शनिवार 21 फ़रवरी 2026 - 12:10
भारतीय धार्मिक विद्वानों का परिचय | अल्लामा सय्यद अहमद बिन इब्राहीम नसीराबादी

पेशकश: दनिश नामा-ए-इस्लाम, इन्टरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर दिल्ली

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, अल्लामा सय्यद अहमद नसीराबादी मारूफ़ बा अल्लामा हिन्दी दिसम्बर 1878 में सरज़मीने लखनऊ पर पैदा हुए। आप तीन बरस के थे तो अपने वालिद आयतुल्लाह सय्यद इब्राहीम के हमराह इराक तशरीफ़ ले गए जहाँ आप ने रौज़ा ए इमाम अली के ज़ेरे क़ुब्बा "बिस्मिल्लाह" पढ़ने की सआदत हासिल की। सन1305 हिजरी में आप ने दोबारा इराक़ का सफ़र किया और इस दौरान इमाम रज़ा अ: की ज़ियारत से भी मुशर्रफ हुए।

इबतेदाई तालीम आप ने उस दौर के नामवर असातेज़ा से हासिल की। जिन में मिर्ज़ा मोहम्मद हसन कशमीरी (मुक़ीम लखनऊ), मौलवी सय्यद मोहम्मद मुदर्रिसे नाज़िमिया, मौलवी सय्यद सरफ़राज़ हुसैन, मौलवी शेख फ़िदा हुसैन, मौलवी सय्यद अली असग़र (उस्ताद किंग कॉलेज लखनऊ), मौलवी मज़फ़्फ़र अली ख़ान मुरादाबादी और­ ताजुल- औलमा सय्यद अली मोहम्मद वग़ैरा के नाम सरे फ़ेहरिस्त हैं।

ताजुल औलमा सय्यद अली मोहम्मद ने अल्लामा अहमद नसीराबादी को जुमा व जमाअत की इजाज़त दी और उन्हें मुल्तान जाने की हिदायत की। वहाँ आपका मुनाज़ेरा अहले सुन्नत के एक आलिम से हुआ। फिर आप ने एक शिया आलिम के साथ मेराज-ए-जिस्मानी पर बहस की और एक आर्रयाई से ज़िबहे- हैवानात पर गुफ़्तगू की। इन तमाम मुनाज़रों में आप कामयाब रहे।

मुहर्रमुल हराम 1325 हिजरी में आप अहलो अयाल के हमराह इराक़ के सफ़र पर रवाना हुए। यहाँ आख़ुंद मुल्ला मोहम्मद काज़िम खुरासानी ने आप को ना केवल अपना नायब मुक़र्रर किया बल्कि इजाज़ा-ए-उमूर-ए-हिसबिया भी अता फ़रमाया। उन्होंने यह भी कहा "इल्म उस शख़्स में मुनहसिर है, पस इन का हुक्म मेरा हुक्म और इन की इताअत मेरी इताअत है।"

अल्लामा अहमद नसीराबादी को इराक़ के मुताअद्दिद जय्यद औलमा ने इजाज़ा-ए-इज्तेहाद अता किया। इन में हुज्जतुल इस्लाम आ़क़ा सय्यद मोहम्मद बाक़िर तबातबाई हायरी, हाजी शेख हुसैन माज़ंदरानी, हाजी मिर्ज़ा फ़त्हुल्लाह शीराज़ी नजफ़ी (शेखुश्शरिया), सय्यद मोहम्मद काज़िम तबातबाई, शेख मोहम्मद मेहदी कश्मीरी हायरी और शेख अब्दुल्लाह माज़ंदरानी के नाम लिये जा सकते हैं।

उलमा-ए-इराक़ ने अल्लामा सय्यद अहमद नसीराबादी की इल्मी ख़िदमात और तसानीफ़ को सराहते हुए उन पर तौसीक़ें भी तहरीर कीं जो उनके इल्मी मक़ाम पर वाज़ेह एतेराफ़ थीं।

औलमा-ए-कर्बला ने एक कमेटी क़ायम की जिस का नाम "इआनते दौलते अमलिया ईरान" था। इस में पाँच उलमा बतौर नाज़िम शामिल थे और आप भी उन में शामिल थे मगर आप हिंदुस्तान चले आए। यहाँ आप "अंजुमने सदरुस्सुदूर" और शिया कॉलेज की अकसर शाख़ों में मुअविन रहे।

1328 हिजरी में "अंजुमने यादगारे औलमा" क़ायम हुई। अल्लामा अहमद नसीराबादी तीन साल तक इस में सरगर्म रहे और इस दौरान "मुन्तहल अफ़कार", "मुन्तहस सुअूल" और "इजाला ए नाफ़ेआ" जैसे अहम इल्मी काम शाया किए।

1331 हिजरी में नजफ़ अशरफ़ में पानी की कमी हुई तो आप ने कूफ़े से पानी ला कर लोगों में मुफ़्त तक़सीम किया। आप ने नजफ़ अशरफ़ में "मदरसा दीनिया जाफ़रिया" क़ायम किया, जिस में एक सौ पच्चीस तुल्लाब जुग़राफ़िया, हिसाब, तुर्की व अरबी ज़बानें और दीनियात पढ़ते थे। यह इदारा आप ने अपनी ज़ाती रकम से चलाया।

सन 1334 हिजरी में आप हिंदुस्तान वापस आए। 1335 हिजरी में आप ने "अंजुमन दारुत्तबलीग़" क़ायम की, जिस का मक़सद यह था कि हर साल ग़ुफ़रानमआब, यानी अल्लामा दिलदार के यौम-ए-वफ़ात पर प्रोग्राम मुनअक़िद हों जिन में इल्म व औलमा की फ़ज़ीलत बयान की जाए। इस मक़सद के तहत मोहम्मद हुसैन नोगाँवी को भी दावतनामा दिया गया और उन्होंने इस पर अमल किया।

अल्लामा अहमद ने इल्मी ख़िदमात के ज़रिए एक अज़ीम विर्सा छोड़ा। जिन में से "तज़किरा ए  औलमा "फ़ारसी व अरबी (दो जिल्द), "अहकामुल मुसाफिरीन", "रिसाला अमलिया", "इस्बाते-हक़ (रद्दे-नसारा)", "ज़ुबदतुल कलाम", "अलमसीहीयत वल इस्लाम", "अनवारुल इस्लाम" और "फ़ल्सफ़तुल इस्लाम" के नाम लिये जा सकते हैं। इस के अलावा इन की कई तसानीफ़ और माक़ालात मुख़्तलिफ़ अख़बारात व रसाइल में शाया होते रहे।

अल्लाह ने आप को तीन फ़र्ज़ंद अता किए: सय्यद मोहम्मद इब्राहीम मारूफ़  बा सय्यद मोहम्मद, सय्यद मोहम्मद यूसुफ़, और सय्यद मोहम्मद मुसतफ़ा मारूफ़ बा आगा हुसैन।

आख़िरकार यह आफ़ताब-ए-इल्मव व हिकमत 20 शाबान 1366 हिजरी, मुताबिक़ 10 जुलाई 1947 ई। को लखनऊ में ग़ुरूब हुआ। नमा ज़े -जनाज़ा के बाद हज़ारों सोगवारों की आह व बका के हमराह आप के जनाज़े को "हुसैनिया ग़ुफ़रानमआब" में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।

माखूज़ अज़: मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-9 पेज-296 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024ईस्वी।  

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