शुक्रवार 6 नवंबर 2026 - 20:38
अल्लाह पर झूठ गढ़ने से बड़ा कोई ज़ुल्म नहीं, हक़ को दबाने की हर कोशिश आख़िरकार नाकाम होती है: मौलाना लियाक़त अली रांझा

ज़िला अटक के शहर जंड में जुमे के ख़ुत्बे के दौरान मौलाना लियाक़त अली रांझा ने हक़ को छिपाने को ज़ुल्म क़रार देते हुए कहा कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) के फ़ज़ाइल और उनके मकाम व मर्तबे को दुनिया के सामने हिकमत और प्रभावशाली अंदाज़ में उजागर करना समय की अहम ज़रूरत है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ज़िला अटक के जंड स्थित जामे मस्जिद ग़ाज़ी इमाम बादशाह में जुमे के ख़ुत्बे के दौरान मौलाना लियाक़त अली रांझा ने हक़ और बातिल, सच्चाई तथा हक़ को छिपाने के विषय पर बात करते हुए कहा कि अल्लाह तआला पर झूठ गढ़ना सबसे बड़ा ज़ुल्म है और हक़ को छिपाने की हर कोशिश आख़िरकार नाकाम होती है, क्योंकि हक़ अपनी वास्तविकता और रौशनी के साथ सामने आकर रहता है।

अपने ख़िताब में उन्होंने क़ुरआन मजीद की इस आयत का हवाला दिया:

«وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا»

और कहा कि उससे बड़ा ज़ालिम कौन हो सकता है जो अल्लाह पर झूठ गढ़े? कुछ लोग अपने विचारों और उद्देश्यों की रक्षा के लिए तथ्यों को छिपाने और सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं, लेकिन हक़ को अधिक समय तक छिपाया नहीं जा सकता। बल्कि उसे दबाने की कोशिशें उसकी सच्चाई को और अधिक उजागर कर देती हैं।

मौलाना लियाक़त अली रांझा ने हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) के मक़ाम और मर्तबे का उल्लेख करते हुए कहा कि जनाबे सैयदा (स.) के अधिकारों और फ़ज़ाइल को छिपाने की कोशिशें की गईं, लेकिन आज दुनिया उनके फ़ज़ाइल, महानता और मुसीबतों से परिचित हो रही है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की सीरत और व्यक्तित्व के उज्ज्वल पहलुओं को प्रभावशाली अंदाज़ में सामने लाया जाना चाहिए, ताकि दुनिया उनकी वास्तविक महानता और शिक्षाओं से परिचित हो सके।

उन्होंने आगे कहा कि इस उद्देश्य के लिए ऐसा तरीक़ा अपनाना ज़रूरी है जो इल्मी, प्रभावशाली और हिकमत पर आधारित हो तथा जिसमें हिंसा, मतभेद फैलाने या किसी भी धर्म अथवा मज़हब के अनुयायियों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई पहलू शामिल न हो। हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) की सीरत को उनके अख़लाक़, फ़ज़ाइल, किरदार और रसूले अकरम (स.) से उनके विशेष संबंध के संदर्भ में पेश किया जाना चाहिए।

अपने ख़िताब के अंत में उन्होंने रसूले अकरम (स.) की प्रसिद्ध हदीस «فَاطِمَةُ بَضْعَةٌ مِنِّي» का हवाला देते हुए कहा कि हज़रत फ़ातिमा (स.) मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं। आप (स.) ने आगे फ़रमाया कि फ़ातिमा की नाराज़गी मेरी नाराज़गी है और उनकी ख़ुशी मेरी ख़ुशी है। यह हदीस हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.) के बुलंद मक़ाम और रसूले अकरम (स.) की निगाह में उनकी महानता को स्पष्ट करती है।

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