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काफ़िर से समझौता; कैसे?
कुफ़्र अर्थात सत्य को जान-बूझकर न मानना और उससे मुँह मोड़ लेना की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए, मोमिन और काफ़िर के बीच मूल सिद्धांत, उद्देश्य, योजना और कार्यप्रणाली में कोई समानता नहीं रहती। इसलिए न तो उनके बीच रणनीतिक सामंजस्य संभव है और न ही वैचारिक समानता पर आधारित कोई स्थायी समझौता। हालांकि, उनके साथ व्यवहार के तरीके और स्तर सभी मामलों में एक जैसे नहीं होते।
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शरई अहकाम: किराया न देने का नमाज़ के सही होने पर असर
हज़रत आयतुल्लाह शहीद सय्यद अली ख़ामनेई ने किराया न देने का नमाज़ के सही होने पर असर से संबंधित एक प्रश्न का उत्तर दिया है।
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ज़िक्र-ए-हुसैन (अ.) और “तिजारत” का भ्रम
मुहर्रम का महीना आते ही कुछ हलकों में यह बहस शुरू हो जाती है कि क्या उलमा, ज़ाकिर, ख़तीब और नौहाख़्वाँ हज़रात के लिए मजलिस-ए-अज़ा के बदले हदिया स्वीकार करना सही है या नहीं। कुछ लोग बड़ी हमदर्दी और ख़ुलूस के साथ यह राय रखते हैं कि इमाम हुसैन (अ) के ग़म पर हदिया लेना इख़लास की भावना के विरुद्ध है।
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क्या विवाह के शुरुआती समय में बच्चों का पूरा जीवन-यापन संभाल लेना उनके लिए उचित है?
बच्चों के वैवाहिक जीवन की शुरुआत में उनकी पूरी आर्थिक सुविधा उपलब्ध करा देना, भविष्य की कठिनाइयों को सहने की क्षमता को कम कर देता है और मेहनत करने की प्रेरणा को भी घटा देता है। इससे माता-पिता की पूँजी भी अनावश्यक रूप से समाप्त हो जाती है। समझदारी भरी मदद वह है जिसमें केवल आवश्यक जरूरतें पूरी की जाएँ और बच्चों के लिए आत्मनिर्भरता तथा आर्थिक विकास का मार्ग खोला जाए।
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विद्वानों के वाक़ेआत | इमाम हुसैन (अ) की मजलिस मे आने वाले अज़ादारो का सम्मान
आयतुल्लाह बहजत (र) इमाम हुसैन (अ) की मजलिसों में स्वयं कई काम किया करते थे। वे दरवाज़े के पास खड़े होकर आने वाले अज़ादारो का सम्मान करते थे, मेहमाननवाज़ी और स्वागत की व्यवस्था की निगरानी करते थे, और यह विनम्रता उन्होंने अपने शिक्षको से सीखी थी। जैसा कि मरहूम ग़रवी क़म्पानी भी समावर के पास बैठकर लोगों को चाय परोसते थे।
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शरई अहकाम | दुश्मन के विरुद्ध रक्षा का अनिवार्य होना
हज़रत आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी ने “दुश्मन के विरुद्ध रक्षा के अनिवार्य होने” के संबंध में पूछे गए प्रश्न का उत्तर दिया है।
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भारतीय जहाज़ों पर अमेरिकी आक्रामकता और हमारी वैश्विक साख तथा प्रतिष्ठा पर उसके प्रभाव
भारत एक ऐसे देश के रूप में उभरकर सामने आया था जो यूरोपीय उपनिवेशवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मुकाबले में उत्पीड़ित और वंचित लोगों का समर्थक था। आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक ओर उसे अपने राजनीतिक और आर्थिक मामलों में अमेरिकी संकेतों का इंतज़ार करना पड़ता है तथा अमेरिकी इच्छानुसार नीतियाँ अपनानी पड़ती हैं। अमेरिका जिस देश के साथ आर्थिक संबंध समाप्त करने को कहे, भारत को वही करना पड़ता है, चाहे उससे देश और जनता को कितना ही नुकसान क्यों न उठाना पड़े।
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इमाम खुमैनी और कर्बला का इंकेलाब
कर्बला के क्रांतिकारी संदेश को सिर्फ मातम तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि उन्हें सामाजिक जागरूकता और ज़ुल्म व अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का मंच बनाना है। इमाम खुमैनी की तरह हम भी इन धार्मिक सभाओं को सुधार का संदेश पहुँचाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। और हमें 'हर दिन आशुरा है, हर ज़मीन कर्बला है' के दर्शन को अपनाते हुए, जहाँ भी ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी या शोषण हो, उसके खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए।
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गरीब और अमीर के साथ समान सम्मान
इमाम रज़ा (अ) ने एक रिवायत में इंसानों की गरिमा बनाए रखने और लोगों के साथ व्यवहार में भेदभाव से बचने पर ज़ोर दिया है।
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क्यों कई वर्षों तक कुरआन की तिलावत करने के बावजूद इंसान “सत्य और असत्य की पहचान”…
बहुत से लोगों का मानना है कि मशारी राशिद अल-अफ़ासी इस हदीस का स्पष्ट उदाहरण हैं: “बहुत से क़ुरआन पढ़ने वाले ऐसे होते हैं जिन पर क़ुरआन लानत करता है।”
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क्या हज़रत महदी (अ) के ज़ुहूर के बाद काफ़िरों को तौबा का अवसर मिलेगा?
