शुक्रवार 12 जून 2026 - 11:35
भारतीय धार्मिक विद्वानों का परिचय | मौलाना हसन अब्बास फ़ितरत

पेशकश: दनिश नामा ए इस्लाम, इन्टरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर दिल्ली

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, मुफ़क्किर, अदीब, मुसन्निफ़, शायर, ख़तीब, माया-नाज़ क़लमकार और अदब व सहाफ़त का सरमाया-ए-इफ़्तिख़ार मौलाना सैयद हसन अब्बास फ़ितरत 3 जून 1935ई॰ को क़स्बा हल्लौर, ज़िला सिद्धार्थ नगर, सूबा उत्तर प्रदेश के एक मुअज़्ज़ज़ ख़ानदान में पैदा हुए।

आपके वालिद, अज़हर हसन रिज़वी, एक दींदार और बा-अमल इंसान थे। क़स्बा हल्लौर रिज़वी सादात की एक मर्दुम ख़ेज़ बस्ती के तौर पर जाना जाता है,

जहाँ हर दौर में साइंस व टेक्नोलॉजी के माहिर, औदबा, शोअरा, होकमा, खौतबा, मुक़र्रेरीन और औलमा-ए-बा-अमल ने अपनी ख़िदमात अंजाम दीं।

मौलाना हसन अब्बास फ़ितरत ने इब्तिदाई तालीम अपने वतन में हासिल की,और मज़ीद तालीम के लिए वसीक़ा अरबी कॉलेज, फ़ैज़ाबाद का रुख़ किया।यहाँ आपने दीनी तालीम के साथ-साथ हाई स्कूल और इंटरमीडिएट भी इम्तियाज़ी नंबरों से पास किया,बाद-अज़ाँ जामेआ नाज़िमिया, लखनऊ का रुख़ किया और वहाँ से मुमताज़ुल-अफ़ाज़िल की सनद हासिल की। मौसूफ़ ने जामेआ नाज़िमिया में कई साल तदरीस की और मुतअद्दिद शागिर्दों की तरबियत की जिन्होंने इल्मी मैदान में नुमायाँ मक़ाम हासिल किया।आपने मुंबई यूनिवर्सिटी से बी.ए. किया और वहीं तदरीसी फ़राइज़ की अंजामदेही में मसरूफ़ हो गए।

मौलाना फ़ितरत ने आला तालीम के लिए क़ुम मुक़द्दसा का रुख़ किया और वहाँ आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी,आयतुल्लाह मुन्तज़िरी और आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी के सामने ज़ानू-ए-अदब तय किए।

मौसूफ़ के हिंदुस्तानी असातिज़ा में बाबा-ए-फ़लसफ़ा मौलाना अय्यूब हुसैन सिरसवी, मौलाना सआदत हुसैन ख़ान,अल्लामा सईद अख़्तर रिज़वी और सैयदुल-उलमा आयतुल्लाह सैयद अली नक़ी नक़वी शामिल हैं,जिन्होंने आपकी शख़्सियत और फ़िक्री बसीरत को निखारा।

मौलाना हसन अब्बास ने मुंबई की ख़्वाजा इस्ना अशरी जामे मस्जिद में चार साल वज़ीफ़ा इमाम-ए-जुमा को अंजाम दिया और फिर पूना का रुख़ किया,जहाँ तक़रीबन बीस साल तक इमामत व ख़िताबत के फ़राइज़ अंजाम दिए और यहीं मुस्तक़िल सुकूनत पज़ीर हो गए।

पूना में आपने “जामेअतुर्रज़ा” के नाम से एक दीनी इदारा क़ायम किया जो आज भी जारी व सारी है।

हिंदुस्तान के अलावा आपने मशरिक़ी अफ़्रीक़ा,मारीशस, मेडागास्कर और अफ़्रीक़ा के दीगर मक़ामात पर ख़िदमत-ए-दीन अंजाम दी। मेडागास्कर में भी आपकी कोशिश से एक दीनी मदरसा क़ायम हुआ, जिससे तश्नगान-ए-उलूम सेराब होते रहे।मौलाना इस्लाह-पसंद इंसान थे, और हमेशा लोगों को इत्तिहाद व इत्तेफ़ाक़ की दावत देते रहे।

