मंगलवार 28 अप्रैल 2026 - 22:23
जंग के दौरान खिदमत का अनोखा जज़्बा; क़ुम अल मुकद्दस में भारतीय छात्रों का 'मौकिब-ए-हिंदिया' से लेकर हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम तक ज़ायरीन की लगातार सेवा का सिलसिला जारी

हौज़ा / जंग के दौरान,क़ुम अल मुकद्दस में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों ने सेवा, ईमानदारी और त्याग की एक नायाब मिसाल कायम करते हुए, पहले "मौकिब-ए-हिंदिया" के ज़रिए लगभग चालीस दिनों तक लगातार मोमिनों और ज़ायरीन की सेवा की। और अब इसी सेवा भावना को आगे बढ़ाते हुए, हज़रत फातिमा मासूमा स.ल. के पवित्र हरम के चायखाने में ज़ायरीन की सेवा का सिलसिला जारी रखा है, जो हर गुरुवार को मग़रिब की नमाज़ के बाद रात भर जारी रहता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , जंग के मुश्किल दिनों में जब हर तरफ बेचैनी का माहौल था, उसी वक्त क़ुम अल मुक़द्दस में पढ़ने वाले हिंदुस्तानी तलबा ने ख़िदमत, इसार और एख़्लास की एक बेहतरीन मिसाल पेश की। उन्होंने मोमिनीन और ज़ायरीन-ए-अहले-ए-बैत (अ.स.) की ख़िदमत का एक यादगार सिलसिला शुरू किया, जिसे अहल-ए-क़ुम और ज़ायरीन ने बहुत सराहा।

जंग के दौरान खिदमत का अनोखा जज़्बा;
क़ुम अल मुकद्दस में भारतीय छात्रों का 'मौकिब-ए-हिंदिया' से लेकर हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम तक ज़ायरीन की लगातार सेवा का सिलसिला जारी

जामिआतुल मुस्तफ़ा अल-आलमिया के कुछ हिंदुस्तानी तलबा, जिनमें अली अम्मार खान, सैयद रहबर अली ज़ैदी और सैयद मोहम्मद कुमैल रिज़वी शामिल हैं, और उनके दूसरे साथियों ने जंग के दौरान सबसे पहले “मौक़िब-ए-हिंदिया” के नाम से एक ख़िदमतगाह क़ायम की। यहां करीब 35 से 40 दिन तक लगातार मोमिनीन और ज़ायरीन की ख़िदमत की जाती रही। इस मौक़िब में आने वालों के लिए शरबत, चाय और दूसरी ज़रूरी चीज़ों का इंतज़ाम किया गया, जो ख़िदमत के जज़्बे को साफ़ तौर पर दिखाता है।

जंग के दौरान खिदमत का अनोखा जज़्बा;
क़ुम अल मुकद्दस में भारतीय छात्रों का 'मौकिब-ए-हिंदिया' से लेकर हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम तक ज़ायरीन की लगातार सेवा का सिलसिला जारी

अब इसी ख़िदमत को आगे बढ़ाते हुए, इन तलबा ने हरम-ए-मुतह्हर हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) में मौजूद चायख़ाना में ज़ायरीन की ख़िदमत को अपना शरफ़ समझा है। हर गुरूवार को मग़रिब के बाद से रात के आख़िर तक ये तलबा हरम में मौजूद रहते हैं और ज़ायरीन को मुफ़्त चाय तक़सीम करने में हिस्सा लेते हैं। हालांकि चाय का इंतेज़ाम हरम की तरफ़ से होता है, लेकिन ये तलबा सिर्फ़ ख़िदमत, एख़्लास और इसार के जज़्बे से वहां पहुंचकर ज़ायरीन की ख़िदमत करते हैं।

इस मौक़े पर सदर अली अम्मार खान ने बताया कि जंग के दिनों में “मौक़िब-ए-हिंदिया” के ज़रिए शुरू हुई ख़िदमत ने उन्हें रूहानी सुकून और दिली इत्मीनान दिया। अब हरम-ए-हज़रत मासूमा (स.अ.) में ज़ायरीन की ख़िदमत उनके लिए बहुत बड़ी सआदत और फ़ख्र की बात है।

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क़ुम अल मुकद्दस में भारतीय छात्रों का 'मौकिब-ए-हिंदिया' से लेकर हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम तक ज़ायरीन की लगातार सेवा का सिलसिला जारी

इसी तरह सैयद रहबर अली ज़ैदी ने कहा कि ज़ायरीन-ए-अहल-ए-बैत (अ.स.) की ख़िदमत दरअसल खुद अहल-ए-बैत (अ.स.) की बारगाह में हाज़िरी का एक ज़रिया है। उन्हें खुशी है कि वो हर जुमेरात इस मुक़द्दस जगह पर अपनी हैसियत के मुताबिक ख़िदमत कर रहे हैं, और इंशाअल्लाह यह सिलसिला एक साल तक जारी रहेगा।

जंग के दौरान खिदमत का अनोखा जज़्बा;
क़ुम अल मुकद्दस में भारतीय छात्रों का 'मौकिब-ए-हिंदिया' से लेकर हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम तक ज़ायरीन की लगातार सेवा का सिलसिला जारी

सैयद मोहम्मद कुमैल रिज़वी ने कहा कि हरम-ए-हज़रत मासूमा (स.अ.) के पास ख़िदमत का ये मौका उनके लिए बहुत बरकत वाला है। इससे उन्हें रूहानी सुकून मिलता है और ये एहसास भी मज़बूत होता है कि एक तालिब-ए-इल्म की असली पहचान सिर्फ़ इल्म ही नहीं, बल्कि ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ और इसार में भी होती है।

जंग के दौरान खिदमत का अनोखा जज़्बा;
क़ुम अल मुकद्दस में भारतीय छात्रों का 'मौकिब-ए-हिंदिया' से लेकर हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम तक ज़ायरीन की लगातार सेवा का सिलसिला जारी

वाज़ेह रहे कि मक़ामी अवाम और ज़ायरीन ने हिंदुस्तानी तलबा के इस जज़्बे को बहुत सराहा और कहा कि यह अमल न सिर्फ़ उनके एख़्लास को दिखाता है बल्कि मुल्क-ए-हिंद के दीन और अख़लाक़ की भी बेहतरीन पहचान कराता है।

जंग के दौरान खिदमत का अनोखा जज़्बा;
क़ुम अल मुकद्दस में भारतीय छात्रों का 'मौकिब-ए-हिंदिया' से लेकर हज़रत मासूमा (स.ल.) के हरम तक ज़ायरीन की लगातार सेवा का सिलसिला जारी

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