे आज़म में आयोजित साप्ताहिक नैतिकता की कक्षा को संबोधित करते हुए अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की शिक्षाओं के प्रकाश में इस्लामी नैतिकता के तीन बुनियादी सिद्धांतों—स्वतंत्रता, गैरत और युद्ध के मैदान में बहादुरी—की व्याख्या की। उन्होंने मौजूदा परिस्थितियों में देश की सुरक्षा, सम्मान और रक्षा करने वाले सैनिकों का समर्थन करने पर भी ज़ोर दिया।
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने कहा कि स्वतंत्रता का तकाज़ा है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए गलत रास्ता न अपनाए और अपने सम्मान तथा गरिमा को मामूली सांसारिक लाभ के बदले न बेचे। अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की शिक्षाओं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य जन्नत है। इसलिए उसे रिश्वतखोरी, आर्थिक भ्रष्टाचार, सरकारी धन के गबन और जमाखोरी या अनुचित रूप से अधिक कीमत वसूलने जैसे गलत कामों से अपनी ज़िंदगी को दूषित नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को हलाल और जायज़ तरीकों से जीवन बिताना चाहिए तथा दूसरों के अधिकारों का हनन करके लाभ कमाने से बचना चाहिए। स्वतंत्रता इस्लामी नैतिकता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिस पर समाज में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
गैरत का तकाज़ा है कि देश की रक्षा की जाए
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने गैरत की व्याख्या करते हुए कहा कि इस्लामी शिक्षाओं में मनुष्य की जान, माल और उसकी निजी मर्यादा पर हमले की स्थिति में रक्षा करने के महत्व को स्पष्ट किया गया है। उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) और इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से वर्णित रिवायतों का हवाला देते हुए कहा कि गैरत का अर्थ है किसी को अपनी मर्यादा का अनुचित उल्लंघन करने और उसमें नाजायज़ हस्तक्षेप करने की अनुमति न देना।
उन्होंने ईरान की धरती पर अमेरिका और इज़राइल की ओर से की गई आक्रामकता का उल्लेख करते हुए देश की सीमाओं, राष्ट्रीय सम्मान और सुरक्षा की रक्षा करने तथा इस आक्रामकता के सामने डटे रहने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
सैनिकों के लिए सतर्क रहना आवश्यक
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने नहजुल बलाग़ा के ख़ुत्बा नंबर 11 का उल्लेख करते हुए कहा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) ने सैनिकों को युद्ध के मैदान में जागरूक और सतर्क रहने की ताकीद की है। उन्होंने कहा कि रक्षा की जिम्मेदारी निभाने वालों को ड्यूटी के दौरान लापरवाही से बचना चाहिए और दुश्मन के संभावित हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
उन्होंने सैनिकों की सेवाओं और कुर्बानियों की सराहना करते हुए कहा कि आराम करना आवश्यक है, लेकिन पहरेदारी और निगरानी की जिम्मेदारी निभाते समय ऐसी लापरवाही नहीं होनी चाहिए, जिससे रक्षा संबंधी तैयारियों पर असर पड़े।
हज़रत इब्राहीम (अ) के मार्ग पर चलने की अपील
आयतुल्लाह जवादी आमोली ने हज़रत इब्राहीम (अ) द्वारा मूर्तियों को तोड़ने और मूर्तिपूजा के विरुद्ध संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि पवित्र क़ुरआन ने मुसलमानों को हज़रत इब्राहीम (अ) के मार्ग का अनुसरण करने का आह्वान किया है। उनके अनुसार, मुसलमानों को भी धर्म, सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुरूप आवश्यक साधनों के साथ प्रतिरोध और दृढ़ता का प्रदर्शन करना चाहिए।
अंत में उन्होंने ईरान की जनता, सैनिकों, विद्वानों और समाज की सेवा करने वाले लोगों के लिए दुआ की। उन्होंने अल्लाह तआला से सभी को सम्मान, गरिमा तथा दुनिया और आख़िरत में सफलता प्रदान करने की प्रार्थना की।
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