हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मौलाना अमीन हैदर हुसैनी, नायब-ए-इमामे जुमा बनारस की इक्तिदा में जुमे की नमाज़ अदा की गई। उन्होने कहा कि इमाम सज्जाद (अ) ने मोमिन की पाँच निशानियाँ बयान फ़रमाईं; गुनाह से परहेज़, तंगदस्ती में सदक़ा, मुसीबत में सब्र, ग़ुस्से के समय तहम्मुल और ख़ौफ़ के बावजूद सच बोलना मोमिन की पहचान है।
मौलाना ने तक़वा-ए-इलाही की अहमियत बयान करते हुए कहा कि अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद की सूरा-ए-बक़रा की आयत 197 में इरशाद फ़रमाया है: “और अपने साथ ज़ादे राह ले लो, और बेशक सबसे बेहतरीन ज़ादे राह तक़वा है।”
उन्होंने कहा कि परवरदिगार इंसान के तमाम हालात से अच्छी तरह अवगत है। वही हमारा ख़ालिक़ और मालिक है, जिसने हमें बेशुमार नेमतों से नवाज़ा है। अल्लाह तआला चाहता है कि इंसान ज़िंदगी के हर मोड़ और हर मैदान में कामयाबी हासिल करे, बुराइयों से दूर रहे और उसकी रज़ा प्राप्त करे। परवरदिगार ने इंसान को वह रास्ता भी बताया है, जिस पर चलकर वह आख़िरत में कामयाबी हासिल कर सकता है और जन्नत का हक़दार बन सकता है।
आख़ेरत के सफ़र के लिए तक़वा सबसे बेहतरीन ज़ादे राह
बनारस के खतीब ए जुमा ने कहा कि जिस तरह इंसान दुनिया में किसी सफ़र पर जाने से पहले ज़रूरी सामान जमा करता है, उसी तरह आख़िरत के सफ़र के लिए भी तैयारी करना आवश्यक है। इंसान की आख़िरी मंज़िल आख़िरत है और इस सफ़र के लिए सबसे बेहतरीन ज़ादे राह तक़वा है। अगर इंसान मुत्तक़ी और परहेज़गार हो, तो अल्लाह तआला उसके लिए मुश्किलात आसान फ़रमाता है।
उन्होंने कहा कि आख़िरत के सफ़र की तैयारी नेक आमाल, अल्लाह की इबादत और उसकी इताअत के ज़रिए की जा सकती है। तक़वा इंसान के भीतर ऐसी मानवी और रूहानी ताक़त पैदा करता है, जिसके ज़रिए वह बड़ी से बड़ी मुश्किल का सामना कर सकता है। मुत्तक़ी इंसान से अगर कोई ग़लती हो जाए, तो वह अल्लाह की बारगाह में तौबा और इस्तिग़फ़ार करता है तथा अपनी ग़लती की भरपाई की कोशिश करता है। अल्लाह तआला इंसान के दिल और उसकी नीयत से पूरी तरह अवगत है।
मौलाना ने कहा कि तक़वा अपनाने वाला इंसान अल्लाह की इताअत करता है और आइम्मा-ए-मासूमीन (अ) की तालीमात पर अमल करता है। क़ुरआन मजीद में भी अल्लाह, उसके रसूल और साहिबाने अम्र की इताअत का हुक्म दिया गया है। इसलिए इंसान को अपनी ज़िंदगी में तक़वा और इताअत को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए।
इमाम सज्जाद (अ) के अनुसार मोमिन की पाँच निशानियाँ
ख़ुत्बे में मौलाना ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन, हज़रत इमाम सज्जाद (अ) की तालीमात का ज़िक्र करते हुए मोमिन की पाँच निशानियों को बयान किया। उन्होंने कहा कि मोमिन की पहचान केवल लोगों के सामने उसके व्यवहार से नहीं होती, बल्कि उसके वास्तविक ईमान का पता उन हालात से चलता है, जब वह अकेला हो या मुश्किलों का सामना कर रहा हो।
मोमिन की पहली निशानी यह है कि वह तन्हाई में भी गुनाह से परहेज़ करता है। हो सकता है कि कोई इंसान लोगों के सामने गुनाह करने से बचता हो, लेकिन असल इम्तिहान उस समय होता है, जब उसके आसपास कोई मौजूद न हो। इंसान लोगों से अपने गुनाह छिपा सकता है, लेकिन अल्लाह तआला से कुछ भी छिपा नहीं सकता।
दूसरी निशानी यह है कि मोमिन तंगदस्ती में भी सदक़ा देता है। वह अपनी आर्थिक परेशानियों के बावजूद दूसरों की मदद करने और ज़रूरतमंदों का ख़याल रखने की कोशिश करता है।
तीसरी निशानी मुसीबत के समय सब्र करना है। मौलाना ने कहा कि सब्र का अर्थ यह है कि इंसान मुश्किल हालात में अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत रखे और उससे मुश्किलों के दूर होने की दुआ करे। इंसान को छोटी-छोटी परेशानियों में भी बे-सब्री से काम नहीं लेना चाहिए। जितना अधिक वह सब्र करेगा, उतना ही अधिक सवाब प्राप्त कर सकता है।
