रविवार 8 नवंबर 2026 - 10:57
मिम्बर से दो मिनट की तकलीफ!

हमारे कुछ ज़ाकिरीन, सम्मानित ख़तीब और शायर मिम्बर से तकरीर के दौरान अक्सर कहते हैं, “बस दो मिनट और तकलीफ कीजिए, फिर मजलिस समाप्त हो जाएगी।” लेकिन अफसोस की बात है कि कभी-कभी ये दो मिनट बढ़कर बीस-तीस मिनट तक पहुंच जाते हैं।

लेखक: मौलाना सैयद करामत हुसैन शऊर जाफरी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हमारे कुछ ज़ाकिरीन, सम्मानित ख़तीब और शायर मिम्बर से तकरीर के दौरान अक्सर कहते हैं, “बस दो मिनट और तकलीफ कीजिए, फिर मजलिस समाप्त हो जाएगी।” लेकिन अफसोस की बात है कि कभी-कभी ये दो मिनट बढ़कर बीस-तीस मिनट तक पहुंच जाते हैं।

इस व्यवहार को केवल समय के प्रति लापरवाही कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हालांकि, हर ऐसी बात को झूठ करार देना भी उचित नहीं है, क्योंकि कभी-कभी वक्ता बातचीत के प्रवाह में समय का सही अनुमान नहीं लगा पाता। लेकिन बार-बार दो मिनट कहकर लंबे समय तक अपनी तकरीर जारी रखना सच्चाई और वादे की पाबंदी के तकाजों के अनुरूप नहीं है।

विशेष रूप से जब वक्ता को पहले से ही अंदाजा हो कि उसकी बात दो मिनट में पूरी नहीं होगी, तो ऐसी स्थिति में इस तरह कहना वास्तविकता के विपरीत बात करने के समान हो सकता है। इसलिए इससे यथासंभव बचना चाहिए। मिम्बर से सच्चाई, अमानतदारी और वादे की पाबंदी का सबक देने वालों के लिए जरूरी है कि उनकी अपनी बातचीत भी इन उच्च नैतिक मूल्यों की प्रतिबिंब हो।

यह बात देखने में भले ही मामूली लगे, लेकिन वास्तव में इसका संबंध समय की पाबंदी, श्रोताओं के सम्मान और कथनी-करनी में समानता से है। मिम्बर केवल ज्ञान और धार्मिक प्रचार का स्थान नहीं है, बल्कि यह नैतिकता और चरित्र निर्माण की व्यावहारिक शिक्षा देने का माध्यम भी है।

यदि वक्ता को अपनी बात आगे जारी रखनी है, तो उसे दो मिनट कहने के बजाय स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि उसे कुछ और समय की आवश्यकता है। श्रोताओं से अतिरिक्त समय मांगने के बाद भी उनके समय का ध्यान न रखना उचित व्यवहार नहीं है।

याद रखिए! समय के महत्व पर भाषण देने से पहले दूसरों के समय की कद्र करना जरूरी है।

मिम्बर की महानता केवल ऊंची आवाज में तकरीर करने में नहीं, बल्कि वक्ता के अनुशासन, वादे की पाबंदी और नैतिक चरित्र में भी दिखाई देती है।

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