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हज़रत इमाम असकरी अलैहिस्सलाम और उरूजे फ़िक्र
हौज़ा / आले मोहम्मद अलैहेमुस्सलाम जो उरूजे फिक्र मे खास मक़ाम रखते है और इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम उन्ही हज़रात मे की एक कड़ी है।
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आयतुल्लाहिल अज़्मा शुबैरी ज़ंजानी फिक़्ह और नैतिकता के शिखर पर थे
क़ुम के हौज़ा-ए-इल्मिया के जामेअ मुदर्रिसीन ने आयतुल्लाह अज़्मा शुबैरी ज़ंजानी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि यह परहेज़गार फ़क़ीह शैक्षिक और नैतिक स्थान के साथ-साथ आध्यात्मिक गुणों और विशेषताओं में भी उच्च शिखर पर थे।
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दिन की हदीस । सलाम करने से घर में बरकत
पैग़म्बरे अकरम (स) ने एक हदीस में सलाम करने के जीवन में भलाई और बरकत बढ़ाने वाले प्रभाव की ओर इशारा किया है।
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इमाम हसन अस्करी (अ) की ग़ैबत के दौर के लिए प्रभावी और दूरदर्शी तैयारी
इमाम हसन अस्करी (अ) ने बड़ी समझदारी और दूरदर्शिता के साथ ग़ैबत के दौर के लिए माहौल तैयार किया और लोगों को इस कठिन और संवेदनशील दौर के लिए तैयार किया।
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अरबईन-ए-नबवी, शहादत-ए-फ़ातिमी
हौज़ा / हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शहादत के चालीस दिन बाद मदीना एक और अज़ीम सानिहे का गवाह बना। एक रिवायत के मुताबिक 8 रबी-उस-सानी 11 हिजरी को बज़अतुल्मुस्तफ़ा, हामी-अल-मुर्तज़ा, उम्मुल-अइम्मा-तिल-हुदा हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की शहादत हुई। नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की शहादत का ग़म अभी ताज़ा ही था कि अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम पर फ़िराक़-ए-ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का एक और सदमा टूट पड़ा।
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इमाम हसन अस्करी (अ) के असहाब में इल्मी लेखन और शोध का सिलसिला
इमाम हसन अस्करी (अ) के असहाब में ऐसे विद्वान भी मौजूद थे, जो विभिन्न ज्ञान के विषयों पर शोध और लेखन का कार्य करते थे। उनकी वैज्ञानिक गतिविधियों से उस दौर के ज्ञान के माहौल और आइम्मा-ए-अहलेबैत (अ) के असहाब के व्यापक ज्ञान का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
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इमाम हसन अस्करी (अ) की इमामत, जीवन, संघर्ष और शियो के मार्गदर्शन से जुड़े 4 सवाल
इमाम हसन अस्करी (अ) ने अब्बासी शासन के कड़े पहरे और लगातार दबाव के बीच इमामत की जिम्मेदारी संभाली। सरकार की सख्त निगरानी के बावजूद उन्होंने अपने विश्वसनीय प्रतिनिधियों के माध्यम से शिया समुदाय से संपर्क बनाए रखा और उन्हें धार्मिक मार्गदर्शन दिया। उन्होंने शियाओं को ऐसे दौर के लिए भी तैयार किया, जब इमाम से प्रत्यक्ष संपर्क संभव नहीं रहेगा।
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सहिफ़ा-ए-ज़िंदगी | मज़लूमियत को सामर्थ्य और शांति में बदल देने वाला उपाय
सब्र करने वाला मज़लूम वह व्यक्ति है जो अपने हक़ को पहचानता है और उसे हासिल करने के लिए प्रयास भी करता है, लेकिन साथ ही वह अत्याचार को अपने ईमान और अल्लाह के प्रति अपने तौहीदी विश्वास को प्रभावित नहीं करने देता।
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शरई अहकाम | संपत्ति नष्ट होने की स्थिति में मुआवज़े की राशि कैसे तय होगी?
