बुधवार 25 फ़रवरी 2026 - 13:25
ईमान ए हक़ीक़ी सिर्फ़ अकीदा और अमल के साथ मुकम्मल होता है

हौज़ा/ आयतुल्लाह हाशमी अलिया ने ताक़ीद की कि हक़ीक़ी ईमान सिर्फ़ दिली अकीदे से पूरा नहीं होता, बल्कि इंसान के तमाम आज़ा के अमल के साथ ही उसका तहक़्क़ुक़ होता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , तेहरान में आयतुल्लाह हाशमी अलिया ने मदरसा ए इल्मिया हज़रत क़ाइम (अज) में माहे मुबारक रमज़ान के मौक़े पर ईमान-ए-हक़ीक़ी के मफ़हूम और उसके अमल से ताल्लुक़ को वाज़ेह किया।उन्होंने कहा कि ईमान महज़ ज़ेहनी या क़ल्बी अकीदा नहीं है, बल्कि ऐसा अमल है जिसमें दिल और इंसान के तमाम आज़ा की शिरक़त ज़रूरी है।

आयतुल्लाह हाशमी अलिया ने मज़ीद कहा कि गुज़िश्ता उम्मतें भी उसी हद तक रहमत और जन्नत की अहल बनीं, जिस क़दर उन्होंने अंबिया की तालीमात और अहकाम को क़ुबूल किया और अमलन उनकी पैरवी की।उस्ताद-ए-हौज़ा ने साबक़ा अंबिया की रिसालत की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि कुछ अहकाम ज़माने के साथ तब्दील या तकमील किए गए हैं।

मिसाल के तौर पर, हज़रत मूसा (अ) और हज़रत ईसा (अ) के अहकाम, और आखिरकार पैग़म्बर-ए-अकरम (स) के अहकाम जिनमें नमाज़, ज़कात और दीगर इबादात शामिल हैं तदरीजन नाज़िल हुए ताकि इंसानों का ईमान और अमल मुकम्मल हो सके।

उन्होंने कहा कि मोमिनीन पर गुनाह की तोहमत लगाना या पाकदामन ख़वातीन की तौहीन करना ऐसा अमल है जो इंसान को रहमत-ए-ख़ुदा से दूर कर देता है, और रोज़-ए-क़यामत इंसानों के आमाल और उनके हक़ीक़ी ईमान की बुनियाद पर ख़ुदावंद गवाही देगा हैं।

मदरसा ए इल्मिया हज़रत क़ाइम (अज) के मोअस्सिस ने अमल के साथ ईमान की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा कि शहादतैन सिर्फ़ ज़बानी इक़रार से हक़ीक़ी ईमान पैदा नहीं करती, बल्कि दिली, ज़बानी और अमली पाबंदी ज़रूरी है।

हक़ीक़ी मोमिन वही है जो अकीदे के साथ तमाम अहकाम-ए-इलाही पर अमल करे और उसके आमाल जैसे नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात दिली ईमान और अख़लाक़ी पाकीज़गी के साथ हों।

आयतुल्लाह हाशमी अलिया ने बयान किया कि कामिल ईमान इंसान के तमाम आज़ा और उसके हर अमल को शामिल करता है, और अहकाम-ए-इलाही का इनकार या उन्हें तर्क करना इंसान को ईमान और रहमत-ए-ख़ुदा के रास्ते से दूर कर देता है। लिहाज़ा, हक़ीक़ी ईमान उसी वक़्त हासिल होता है जब अकीदा और अमल साथ-साथ हों।

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