रविवार 8 फ़रवरी 2026 - 08:52
इमाम ज़माना और ग़ैबत के दौर में सकारात्मक व नकारात्मक आंदोलनों का क़ुरआनी दृष्टि से आलोचनात्मक अध्ययन

इस्लामी विचारधारा में इमाम ज़माना (अ.ज.) के ज़ुहूर (प्रकट होने) की अवधारणा सिर्फ़ एक आस्था नहीं है, बल्कि अल्लाह के न्याय के वर्चस्व की एक वैश्विक क्रांति है। इस महान उद्देश्य के नाम पर उठने वाले हर सामाजिक और वैचारिक आंदोलन को दो बड़े पैमानों पर परखने की कोशिश की जा रही है। एक वह आंदोलन जो ज़ुहूर की राह को आसान बनाता है, और दूसरा वह जो जानबूझकर या अनजाने में उसमें रुकावट बनता है।

लेखक : मौलाना सय्यद सफ़दर हुसैन ज़ैदी
(निदेशक, जामिया इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम, जौनपुर)

पहली क़िस्म का आंदोलन: ईश्वरीय मिशन की ज़मीन तैयार करने वाला सकारात्मक मार्ग

क़ुरआन मजीद के अनुसार ऐसे लोग प्रशंसा के योग्य हैं, जो संगठित होकर दीन-ए-इलाही की मदद करते हैं।
अगर कोई आंदोलन मुसलमानों की नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक ट्रेनिंग इस तरह करता है कि वे एक वैश्विक और न्यायपूर्ण व्यवस्था क़ायम करने और उसे संभालने के लिए संघर्ष करें, तो वह निश्चित रूप से इस आयत का उदाहरण है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا أَنصَارَ اللَّهِ ऐ ईमान वालों! अल्लाह के मददगार बन जाओ।” (सूर ए सफ़्फ़ : 14)

ऐसे आंदोलनों का असली उद्देश्य लोगों को किसी संगठन, संस्था या एसोसिएशन का वफ़ादार बनाना नहीं होता, बल्कि अल्लाह और उसके वली का सच्चा अनुयायी बनाना होता है। ये आंदोलन समाज में फैले ज़ुल्म के ख़िलाफ़ चेतना जगाते हैं और मुसलमानों को इस योग्य बनाते हैं कि वे धरती के वारिस बन सकें, जैसा कि अल्लाह फ़रमाता है: "وَلَقَدْ كَتَبْنَا فِي الزَّبُورِ مِن بَعْدِ الذِّكْرِ أَنَّ الْأَرْضَ يَرِثُهَا عِبَادِيَ الصَّالِحُونَ" और हमने ज़बूर में नसीहत के बाद लिख दिया कि धरती के वारिस मेरे नेक बंदे होंगे।” (सूर ए अंबिया : 105)

दूसरे क़िस्म का आंदोलन: वैचारिक भटकाव और इस्लाम-विरोधी शक्तियों का साधन (नकारात्मक मार्ग)

दूसरी ओर, बहुत से विद्वान और उलेमा इन आंदोलनों पर गहरी आपत्तियाँ रखते हैं। उनका मानना है कि जब ग़ैबत जैसे पवित्र विचार को सीमित समूहों के स्वार्थ या सतही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो यह अनजाने में इस्लाम-विरोधी ताक़तों को मज़बूत करता है।

इसके कुछ बड़े नुक़सान इस प्रकार हैं:

ठहराव और ग़लत इंतज़ार की सोच

कुछ समूह मुसलमानों को यह यक़ीन दिलाते हैं कि कोई व्यावहारिक संघर्ष बेकार है और सब कुछ सिर्फ़ चमत्कार से होगा। यह सोच क़ुरआन के इस मूल सिद्धांत के ख़िलाफ़ है: وَأَن لَّيْسَ لِلْإِنسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ और इंसान को वही मिलेगा, जिसकी उसने कोशिश की होगी।” (सूर ए नज्म : 39)

वैचारिक बिखराव और गुटबाज़ी ऐसे आंदोलन अक्सर पूरी उम्मत के हित के बजाय अपनी ही “टुकड़ी” या “गुट” को सही मानने लगते हैं, जिससे मुसलमानों की सामूहिक ताक़त बँट जाती है। क़ुरआन इस तरह के विभाजन से साफ़ मना करता है:“وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَات" उन लोगों की तरह न बनो जो खुली निशानियाँ आ जाने के बाद भी आपस में बँट गए और मतभेद करने लगे।” (सूर ए आले-इमरान : 105)

औपनिवेशिक शक्तियों का उपकरण बन जाना इतिहास गवाह है कि इस्लाम-विरोधी ताक़तें हमेशा उन आंदोलनों का समर्थन करती रही हैं, जो मुसलमानों की क्रांतिकारी सोच को सिर्फ़ रस्मों, भावनात्मक नारों और निरर्थक गतिविधियों में उलझाकर उन्हें वैश्विक बौद्धिक और राजनीतिक संघर्ष से दूर कर देती हैं।

निष्कर्ष

किसी भी आंदोलन की सच्चाई इस बात से पहचानी जाती है कि वह इंसान को कितना सक्षम और दूरदर्शी बना रहा है। अगर कोई सामूहिक प्रयास मुसलमानों को आधुनिक ज्ञान, उच्च नैतिकता और उम्मत की एकता की ओर ले जाता है, तो वह इमाम ज़माना के ज़ुहूर की राह को आसान करता है। लेकिन अगर वह सिर्फ़ नारों, चंदा इकट्ठा करने और व्यक्तित्व-पूजा तक सीमित है, तो वह मुसलमानों को उस महान उद्देश्य से रोकता है जिसकी माँग क़ुरआन करता है।

सच्चा इंतज़ार करने वाला वही है, जो अपने कर्म से साबित करे कि वह अल्लाह के न्याय का सिपाही बनने के योग्य है—न कि वह, जो संगठनों के सहारे अपनी ज़िम्मेदारियों से बचता फिरे।

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