आयतुल्लाह शहीद सय्यद अली ख़ामेनेई ने “नुकसान की भरपाई वर्तमान कीमत के अनुसार या नुकसान के समय की कीमत के अनुसार” से संबंधित एक सवाल का जवाब दिया है।
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लोगो के बीच लोकप्रियता
इमाम हसन असकरी (अ) ने एक हदीस में इंसान के लोगों के बीच लोकप्रिय होने के एक कारण की ओर संकेत किया है।
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मिम्बर ए हरम और दरबार ए इक़्तदार: जब दीन तख्त की ज़बान बोलने लगे
इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि धर्म को नुकसान हमेशा धर्म के दुश्मनों से ही नहीं पहुंचा, बल्कि कभी-कभी उन लोगों से भी पहुंचा जिन्होंने धर्म का लिबास पहनकर सत्ता की चौखट को अपना केंद्र बना लिया। जब किसी विद्वान की कलम शासक की इच्छा पर निर्भर हो जाए, मिम्बर उसके इशारे का इंतजार करने लगे और फतवा राजनीतिक हितों की रक्षा करने लगे, तो सिर पर साफा और पगड़ी तो रह जाती है, लेकिन विचारों की स्वतंत्रता और सच बोलने की ताकत कमजोर पड़ जाती है। सिर पर अकील होता है, लेकिन बुद्धि गायब हो जाती है।
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परिवार के साथ अच्छा व्यवहार
इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) ने एक रिवायत में परिवार के साथ अच्छे व्यवहार के इंसान की उम्र पर पड़ने वाले प्रभाव की ओर इशारा किया है।
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शरई अहकाम | समुद्री जीवों का मांस
हज़रत आयतुल्लाह वहीद ख़ुरासानी ने “समुद्री जीवों के मांस” से संबंधित एक सवाल का जवाब दिया है।
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तबलीग़ पर जोर: वैचारिक शिक्षा से लेकर संगठनात्मक गतिविधियों तक
बहाई धर्म के आंतरिक साहित्य और दस्तावेजों के अध्ययन से पता चलता है कि इस आंदोलन में प्रचार की गतिविधि केवल एक धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह विशेष रूप से ईरान पर ध्यान केंद्रित करने वाली एक संगठनात्मक परियोजना में बदल गई है। इस दृष्टिकोण में आध्यात्मिक शब्दावली और आभासी संपर्कों के माध्यम से सामाजिक सोच में बदलाव की जमीन तैयार करने का प्रयास किया जाता है। इसलिए इस विषय का वैज्ञानिक और दस्तावेज़ी अध्ययन करना और भी आवश्यक हो जाता है।
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एक-दूसरे के लिए मग़फ़ेरत की दुआ करना
इमाम-ए-जमाना (अ) ने एक रिवायत में मोमिनों के एक-दूसरे के लिए मग़फ़ेरत की दुआ करने के महत्व और खास शियो की एक निशानी का उल्लेख किया है।
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इस्लाम में चिंतन-मनन का महत्व और मानव जीवन पर इसके प्रभाव
यदि इस्लामी दृष्टिकोण से चिंतन-मनन के महत्व का जायजा लिया जाए तो पता चलता है कि अल्लाह की पहचान और उसकी विशेषताओं को समझना, संसार की व्यवस्था पर विचार किए बिना संभव नहीं है। जब तक इंसान इस सवाल पर विचार नहीं करता कि उसका मूल और शुरुआत क्या है, उसे कहां लौटकर जाना है और उसे इस दुनिया में किस उद्देश्य से भेजा गया है, तब तक वह अपनी सृष्टि के वास्तविक उद्देश्यों से अनजान रहता है और एक उद्देश्यहीन जीवन बिताता है।
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रिसालत का अपमान: क्या पैगंबर के इतने बड़े आदेश की अवहेलना गुनाह और अपमान नहीं?
घटना-ए-क़िरतास व क़लम उस समय हुई, जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि अपने जीवन के अंतिम दिनों में थे। आपने अपने पास मौजूद लोगों से कहा कि मेरे लिए लिखने का सामान लाओ, मैं तुम्हारे लिए ऐसी लिखित बात लिख दूंगा, जिसके बाद तुम कभी गुमराह नहीं होगे।
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मोमिनों के बीच मोहब्बत और मेल-मिलाप
इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) ने एक हदीस में मोमिनों के बीच प्रेम, आपसी लगाव और भाईचारा पैदा करने के महत्व की ओर संकेत किया है।
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सुबह-ए-अज़ल कौन था और अज़ली संप्रदाय कैसे अस्तित्व में आया?
बाबीयत के इतिहास में सुबह-ए-अज़ल एक महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। बाब की मृत्यु के बाद बाबी आंदोलन के नेतृत्व और बाद में अज़ली और बहाई समूहों के विभाजन के संदर्भ में उनका नाम सामने आता है।
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शरई अहकाम | किस्तों में ख़ुम्स की रकम अदा करना
सालाना ख़ुम्स की 60 लाख तोमान की रकम एक साथ अदा करने में आर्थिक परेशानी के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में हज़रत आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी के प्रतिनिधि ने कहा है कि इस रकम को अधिकतम दो से तीन साल की अवधि में किस्तों के रूप में अदा करना जायज़ है।