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अरबईन: प्रेम और वफ़ादारी की महान यात्रा
अरबईन की पैदल यात्रा केवल चलने का नाम नहीं है, बल्कि यह हज़रत ज़ैनब (स.) का रास्ता है; वह रास्ता जिस पर बीबी ज़ैनब (स.) ने काफ़िले के साथ अपने भाई के बिना सिर वाले शरीर का सामना किया, लेकिन फिर भी रुकी नहींं। आज हम उसी रास्ते पर कदम रखते हैं।
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रिवायतों में हज़रत सैय्यदुश्शोहदा (अ.) की ज़ियारत की अद्वितीय फ़ज़ीलत; दूर से ज़ियारत…
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन हुसैनी ने अरबईन-ए-हुसैनी के आगमन की ओर संकेत करते हुए कहा कि उचित है कि ज़ायरीन ज्ञान, इख़लास और शुद्ध नीयत के साथ, विशेष रूप से सभी शहीदों और इस्लामी क्रांति के शहीद नेता (रह.) तथा अन्य शहीदों की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए इस प्रकाशमय यात्रा में भाग लें और इसके आध्यात्मिक लाभों से फ़ायदा उठाएँ।
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इमाम हुसैन (अ.) के ज़ायर पर अल्लाह तआला फ़ख़्र करता है
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.) ने एक रिवायत में हज़रत सैय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन (अ.) के ज़ायरीन के अल्लाह तआला के निकट उच्च स्थान की ओर संकेत किया है।
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हज़रत इमाम हुसैन अ.स.के ज़ायर पर अल्लाह तआला का फ़ख्र
हौज़ा / इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. ने एक रिवायत में हज़रत सैय्यदुश्शोहदा इमाम हुसैन अ.स.के ज़ायरों के अल्लाह तआला के यहाँ उच्च और सम्मानित स्थान की ओर इशारा किया हैं।
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आज़ादी का सफ़र: क़ुर्बानी, जद्दोजहद और हमारा क़ौमी फ़र्ज़
हिन्दुस्तान की आज़ादी की दास्तान 15 अगस्त 1947 से शुरू नहीं होती, बल्कि इसकी बुनियाद 1757 की जंगे-प्लासी** में पड़ती है, जब **नवाब सिराजुद्दौला** ने सबसे पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी के सियासी मंसूबों को पहचान लिया और उसके ख़िलाफ़ डटकर खड़े हो गए।
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हज़रत इमाम हुसैन अ.स. के ज़ायरीन के लिए फ़रिश्तों की दुआ
हौज़ा / हज़रत इमाम इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स.ने एक रिवायत में हज़रत इमाम हुसैन अ.स. के ज़ायरीन के लिए फ़रिश्तों की दुआके बारे में फरमाया हैं।
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फ़ख्र-ए-बंगाल , हाजी मुहम्मद मोहसिन
हम फ़ख्र-ए-बंगाल, हाजी मुहम्मद मोहसिन की विलादत के मुबारक मौक़े पर इस अज़ीम मुहसिन-ए-इंसानियत को ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं, जिनकी ज़िंदगी ईसार, बे-लौस ख़िदमत, फ़ैयाज़ी और इंसानी हमदर्दी का रौशन इस्तिआरा थी।
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ज़ाइरीन-ए-अरबईन इस्लाम, क़ुरआन और आशूरा की संस्कृति के रक्षक हैं: हुज्जतुल-इस्लाम…
मस्जिद-ए-मुक़द्दस-ए-जमकरान के मुत्तवली हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैयद अली अकबर उजाक़नेज़ाद ने कहा है कि अरबईन ने आशूरा के संदेश को जीवित रखा है और आशूरा इस्लाम की स्थिरता का ज़मानतदार है, इसी कारण ज़ाइरीन-ए-अरबईन का हर क़दम इस्लाम, क़ुरआन और संस्कृति-ए-आशूरा की सुरक्षा की ओर एक क़दम है।
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हर इंसान की तमन्ना इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) ने एक रिवायत में क़यामत के दिन इमाम हुसैन (अ) के ज़ायरीन के उच्च स्थान और सम्मान का उल्लेख किया है।
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तारीख़ के ज़ख़्म फिर ताज़ा हो गए!
