शुक्रवार 27 मार्च 2026 - 21:23
मुसलमानो के सभी फ़िरक़ो को जन्नतुल बक़ी के पुनर्निर्माण की मांग उठाना चाहिएः मौलाना कल्बे जवाद नक़वी

जन्नत-उल-बक़ी के विध्वंस के खिलाफ और पवित्र मज़ारों के पुनर्निर्माण के लिए आज नमाज़-ए-जुमा के बाद आसफ़ी मस्जिद में सऊदी सरकार के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन की अगुवाई इमाम-ए-जुमा मौलाना कल्बे जवाद नकवी ने की। नमाज़ियों ने प्रदर्शन में जन्नत-उल-बक़ी के विध्वंस पर सऊदी सरकार की निंदा करते हुए पवित्र मज़ारों के पुनर्निर्माण की मांग की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, लखनऊ: जन्नत-उल-बक़ी के विध्वंस के खिलाफ और पवित्र मज़ारों के पुनर्निर्माण के लिए आज नमाज़-ए-जुमा के बाद आसफ़ी मस्जिद में सऊदी सरकार के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन की अगुवाई इमाम-ए-जुमा मौलाना कल्बे जवाद नकवी ने की। नमाज़ियों ने प्रदर्शन में जन्नत-उल-बक़ी के विध्वंस पर सऊदी सरकार की निंदा करते हुए पवित्र मज़ारों के पुनर्निर्माण की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने आल-ए-सऊद के खिलाफ 'मर्दाबाद' के नारे लगाए और सऊदी शासक मोहम्मद बिन सलमान की तस्वीर को आग के हवाले करके अपना गुस्सा और दुख जताया। इस अवसर पर अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ भी नारे लगाए गए और मुस्लिम शासकों को इन ताकतों का गुलाम बताया गया।

प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी मौलाना कल्बे जवाद नकवी ने कहा कि जन्नत-उल-बक़ी के विध्वंस को 100 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन अफसोस कि आज तक पवित्र मज़ारों का पुनर्निर्माण नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि जन्नत-उल-बक़ी के लिए मुसलमानों के सभी संप्रदायों को आगे आना चाहिए, लेकिन अफसोस उनकी ओर से कोई विरोध नहीं होता। जन्नत-उल-बक़ी में इस्लामी पैगंबर की बेटी हज़रत फातिमा ज़हरा, पैगंबर-ए-इस्लाम की पत्नियां और साथियों की कब्रें हैं, इसके बावजूद मुसलमानों की ओर से उनकी कब्रों के विध्वंस पर खामोशी है, इससे बढ़कर मुसलमानों की बेगैरती और क्या होगी। उन्होंने कहा कि मुसलमान मौलवी तो सऊदी अरब और अमेरिका के क्रय-विक्रय (ज़रख़रीद) हैं, इसलिए वे कभी सऊदी अरब के अपराधों के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकते। आज अमेरिका और इज़राइल मुस्लिम देशों की सहायता से ईरान पर हमले कर रहे हैं, लेकिन मुसलमान मौलवियों ने उनकी निंदा तक नहीं की। यहां तक कि उन्होंने मनाब शहर में अमेरिकी हमले में शहीद हुई मासूम बच्चियों की शहादत पर भी कोई विरोध नहीं किया, इससे उनकी मानसिक गुलामी और पिछड़ेपन का अंदाजा होता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की हार के साथ ही मुस्लिम सरकारें खत्म हो जाएंगी और वहां भी जनता की आज़ाद सरकारें कायम होंगी।

मौलाना ने आगे कहा कि यह मालूम होना चाहिए कि आखिर ये मुस्लिम शासक ईरान पर हमले के खिलाफ खामोश क्यों हैं। मुसलमानों पर जुल्म होते हैं, लेकिन मुस्लिम सरकारें निंदा तक नहीं करतीं, इसकी वजह यह है कि ये शासक यहूदी माओं के बेटे हैं, इनमें कोई मुसलमान नहीं है। उन्होंने कहा कि ग़ज़ा में हज़ारों मासूम बच्चे, औरतें और जवान मार डाले गए, ग़ज़ा को मलबे के ढेर में बदल दिया गया, लेकिन मुस्लिम शासक खामोश रहे, इसकी बुनियादी वजह यही है कि ये शासक यहूदी माओं के बेटे हैं। उन्होंने कहा कि अगर ईरान के साथ जंग में अमेरिका को हार हो गई तो सऊदी अरब, क़तर, जॉर्डन और अन्य मुस्लिम देशों में जनता के इंकलाब होंगे और सत्ता में बदलाव आएगा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम देशों की जनता अब जाग रही है, लेकिन वहां की सरकारें अमेरिका और इज़राइल की गुलाम हैं। गुलामों से हम कभी यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे ईरान की मदद और जन्नत-उल-बक़ी के पुनर्निर्माण के लिए व्यावहारिक कदम उठाएंगे। उन्होंने कहा कि हमारी मांग यह है कि सऊदी सरकार पवित्र मज़ारों का पुनर्निर्माण करे या हमें पुनर्निर्माण की इजाज़त दी जाए।

मौलाना ने ईरान की ओर से भारत के लिए आबनाए हुर्मुज़ (होर्मुज़ जलडमरूमध्य) को खोले जाने की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह भारत की जनता की जीत है, इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है। सरकार तो अमेरिका और इज़राइल के साथ है। चूंकि भारत की जनता ईरान का समर्थन कर रही है, इसलिए ईरान ने जनता के समर्थन के आधार पर आबनाए हुर्मुज़ को भारत के लिए खोल दिया। उन्होंने कहा कि आज हिंदू, मुसलमान मिलकर ईरान की मदद कर रहे हैं, इसके सबूत मौजूद हैं। हिंदू, सिख और अन्य धर्मों के लोगों ने ईरान का खुलकर समर्थन किया है। आबनाए हुर्मुज़ का खुलना भारत की जनता की जीत है, सरकार की नहीं।

मौलाना क़ुरबान अली ने कहा कि सऊदी सरकार को जन्नत-उल-बक़ी में पवित्र मज़ारों की (पुनर्निर्माण की) इजाज़त देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो सरकारें ईरान पर हमले में शामिल हों, वे मुसलमानों की दोस्त नहीं हो सकतीं। मौलाना ग़ुलाम रज़ा रज़वी ने कहा कि इस्लामी जगत को जितना नुकसान तथाकथित मुस्लिम सरकारों ने पहुंचाया है, उतना किसी और सरकार ने नहीं पहुंचाया। मुस्लिम शासकों के खिलाफ अब उन देशों की जनता जाग रही है और जल्द ही वहां इंकलाब आएगा। उन्होंने कहा कि जन्नत-उल-बक़ी में जो पवित्र कब्रें हैं, उनसे दुनिया भर के मुसलमानों की आस्थाएं जुड़ी हैं, इसलिए हम पुनर्निर्माण की मांग कर रहे हैं।

प्रदर्शन में मौलाना कल्बे जवाद नकवी, मौलाना क़ुरबान अली, मौलाना मुस्तफ़ा रज़ा, मौलाना ग़ुलाम रज़ा रज़वी, मौलाना फ़िरोज़ हुसैन, मौलाना सरताज हैदर ज़ैदी, मौलाना नज़र अब्बास और मौलाना आदिल फ़राज़ मौजूद थे।

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