हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह महमूद रजब़ी ने क़ुम के मदरसा फैज़िया में छात्रों के एक उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि धार्मिक शिक्षाओं को केवल जानकारी के रूप में हासिल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जरूरी है कि इंसान उन शिक्षाओं को अच्छी तरह समझे और अपनी व्यावहारिक जिंदगी में भी उन पर अमल करे।
उन्होंने कहा कि धार्मिक विषयों में ईश्वर की पहचान, मानवशास्त्र, ज्ञान, दर्शन और नैतिकता जैसे विषयों को तर्कपूर्ण एवं बौद्धिक आधार पर समझना चाहिए, ताकि छात्र अपने अकायद की मजबूत बुनियाद तैयार कर सकें और विभिन्न सवालों एवं शंकाओं का संतोषजनक जवाब दे सकें।
आयतुल्लाह रजब़ी ने आगे कहा कि शैक्षिक और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से छात्रों में धार्मिक भावना, अहलेबैत (अ.स.) के प्रति प्रेम और इस्लामी शिक्षाओं के प्रति लगाव बढ़ता है। उन्होंने इख़लास को इसकी बुनियादी शर्त बताते हुए कहा कि छात्रों को ज्ञान प्राप्त करने और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने का उद्देश्य केवल अल्लाह की प्रसन्नता हासिल करना बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शैक्षिक गतिविधियों की शुरुआत अहलेबैत (अ.स.) से तवस्सुल और दुआ के साथ करना बरकत का कारण है।
उन्होंने छात्रों को अधिक अध्ययन करने, शैक्षिक सवाल उठाने और आपसी विचार-विमर्श की सलाह देते हुए कहा कि उन्हें अपने मन में पैदा होने वाले सवालों को शिक्षकों के सामने रखना चाहिए, ताकि उन्हें सही और ठोस जवाब मिल सकें। उन्होंने कहा कि भविष्य में यही छात्र धार्मिक शिक्षाओं को दूसरों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाएंगे, इसलिए उनका शैक्षिक रूप से मजबूत होना बेहद ज़रूरी है।
ज्ञान और अमल के बीच संबंध पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इमाम ख़ुमैनी (रह.), अल्लामा तबातबाई (रह.) और अन्य महान विद्वानों का जीवन हमारे लिए बेहतरीन आदर्श है। इन महान हस्तियों ने ज्ञान को अमल से जोड़कर दिखाया कि वास्तविक शैक्षिक प्रगति तभी संभव है, जब उसका प्रभाव इंसान के चरित्र और जीवनशैली में भी दिखाई दे।
अंत में उन्होंने कहा कि समाज में पैदा होने वाले नए वैचारिक सवालों और शंकाओं से अवगत रहना तथा उनके प्रमाणिक जवाब हासिल करना भी जरूरी है, क्योंकि मजबूत शैक्षिक आधार और सही धार्मिक समझ ही इंसान को वैचारिक एवं अकायद संबंधी कमजोरियों से सुरक्षित रख सकती है।
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