हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , किरमानशाह से, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन ग़फ़ूरी ने कल शहर किरमानशाह के इलाक़ा फ़रहंगियान फ़ाज़ 2 में वाक़े मस्जिद सलमान फ़ारसी में नमाज़-ए-ज़ुहर व अस्र नमाज़ियों के दरमियान अदा की। इसके बाद उन्होंने इबादत की हक़ीक़त और इंसानी ज़िंदगी में नमाज़ के मुक़ाम पर तफ़सीली ख़िताब किया।
उन्होंने बयान किया कि इबादत की असल रूह हुज़ूर-ए-क़ल्ब और हालते-ज़िक्र है। यानी इंसान हर वक़्त ख़ुदा को याद रखे और उसका दिल इस एहसास से सरशार रहे कि वह अपने रब की हाज़िरी में खड़ा है यही असल इबादत है।
इमाम-ए-जुमआ किरमानशाह ने कहा कि अल्लाह तआला ने इबादत को इसलिए वाजिब क़रार दिया है ताकि बंदों और अपने दरमियान राब्ता बरक़रार रहे। यह राब्ता मुनाजात की तरह है, जिसमें इंसान अपने ख़ालिक़ से दिल की बातें कर सकता है और अपनी तमाम फ़िक्रों और मसाइल को उसके सामने बयान कर सकता है।
हुज्जतुल इस्लाम ग़फ़ूरी ने पाँच वक़्त की नमाज़ को रूहानी ज़िंदगी का ज़रिया क़रार देते हुए कहा, जिस तरह जिस्म को साँस लेने की ज़रूरत होती है, उसी तरह रूह को भी “साँस” की ज़रूरत है, और रूह की साँस ख़ुदा से राब्ता और उससे गुफ़्तगू है।
उन्होंने नमाज़ में हुज़ूर-ए-क़ल्ब की अहमियत पर रिवायात का हवाला देते हुए कहा, अगर नमाज़ तवज्जोह और मुकम्मल शराइत के साथ अदा की जाए तो वह नमाज़गुज़ार की हिफ़ाज़त की दुआ करती हुई उसकी तरफ़ लौटती है, लेकिन अगर ग़फ़लत के साथ पढ़ी जाए तो वह उसे ज़ाए करने पर मलामत भी करती है।
इमाम ए जुमआ किरमानशाह ने अपने ख़िताब के आख़िर में माहे मुबारक रमज़ान की आमद की तरफ़ इशारा करते हुए कहा,यह महीना फ़य्यूज़ाते-इलाही से इस्तिफ़ादा करने का इस्तिसनाई मौक़ा है। दुआओं, मुनाजातों और नफ़्ल इबादतों को पूरे तवज्जोह के साथ अंजाम देना चाहिए ताकि इंसान उनकी बरकतों और समरात से बहरेयाब हो सके।
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