ज़ुहूर और क़याम के चरण में अंतर है। पहले चरण में हज़रत महदी (अ) चमत्कारों और तर्कों के माध्यम से सभी लोगों को इस्लाम की ओर आमंत्रित करेंगे और तौबा का द्वार खुला रहेगा। लेकिन जो लोग इस चरण के अंत तक ईमान नहीं लाएँगे और अपने पापों पर अड़े रहेंगे, उनके लिए जब हज़रत की तलवार के साथ सामना होगा, तब भय या विवशता में की गई उनकी तौबा स्वीकार नहीं की जाएगी।
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शरई अहकाम । बच्चों के पालन-पोषण में ज़बरदस्ती की भूमिका
हज़रत आयतुल्लाह सिस्तानी ने "बच्चों के पालन-पोषण में ज़बरदस्ती की भूमिका" के संबंध में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर दिया है।
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किसी मोमिन की समस्या का समाधान करना
इमाम रज़ा (अ) ने एक रिवायत में मोमिनों की समस्याओं को दूर करने के प्रतिफल का उल्लेख किया है।
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इमाम हुसैन (अ) के नाम से एक युवा का मार्गदर्शन
आशूरा की रात, एक लड़की जो अत्याचार का शिकार होने वाली थी, उसने उस बदमाश युवक से कहा: “इमाम हुसैन के साथ सौदा करो।” उस नाम ने उसके दिल पर असर किया और उसने लड़की को छोड़ दिया। अंततः वही युवक एक आध्यात्मिक परिवर्तन के सफर से गुज़रते हुए हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स) की विशेष कृपा का पात्र बना।
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शरई अहकाम | पानी और बिजली की फ़ुजूलख़र्ची
आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी ने "पानी और बिजली की फ़ुजूलख़र्ची" के संबंध में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर दिया है।
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मुबाहेले के माध्यम से इमाम काज़िम (अ) द्वारा अंतिम प्रमाण प्रस्तुत करना
हज़रत इमाम मूसा बिन जाफ़र काज़िम (अ) ने फ़रमाया: हारून रशीद ने आदेश दिया कि मुझे मदीना से उसके पास (बग़दाद) लाया जाए। एक सभा में उसने मुझसे पूछा: "आप अपने शियाओं को इस बात से क्यों नहीं रोकते कि वे आपको ‘या इब्न रसूलिल्लाह’ (ऐ अल्लाह के रसूल के बेटे) कहें और आपको पैग़म्बर की संतान कहकर पुकारें? जबकि आप लोग तो अली की संतान हैं, और फ़ातिमा तो केवल एक माध्यम थीं। संतान की वंशावली पिता की ओर से मानी जाती है, माँ की ओर से नहीं।"
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दूसरों पर एहसान जताने की आफ़त
इमाम हसन मुजतबा (अ) ने एक रिवायत में एहसानों और नेकियों को गिन-गिनकर जताने के नुकसान की ओर संकेत किया है।
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ईदे मुबाहिला मुबारक
हौज़ा / मुबाहिला मुबारक, यह माजरा 10 हिजरी का है जब अरब में मौजूद एक इलाक़ा जिसको नजरान के नाम से जाना जाता था वहाँ के ईसाइयों ने अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (स) से हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में बहस की और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा बताया (माज़अल्लाह) और हुज़ूर पाक (स) के लाख समझाने के बावजूद कि हज़रत ईसा (अ) अल्लाह के बेटे नहीं बल्कि अल्लाह की तरफ़ से नबी बनाये गए हैं इस बात का इन्कार करते रहे जब नजरान के ईसाइयों के बड़े बड़े पादरी भी हुज़ूर (स) की बात को नहीं मानें बल्कि हुज़ूर पाक (स) को और दीने इस्लाम को ही झूठा कहने लगे (माज़अल्लाह) तो फिर अल्लाह ने सूरए आले इमरान की आयत नज़िल हुई।
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जन्म से पतन तक: इज़राइल और वह परियोजना जिसे राज्य के रूप में पेश किया गया
इज़राइल कोई वास्तविक स्वतंत्र देश नहीं, बल्कि पश्चिम का एक सैन्य छावनी (आर्मी बेस) और एक औपनिवेशिक परियोजना है, जिसकी संरचना वॉशिंगटन में योजनाबद्ध ढंग से तैयार की गई है। यह एक अस्थिर अस्तित्व है जिसके पतन के संकेत स्पष्ट हैं, और शहीद जनरल क़ासिम सुलेमानी के अनुसार यह 25 साल भी नहीं टिकेगा।
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इमाम महदी (अ) के ज़ुहूर और उनके शासन में महिलाओं की भूमिका और स्थान (अंतिम भाग)
इतिहास उन महिलाओं का दर्पण है जिनके दिल ईमान और इलाही ज्ञान के प्रकाश से चमक चुके थे। वही महिलाएँ, इस ईश्वरीय संबंध की बरकत से, रजअत करने वालों और अंतिम ईश्वरीय उत्तराधिकारी की मददगारों में शामिल होंगी।