हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, हुज्जतुल इस्लाम मुहम्मद हादी फ़ल्लाह ने ईर्ष्या की नैतिक जड़ों की व्याख्या करते हुए कहा कि यह अल्लाह की तक़दीर पर छिपा हुआ विरोध है।
उनके अनुसार, जो व्यक्ति अल्लाह द्वारा नेमतों के बँटवारे से असंतुष्ट होता है, वह वास्तव में अल्लाह की हिकमत और इल्म पर प्रश्न उठाता है और स्वयं को उसकी इच्छा के सामने खड़ा कर देता है।
1- ईर्ष्या की जड़: इलाही तक़दीर का विरोध
"الحَسودُ غَضبانُ عَلَی القَدَر अल-हसूदो ग़ज़्बानुन अलल-क़दर" अर्थात, ईर्ष्यालु व्यक्ति अल्लाह की तक़दीर से नाराज़ रहता है। वह अल्लाह द्वारा नेमतों के बँटवारे से संतुष्ट नहीं होता और उसका विरोध वास्तव में अल्लाह की ओर ही होता है।
इसमें दो बड़ी समस्याएँ हैं।
- तौहीद मे इशकाल। ईर्ष्यालु व्यक्ति अल्लाह की हिकमत के सामने समर्पण करने के बजाय यह मानता है कि अल्लाह ने नेमतों का सही बँटवारा नहीं किया।
- अल्लाह के इल्म मे इशकाल। वह यह समझता है कि अल्लाह लोगों के वास्तविक हितों से अनभिज्ञ है, जबकि स्वयं को उनसे अधिक समझदार और जानकार मान बैठता है।
2- ईर्ष्यालु व्यक्ति का अल्लाह से शिकायत
ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी मनःस्थिति से, और कभी-कभी अपनी ज़बान से भी, अल्लाह पर इशकाल करता है:
"आपने हाबील, हज़रत यूसुफ़, अली इब्न अबी तालिब (अ) या पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स) को ये नेमतें किस अधिकार से दीं? मेरे पड़ोसी, मेरे सहकर्मी, मेरे भाई या मेरी बहन को क्यों दीं और मुझे क्यों नहीं? क्या आपको बँटवारा करना नहीं आता? आइए, मैं आपको सिखाता हूँ कि ख़ुदाई कैसे की जाती है!"
रब के मुक़ाबले में यह अत्यंत बड़ी गुस्ताख़ी है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने भ्रम में इतना डूब जाता है कि मानो वह स्वयं अल्लाह को सिखाना चाहता हो कि संसार का संचालन कैसे किया जाए।
3- ईर्ष्यालु व्यक्ति का काल्पनिक चुनौती देना
इसके बाद वह अपनी कल्पना में अल्लाह से कहता है:
"मैं तुम्हें एक सप्ताह का समय देता हूँ। यदि इस अवधि में तुम मेरे उस चचेरे भाई से यह नेमत लेकर मुझे दे दो, तो ठीक है। अन्यथा मैं अपनी बुद्धि, अपनी समझ, अपनी इच्छा, अपनी शक्ति और अपने प्रयास से स्वयं यह काम कर दूँगा।"
मानो वह कह रहा हो: "मैं तुम्हारी तक़दीर को बदल दूँगा।" वह यह काम कैसे करना चाहता है? लोगों और अल्लाह के बंदों को साधन बनाकर।
"मैं तुम्हारे बंदों का उपयोग करूँगा। उनके दिमाग़ पर प्रभाव डालूँगा, उन्हें अपनी योजना के अनुसार चलाऊँगा। कुछ पुरुषों और कुछ महिलाओं को माध्यम बनाकर अपने रिश्तेदार, पड़ोसी या सहकर्मी को उसके स्थान से हटा दूँगा।"
4- ईर्ष्यालु व्यक्ति: अल्लाह से युद्ध करने का हथियार
रसूलुल्लाह (स) ने फ़रमाया:
"کادَ الحَسَدُ أن یَغلِبَ القَدَرَ कादल-हसदो अय यग़लेबल-क़दर।"
अर्थात, "ईर्ष्या ऐसी है कि मानो वह अल्लाह की तक़दीर पर भी हावी होने के निकट पहुँच जाती है।"
अर्थ यह है कि ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी योजनाओं और प्रयासों में इतना आगे बढ़ जाता है कि मानो वह अल्लाह की इच्छा के मार्ग में रुकावट डालना चाहता हो। इस प्रकार वह उन लोगों का स्पष्ट उदाहरण बन जाता है जिनके बारे में क़ुरआन कहता है:
"जो लोग अल्लाह के मार्ग से रोकते हैं।" ऐसा व्यक्ति वास्तव में अल्लाह के रास्ते का डाकू बन जाता है।
5- निष्कर्ष: सबसे ख़तरनाक डाकू
यदि यह पूछा जाए कि अल्लाह के रास्ते का सबसे बड़ा डाकू कौन है, तो उत्तर यही होगा कि ईर्ष्यालु व्यक्ति से बड़ा कोई डाकू नहीं है।
यदि दूसरे लोग भी किसी प्रकार से अल्लाह के मार्ग में बाधा बनते हैं, तो वे भी अंततः ईर्ष्यालु व्यक्ति की प्रवृत्ति और उसके प्रभाव के अधीन ही होते हैं।
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