हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के अजमेर स्थित तारागढ़ के इमामे जुमा हुज्जतुल इस्लाम मौलाना सय्यद नकी महदी ज़ैदी ने जुमे के खुत्बे में बच्चों के अधिकारों और उनकी इबादत संबंधी तरबीयत के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि माता-पिता को बच्चों के दिलों में नमाज़ के प्रति मोहब्बत पैदा करने, उन्हें इस्लामी शिक्षाओं से परिचित कराने और उनके ईमान को मज़बूत बनाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने अय्याम-ए-अज़ा-ए-फ़ातिमिया के तरबीयती और सामाजिक महत्व को भी रेखांकित किया।
मौलाना नकी महदी ज़ैदी ने इमाम हसन अस्करी (अ) की वसीयत की व्याख्या का सिलसिला जारी रखते हुए बच्चों के अधिकारों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि बच्चों को इबादत की शिक्षा देना माता-पिता की व्यक्तिगत शरई ज़िम्मेदारी है। यदि कोई अन्य व्यक्ति यह ज़िम्मेदारी पूरी कर दे, तो माता-पिता से यह दायित्व समाप्त हो जाता है। इसी तरह, माता-पिता में से कोई एक यदि इस कर्तव्य को पूरी तरह निभाता है, तो दूसरे पर से यह ज़िम्मेदारी समाप्त हो जाती है।
उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) की एक रिवायत का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चों को जल्द से जल्द इस्लामी हदीसें सिखानी चाहिए, इससे पहले कि विरोधी अपने ग़लत विचारों और मान्यताओं से उनके दिलों को प्रभावित कर दें। उन्होंने कहा कि बच्चों के भीतर नमाज़ के प्रति प्रेम और लगाव पैदा करना चाहिए तथा उनके ईमान को मज़बूत बनाने का प्रयास करना चाहिए।
मौलाना नकी महदी ज़ैदी ने सूरह ताहा की इस आयत का हवाला दिया, जिसमें अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अपने घरवालों को नमाज़ का आदेश दें और स्वयं भी इस पर दृढ़ रहें। हम आपसे रोज़ी नहीं मांगते, बल्कि आपको रोज़ी देते हैं और अच्छा अंजाम तक़वा अपनाने वालों के लिए है।
उन्होंने कहा कि कुछ रिवायतों के अनुसार, इस आयत के नाज़िल होने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) चालीस दिनों तक और कुछ रिवायतों के अनुसार छह महीने तक नमाज़ के समय हज़रत अली (अ) और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) के घर के सामने आते थे। आप सलाम करते और फ़रमाते, “ऐ अहलेबैत-ए-नुबूवत! आप पर सलाम हो तथा अल्लाह की रहमत और बरकतें हों।” इसके बाद आप फ़रमाते, “नमाज़, नमाज़! अल्लाह आप पर रहम करे।” फिर आयत-ए-ततहीर की तिलावत करके मस्जिद की ओर चले जाते थे। उन्होंने कहा कि इस घटना से हमें सीख मिलती है कि अपने परिवार के सदस्यों को नमाज़ की पाबंदी के लिए प्रेरित करना चाहिए।
खुत्बे में मौलाना ने उस रिवायत का भी उल्लेख किया, जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने हज़रत अली (अ) से फ़रमाया कि सात कार्य ऐसे हैं, जिनके कारण हज़रत जिब्राईल (अ) ने इच्छा व्यक्त की कि काश वे फ़रिश्ते के बजाय इंसान होते, ताकि इन कार्यों को अंजाम दे सकते। ये सात कार्य हैं:
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जमाअत के साथ नमाज़ अदा करना।
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विद्वानों के साथ बैठना और उनसे ज्ञान प्राप्त करना।
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दो नाराज़ व्यक्तियों के बीच सुलह कराना।
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यतीम का सम्मान करना और उसकी सेवा करना।
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बीमार की अयादत करना।
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जनाज़े में शामिल होना।
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हज के अवसर पर लोगों को पानी पिलाना।