चौथी निशानी ग़ुस्से के समय तहम्मुल और संयम से काम लेना है। उन्होंने कहा कि ग़ुस्से की हालत में इंसान कई बार ऐसा व्यवहार कर बैठता है, जिसका उसे बाद में पछतावा होता है। कुछ परिस्थितियों में ग़ुस्सा स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन उसे हद से आगे नहीं बढ़ने देना चाहिए। ग़ुस्से पर क़ाबू रखने से सामाजिक, पारिवारिक और अख़लाक़ी समस्याओं को हल करने में मदद मिलती है।
पाँचवीं निशानी ख़ौफ़ और डर के बावजूद सच बोलना है। मौलाना ने कहा कि बहुत से लोग संभावित नुक़सान के डर से सच कहने से बचते हैं, जबकि मोमिन को कठिन परिस्थितियों में भी सच्चाई का साथ देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब इंसान अल्लाह के बताए हुए रास्ते और आइम्मा-ए-मासूमीन (अ) की तालीमात को अपनाता है, तो वह अपनी ज़िंदगी में कामयाबी की राह पर आगे बढ़ता है। हमारा दीन चाहता है कि हम दूसरों को फ़ायदा पहुँचाएँ और किसी को नुक़सान न पहुँचाएँ।
इस्लाम ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की तालीम देता है
बनारस के खतीब ए जुमा ने कहा कि इस्लाम की एक अहम विशेषता यह है कि वह इंसान को दूसरों के लिए फ़ायदेमंद बनने और समाज में न्याय क़ायम करने की शिक्षा देता है। अगर किसी पर ज़ुल्म हो रहा हो, तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना ज़रूरी है। शरीयत हमें ज़ुल्म के सामने ख़ामोश रहने की शिक्षा नहीं देती, बल्कि अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ताकीद करती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का अर्थ यह नहीं है कि इंसान ख़ुद किसी पर ज़ुल्म करे। इस्लाम किसी पर अत्याचार करने की अनुमति नहीं देता। यही हमारे दीन की विशेषता है कि वह हर क्षेत्र में इंसाफ़, इंसानियत और दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने पर ज़ोर देता है।
अल्लाह की नेमतों की हिफ़ाज़त के लिए तक़वा अपनाएँ
दूसरे ख़ुत्बे में मौलाना अमीन हैदर ने ख़ुद को और तमाम मोमेनीन को तक़वा-ए-इलाही अपनाने की दावत देते हुए इमाम रज़ा (अ) की हदीस बयान की। उन्होंने कहा कि इमाम रज़ा (अ) ने फ़रमाया है कि अल्लाह की नेमतों के मुक़ाबले में तक़वा इख़्तियार करो और गुनाहों के कारण नेमतों को अपने से दूर न करो।
उन्होंने कहा कि इस हदीस से यह पैग़ाम मिलता है कि इंसान को अल्लाह की नेमतों की क़द्र करनी चाहिए और गुनाहों से बचना चाहिए। अल्लाह तआला ने इंसान को इतनी नेमतें प्रदान की हैं कि वह उनका पूरा हिसाब नहीं कर सकता। क़ुरआन मजीद में भी इस बात की ओर इशारा किया गया है कि अगर इंसान अल्लाह की नेमतों को गिनना चाहे, तो उन्हें पूरी तरह गिन नहीं सकता।
मौलाना ने कहा कि इंसान की साँस लेना भी अल्लाह की एक बड़ी नेमत है। अगर साँस लेने की प्रक्रिया रुक जाए, तो इंसान की ज़िंदगी समाप्त हो सकती है। इसलिए इंसान को हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए और उसकी नेमतों को याद रखना चाहिए।
दुआ, शुक्र और इस्तिग़फ़ार अल्लाह से क़रीबी का ज़रिया
बनारस के नायब इमाम ए जुमा ने कहा कि अल्लाह का शुक्र अदा करना इस बात की निशानी है कि इंसान अपने ख़ालिक़ और नेमतें प्रदान करने वाले परवरदिगार को याद रखता है। दुआ, शुक्र और इस्तिग़फ़ार ऐसे ज़रिये हैं, जिनसे इंसान का अल्लाह के साथ रिश्ता मज़बूत होता है।
उन्होंने कहा कि जब इंसान इन अमलों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लेता है, तो वह अल्लाह की तरफ़ रुझान रखता है और उसकी रहमत का तलबगार बनता है। इंसान को चाहिए कि वह लगातार दुआ करे, अल्लाह का शुक्र अदा करे और अपने गुनाहों की माफ़ी माँगता रहे। अल्लाह तआला अपनी हिकमत और मसलहत के अनुसार बंदों की दुआओं को क़ुबूल फ़रमाता है।
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