मौसूफ़ को इब्तिदा से ही तहरीर व तक़रीर का फ़ितरी ज़ौक़ था,

जिसकी वजह से अपने मुआसिरीन में नुमायाँ मक़ाम हासिल किया।

मौलाना एक मुमताज़ शायर थे, और “फ़ितरत” तख़ल्लुस फ़रमाते थे।

आपने शायरी का आग़ाज़ ज़माना-ए-तालिब-इल्मी से किया। मौसूफ़ अपनी शायरी में फ़ितरत और इंसानी ख़ूबियों को बड़ी ख़ूबसूरती से पेश करते।आप लखनऊ की अदबी महफ़िलों में हमेशा मदऊ रहते और असातिज़ा व शुअरा से दाद व तहसीन हासिल करते रहे।

मौलाना हसन अब्बास फ़ितरत एक कामयाब सहाफ़ी भी थे। तक़रीबन तीस साल तक“रोज़नामा इंक़लाब, मुंबई”“हफ़्त रोज़ा ब्लिट्ज़, मुंबई”और दीगर रसाइल में मुसलसल लिखते रहे।

आपके मशहूर कॉलम “तबसिरा”और “रफ़्तार-ए-ज़माना”बहुत मक़बूल थे।मौसूफ़ ने हफ़्त रोज़ा “सदाक़त” जारी किया, जो आज तक मुसलसल शाए हो रहा है।

तस्नीफ़ व तालीफ़ मौलाना फ़ितरत की ज़िंदगी का रोशन बाब था।आपने कई अहम किताबें लिखीं,जिनमें: ख़ुसरो, हाफ़िज़ और ईरान, अरमग़ान-ए-मक़ालात, अफ़्रीक़ा सुर्ख़ व सियाह, चश्मा-ए-आफ़ताब, जीने का सलीक़ा,और इमाम ख़ुमैनी  बेमिसाल रहबर जैसे बेश बहा आसार शामिल हैं।

इसी तरह आपने “दास्तान-ए-रास्तान”,“दास्तान-ए-शुजाआन-ए-इस्लाम” मनासिक-ए-हज इमाम ख़ुमैनी”,“क़ुरआन शनासी, और “ज़ीनतुर्रिजाल”समेत मुताअद्दिद किताबों का उर्दू ज़बान में तरजुमा किया।

इसके अलावा आपके सैंकड़ों इल्मी व अदबी मक़ालात मुख़्तलिफ़ मजल्लों की ज़ीनत बनते रहे।मौसूफ़ की इल्मी, फ़िक्री और अदबी ख़िदमात आज भी ज़िंदा हैं और आने वाली नस्लों के लिए रौशनी का ज़रिया बनी रहेंगी।

मौसूफ़ ने इन ख़िदमात के अलावा दीगर मुताअद्दिद इदारों में भी ख़िदमत अंजाम दी,जिनमें:इदारा-ए-तहक़ीक़, शोबा-ए-उर्दू, क़ुम ईरान के सदर,उर्दू अकादमी महाराष्ट्र,हज कमेटी महाराष्ट्र और अंजुमन वज़ीफ़ा सादात व मोमिनीन सर-ए-फ़ेहरिस्त हैं।

मौसूफ़ की इल्मी ख़िदमात के ऐतराफ़ में उन्हें मुख़्तलिफ़ क़ौमी व अदबी इदारों ने एवार्ड से नवाज़ा,जिनमें: मुस्लिम इंस्टिट्यूट दकन, रज़ा ट्रस्ट पूना,ज़ैनबिया एवार्ड, शहीद मुतहरी एवार्ड और अमीरुल मोमिनीन एवार्ड शामिल हैं।

अल्लाह ने आपको तीन बेटियाँ और एक बेटा अता किया, जिसे फ़रहत अब्बास के नाम से पहचाना जाता है।

आख़िरकार यह इल्म व अदब का दरख़्शाँ आफ़ताब तवील अलालत के बाद21 मई 2020ई॰ को सरज़मीन-ए-पूना पर ग़ुरूब हो गया।इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन।नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद सोगवारों की मौजूदगी में क़ब्रिस्तान जन्नत आबाद, पूना में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।

माखूज़ अज़: नुजूमुल हिदाया, तहक़ीक़ो तालीफ़: मौलाना सैयद ग़ाफ़िर रिज़वी फ़लक छौलसी व मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-143 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024 ईस्वी।

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