मौलाना नकी महदी ज़ैदी ने अय्याम-ए-अज़ा-ए-फ़ातिमिया के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन दिनों की उपयोगिता सार्वभौमिक है। वर्तमान समय में ये दिन शिया समुदाय ही नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी समाज को नैतिक, तरबीयती और सामाजिक संकटों से उबरने में सहायता कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इन दिनों “दरसगाह-ए-फ़ातिमा” के दरवाज़े खुले रहते हैं, जहाँ विशेष रूप से महिलाओं सहित सभी लोगों को व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में इस्लामी जीवनशैली अपनाने की शिक्षा मिलती है।
उन्होंने बताया कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की शहादत की तारीख़ के संबंध में शिया विद्वानों के बीच दो प्रचलित मत हैं। पहले मत के अनुसार, आपकी शहादत पैग़म्बरे इस्लाम (स) की वफ़ात के 75 दिन बाद हुई, जबकि दूसरे मत के अनुसार यह घटना 95 दिन बाद हुई।
28 सफ़र को पैग़म्बरे इस्लाम (स) की वफ़ात के दिन से गणना करने पर 75 दिनों वाली रिवायत के अनुसार, हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की शहादत 13 जमादिउल अव्वल को हुई, जबकि 95 दिनों वाली रिवायत के अनुसार यह तारीख़ 3 जमादिउस्सानी है। चूँकि शहादत की निश्चित तारीख़ स्पष्ट नहीं है, इसलिए शिया विद्वान और श्रद्धालु दोनों तारीख़ों के अवसर पर अय्याम-ए-फ़ातिमिया मनाते हैं।
मौलाना ने शेख अब्बास क़ुम्मी की पुस्तक मुन्तहा अल-आमाल का हवाला देते हुए कहा कि बेहतर यह है कि दोनों रिवायतों पर अमल किया जाए और दोनों तारीख़ों पर अज़ादारी का आयोजन किया जाए।
खुत्बे के अंतिम भाग में उन्होंने शरई मसले पर चर्चा करते हुए बताया कि किन परिस्थितियों में कुर्सी पर बैठकर नमाज़ पढ़ना जायज़ है। उन्होंने कहा कि क़ियाम (खड़े होना), रुकू और सज्दा नमाज़ के बुनियादी अनिवार्य अंग हैं। यदि व्यक्ति इन कार्यों को करने में सक्षम है, तो उसके लिए इन्हें छोड़ना जायज़ नहीं है। ज़रूरत पड़ने पर दीवार, छड़ी या किसी अन्य व्यक्ति का सहारा लिया जा सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल हल्की थकान या ऐसी परेशानी की वजह से, जिसे सामान्य रूप से असमर्थता या अत्यधिक कठिनाई नहीं माना जाता, कुर्सी पर बैठकर नमाज़ पढ़ना जायज़ नहीं है। इसकी अनुमति उसी व्यक्ति को है, जो वास्तव में असमर्थ हो या जिसे अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता हो।
उन्होंने इस विषय को स्पष्ट करते हुए दो स्थितियां बताईं।
पहली स्थिति: यदि कोई व्यक्ति खड़ा हो सकता है, भले ही सहारे की मदद से, और रुकू भी कर सकता है, लेकिन ज़मीन पर सज्दा करने में असमर्थ है, तो उसके लिए तकबीरतुल इहराम, क़िराअत और रुकू खड़े होकर करना ज़रूरी है। वह केवल सज्दे के समय कुर्सी पर बैठ सकता है और सज्दे के लिए झुककर अपना माथा ऐसी चीज़ पर रखे, जिस पर सज्दा करना सही है, जैसे सामने रखी हुई मिट्टी की तुर्बत।
दूसरी स्थिति: यदि कोई व्यक्ति बिल्कुल भी खड़ा नहीं हो सकता, यहाँ तक कि किसी चीज़ का सहारा लेकर भी नहीं, तो उसे पूरी नमाज़ कुर्सी पर बैठकर अदा करने की अनुमति है। ऐसी स्थिति में वह अपनी क्षमता के अनुसार रुकू और सज्दे के लिए झुकेगा।
अंत में उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति नमाज़ के कुछ हिस्से खड़े होकर अदा करने में सक्षम है, भले ही उसे सहारे की आवश्यकता हो, तो उसके लिए पूरी नमाज़ कुर्सी पर बैठकर पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। नमाज़ के प्रत्येक हिस्से को अपनी वास्तविक क्षमता के अनुसार अदा करना आवश्यक है।
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