हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,وَإِذِ ابْتَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ رَبُّهُ بِكَلِمَاتٍ فَأَتَمَّهُنَّ ۖ قَالَ إِنِّي جَاعِلُكَ لِلنَّاسِ إِمَامًا ۖ قَالَ وَمِن ذُرِّيَّتِي ۖ قَالَ لَا يَنَالُ عَهْدِي الظَّالِمِينَ (سورہ بقرہ، آیت 124)
व इज़िबतला इब्राहीम रब्बुहु बिकलिमातिन फअतम्महुन्न क़ाला इन्नी जाइलुक लिन्नासि इमामा, क़ाला व मिन ज़ुर्रियती, क़ाला ला यनालु अहदिज़्ज़ालिमीन
(सूरह बक़रह, आयत 124)
और उस समय को याद करो जब अल्लाह ने इब्राहीम अलैहिस्सलाम को कुछ कलिमात के द्वारा आज़माया, और उन्होंने उन्हें पूरा कर दिया। तब अल्लाह ने फरमाया: “मैं तुम्हें लोगों का इमाम बनाने वाला हूँ।” उन्होंने अर्ज़ किया: “और मेरी औलाद में से?” अल्लाह ने फरमाया: “मेरा यह अहद ज़ालिमों तक नहीं पहुँचेगा।”
मुफ़ज़्ज़ल बिन उमर बयान करते हैं कि हमने इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम से इस आयत के बारे में पूछा: “और जब इब्राहीम को उनके रब ने कुछ कलिमात के ज़रिये आज़माया।”
आपने फरमाया: ये वही कलिमात थे जो आदम अलैहिस्सलाम ने अपने रब से हासिल किए थे, जिनके वसीले से अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल फरमाई। वे कलिमात यह थे कि आदम अलैहिस्सलाम ने दुआ की: “ऐ मेरे रब! मैं तुझसे मुहम्मद, अली, फ़ातिमा, हसन और हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) के हक़ के वसीले से सवाल करता हूँ कि तू मेरी तौबा क़बूल कर ले।”
तो अल्लाह ने उनकी तौबा क़बूल फरमा ली। निःसंदेह वही बहुत तौबा क़बूल करने वाला और अत्यन्त दयालु है।
मैंने अर्ज़ किया: ऐ फरज़ंदे रसूलिल्लाह! “फिर इब्राहीम ने उन्हें पूरा कर दिया” का क्या अर्थ है?
आपने फरमाया: इसका अर्थ यह है कि उन कलिमात को क़ाइम अलैहिस्सलाम तक पूरा किया गया—यानी बारह इमामों तक; जिनमें से 9 इमाम, हज़रत हुसैन अलैहिस्सलाम की औलाद में से हैं।
मैंने पूछा: “और इस (कलिमा) को अपनी नस्ल में बाक़ी रखा” का क्या मतलब है?
आपने फरमाया: इससे मुराद इमामत है, जिसे अल्लाह ने हुसैन अलैहिस्सलाम की नस्ल में क़ियामत तक बाक़ी रखा।
मैंने अर्ज़ किया: ऐ फरज़ंदे रसूलिल्लाह! इमामत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की औलाद में ही क्यों क़रार दी गई, इमाम हसन अलैहिस्सलाम की औलाद में क्यों नहीं? जबकि दोनों रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम के नवासे और जन्नत के जवानों के सरदार हैं?
तो आपने फरमाया: निःसंदेह मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम दोनों नबी और भाई थे, लेकिन अल्लाह ने नुबूवत को हारून अलैहिस्सलाम की नस्ल में रखा, मूसा अलैहिस्सलाम की नस्ल में नहीं। और किसी को यह अधिकार नहीं कि वह कहे: “अल्लाह ने ऐसा क्यों किया?”
इसी प्रकार इमामत अल्लाह की ख़िलाफ़त है। किसी को यह कहने का अधिकार नहीं कि इसे हुसैन अलैहिस्सलाम की नस्ल में क्यों रखा गया और हसन अलैहिस्सलाम की नस्ल में क्यों नहीं।
क्योंकि अल्लाह अपने अफ़आल (कामों) में हिकमत वाला है। उससे उसके कामों के बारे में सवाल नहीं किया जाएगा, बल्कि लोगों से सवाल किया जाएगा।
(अल इन्साफ, जि० 1, पेज 425)
आयत-ए-इमामत और रिवायत-ए-मुफ़ज़्ज़ल की रोशनी में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अहले बैत अलैहिमुस्सलाम से तवस्सुल न केवल एक जायज़ और शरई अमल है, बल्कि ईमान की रूहानी तकमील का ज़रिया भी है। यह तौहीद के दायरे के अंदर रहते हुए अल्लाह के मुक़र्रब बंदों के माध्यम से उसकी बारगाह तक पहुँचने का रास्ता है।
इमामत एक इलाही अहद है, और तवस्सुल उस अहद से जागरूक सम्बद्धता का ऐलान। जो दिल इस नूर-ए-इमामत से रोशन हो जाता है, वह गुमराही के अंधेरों से निकलकर हिदायत के उजाले में प्रवेश कर जाता है।
अतः अहले बैत अलैहिमुस्सलाम से तवस्सुल वास्तव में सआदत (सफलता और कल्याण) का रहस्य है—क्योंकि यह हमें अल्लाह से जोड़ता है, उसके प्रिय बंदों की मुहब्बत प्रदान करता है, और हमारे ईमान को वैचारिक स्थिरता, आध्यात्मिक ऊष्मा तथा व्यवहारिक पूर्णता प्रदान करता है।
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