कर्बला सिर्फ़ एक शहर का नाम नहीं, बल्कि हक़, हुर्रियत, वफ़ा, ईसार और ज़ुल्म के मुक़ाबले में इस्तिक़ामत की वह अमर निशानी है, जिसने चौदह सदियों से इंसानियत को एक ज़िंदा पैग़ाम दिया है। यही वजह है कि तारीख़ के मुख़्तलिफ़ दौरों में कर्बला और अहले-बैत-ए-रसूलؐ से जुड़े मुक़द्दस मुक़ामात को निशाना बनाने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन हर दौर में हुसैनؑ की फ़िक्र पहले से ज़्यादा मज़बूत होकर सामने आई है।
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अरबईन-ए-हुसैनी का नैतिक संदेश
कर्बला, जो कि मज़लूमियत का प्रतीक है, इसे केवल इमाम हुसैन (अ) की मज़लूमियत तक सीमित रखना उचित नहीं है, बल्कि कर्बला ईसार, क़ुर्बानी , अख़लाक़ और किरदार, तहज़ीब व तमद्दुनऔर इंसानी क़द्रों का वह कोह-ए-हिमालय है, जिससे टकराकर तूफ़ान-ए-यज़ीदियत स्वतः ही नष्ट और मिट जाता है।
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इमाम हुसैन अ.स.की ज़ियारत से परेशानियाँ दूर होती हैं
हौज़ा / हज़रत इमाम जफार सादीक अ.स.ने एक रिवायत में इमाम हुसैन अ.स.की ज़ियारत करने के सवाब की ओर इशारा किया हैं।
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हक़ और बातिल का पैमाना
हौज़ा / हज़रत इमाम मूसा काज़िम अ.स. ने एक रिवायत में सत्य बोलने और असत्य का साथ छोड़ने का वास्तविक पैमाना बताया है।
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हज़रत सकीना (स) कर्बला की ख़ामोश सदा और मज़लूमियत-ए-हुसैन(अ)की अबदी सनद
हज़रत इमाम हुसैन (अ.) को हज़रत सकीना (स.अ.) से बेहद मोहब्बत थी। यह मोहब्बत सिर्फ़ एक बाप की फ़ितरी शफ़क़त नहीं थी, बल्कि रूहानी उन्स, क़ल्बी वाबस्तगी और अहल-ए-बैत (अ.) के पाकीज़ा ख़ानदानी माहौल का ख़ूबसूरत मज़हर थी। कुछ मुअतबर माख़ज़ में इस मोहब्बत की तर्जुमानी करते हुए ये अश्आर इमाम हुसैन (अ.) की तरफ़ मंसूब किए गए हैं:
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सत्य की कड़वाहट और असत्य की मिठास
हौज़ा / हज़रत रसूल अल्लाह स.ल.व.व.ने एक रिवायत में फरमाया, सत्य और असत्य की वास्तविकता तथा सांसारिक इच्छाओं का अनुसरण करने के परिणाम को स्पष्ट किया है।
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ज़ुबान की तरबीयत
हौज़ा / बेटी अपनी मां को देखती है और उनसे ज़िंदगी के आदाब, शौहर से पेश आने के तरीक़े घर गृहस्थी संभालना और बच्चों की परवरिश का तरीक़ा सीखती है और अपने बाप को देख कर मर्दों के रवैये को पहचानती है, बेटा अपने बाप से ज़िंदगी के उसूलों और तौर तरीक़ों को सीखता है, वह अपने बाप से बीवी और बच्चों से सुलूक करने को सीखता है, और अपनी मां के तौर तरीक़ों से औरत को पहचानता है और अपनी आने वाली ज़िंदगी के लिए उसी को देख कर प्लान बनाता हैं।
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अल्लाह की रहमत और राहत मिलने की उम्मीद
हौज़ा / हज़रत इमाम अली (अ.स.) ने एक रिवायत में मोमिनों को फ़रज का इंतज़ार करने तथा अल्लाह की रहमत से कभी निराश न होने की नसीहत की है।
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अरबईन की पैदल यात्रा के दौरान कौन सा ज़िक्र पढ़ें?
हौज़ा / इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक रिवायत में गुनाहगार के लिए इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत के रास्ते का एक महत्वपूर्ण अमल बताया गया है।
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ख़ुदा के नज़दीक सबसे पसंदीदा अमल
अमीरुल मोमेनीन इमाम अली (अ) ने एक रिवायत में नमाज़ की फ़ज़ीलत और उसे वक़्त पर अदा करने की अहमियत की ओर इशारा फ़रमाया है।
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लोकतंत्र का बदलता चेहरा और मुसलमानों के लिए सिमटती ज़मीन!
भारत की लोकतांत्रिक पहचान उसके संविधान, बहुलतावाद और धार्मिक विविधता पर आधारित रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद इस लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियादें कमजोर होती दिखाई देने लगीं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर सवाल उठे, क्योंकि अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों के लिए संवैधानिक समानता केवल एक सैद्धांतिक दावा बनकर रह गई।