रविवार 30 अगस्त 2026 - 15:47
इस्लामी उम्मत की एकता साम्राज्यवाद की साजिशों को नाकाम कर सकती है।प्राचार्या श्रीमती नजीबा खातून करमी

हौज़ा / प्राचार्या श्रीमती नजीबा खातून करमी ने कहां,मुसलमानों के बीच एकजुटता और एकता की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया से लेकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक इस्लामी देशों की एकता, क्षेत्र में विभाजन और तनाव पैदा करने के लिए साम्राज्यवाद और ज़ायोनी शासन की साजिशों और योजनाओं को विफल कर सकती है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,धार्मिक विद्यालय रैहानतुर्रसूल (स.ल.) की प्राचार्या श्रीमती नजीबा खातून करमी ने पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) और इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.ल.) के शुभ जन्मदिवस के अवसर पर अराक से हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के संवाददाता से बातचीत में कहा कि आज इस्लामी राष्ट्रों की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता, शहीद रहबर के कथन के अनुसार, व्यवहार और नीति में एकता है।

उन्होंने कहा कि आज सभी मुसलमान अपनी आंखों से देख रहे हैं कि किस तरह ज़ायोनी शासन युद्ध भड़काकर इस्लामी देशों को कृत्रिम तनावों में उलझा रहा है और स्वयं बेफ़िक्री के साथ लेबनान और ग़ाज़ा में अपने अपराध जारी रखे हुए है।

करमी ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया से लेकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात तक इस्लामी देशों की एकजुटता साम्राज्यवाद की योजनाओं को पूरी तरह विफल कर सकती है।

उन्होंने कहा कि यदि इस्लामी उम्मत हज़रत आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई के दूरदर्शी नेतृत्व पर भरोसा करते हुए इस एकता को हासिल कर ले, तो निश्चित रूप से अमेरिका और ज़ायोनी शासन का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

करमी ने इमाम सादिक़ (अ.ल.) के दौर की तुलना इमाम हुसैन (अ.स.) के दौर से करते हुए कहा कि इन दोनों महान इमामों की शहादत के बीच लगभग 87 वर्षों का अंतर है, लेकिन इस अवधि में इस्लामी दुनिया में बहुत बड़ा परिवर्तन आया।

उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ.स.) के दौर में बनी उमय्या का दमन और तानाशाही इतनी अधिक थी कि हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ.) की फ़ज़ीलत में हदीस बयान करना भी केवल सबसे गुप्त स्थानों में संभव था और मिंबरों से हज़रत अली (अ.स.) को गालियां दी जाती थीं।

करमी ने कहा कि ऐसे वातावरण में सबसे खतरनाक विचारधारा ज़नादिक़ा की थी, जो ईश्वर और धर्मों का इनकार करते थे और यहां तक कि मस्जिदुल हराम तथा मस्जिदे नबवी में भी अपने विचारों का प्रचार करते थे। उन्होंने कहा कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने ऐसी जटिल परिस्थितियों में अपने पूर्वजों की विरासत के सहारे शुद्ध इस्लाम का बचाव किया और ख़वारिज, मुरजिआ तथा ज़नादिक़ा सहित सभी विचारधाराओं के सामने वैज्ञानिक और दृढ़ रुख अपनाया।

उन्होंने शिया फ़िक़्ही और कलामी मक्तब की स्थापना में इमाम सादिक़ (अ.स.) की अद्वितीय भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि सुन्नी फ़िक़्ह के सभी प्रमुख इमामों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इमाम सादिक़ (अ.) के ज्ञान से लाभ उठाया। अबू हनीफ़ा, जो दो वर्षों तक उनके शिष्य रहे, कहते हैं:अगर वे दो वर्ष न होते तो नुअमान बर्बाद हो जाता। इसी तरह मालिक बिन अनस भी इमाम सादिक़ (अ.स.) के समकालीन और उनके ज्ञान-विद्यालय से लाभ उठाने वालों में शामिल थे।

करमी ने ज़ोर देकर कहा कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) इस्लामी दुनिया में अक़्ली विद्यालयों की स्थापना करने वाले प्रथम महान विद्वानों में थे। जाबिर बिन हय्यान, जिन्हें रसायन विज्ञान का जनक कहा जाता है, और हिशाम बिन हकम, जो अपने दौर के असाधारण धर्मशास्त्रियों में थे, इसी बौद्धिक और वैज्ञानिक मक्तब की उपज थे।

उन्होंने याद दिलाया कि इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने अपने पूर्वजों की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए तौहीद, ईश्वरीय गुणों, क़ज़ा व क़दर, जब्र व इख़्तियार और विभिन्न बौद्धिक विषयों पर हज़ारों बहसों को शिया हदीस की पुस्तकों में सुरक्षित किया। उन्होंने हर दौर के मुसलमानों के लिए सांस्कृतिक सम्मान, स्वतंत्रता और प्रतिरोध का एक संपूर्ण आदर्श प्रस्तुत किया।

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