हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह अली रज़ा आराफी ने क़ुम मुकद्दसा में जुमे की नमाज़ के खुत्बों में हाल ही में थोपी गई जंग का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस्लाम और साम्राज्यवाद के बीच जारी यह टकराव पिछली एक सदी में अपनी तरह की एक अनोखी जंग है और इसके तथ्यों को वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए बयान करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि साम्राज्यवाद के मुकाबले में ईरानी जनता और नेतृत्व के प्रतिरोध ने दुनिया को हैरान कर दिया है, क्योंकि किसी को उम्मीद नहीं थी कि कोई राष्ट्र दुनिया की सबसे बड़ी वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य शक्ति के सामने डटकर खड़ा हो सकता है। यह ताकत इंतज़ार और महदवियत की आस्था, शहीदों के बलिदान और इमाम खुमैनी की विचारधारा से प्राप्त हुई है और इस मूल्यवान विरासत की रक्षा करना जरूरी है।
आयतुल्लाह आराफी ने अमेरिका और साम्राज्यवादी व्यवस्था की 9 कमजोरियों को बताते हुए कहा:
- अन्याय पर आधारित सभ्यता: पश्चिमी विकास की नींव में एशिया, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों के उपनिवेशीकरण तथा उनके संसाधनों की लूट शामिल रही है। अन्याय पर खड़ी इमारत अंततः कमजोर हो जाती है।
- वैश्विक नफरत: दुनिया में साम्राज्यवाद के खिलाफ गहरी नफरत पाई जाती है, हालांकि बहुत से नेताओं में इसके खिलाफ आवाज उठाने का साहस नहीं है।
- जटिल आर्थिक व्यवस्था: विकसित होने के बावजूद उनकी आर्थिक व्यवस्था ऐसी जटिलताओं का शिकार है, जो उसे कमजोर बनाती हैं।
- भ्रष्टाचार पर आधारित अर्थव्यवस्था: भेदभाव, लूट और भ्रष्टाचार पर आधारित आर्थिक व्यवस्था भी उनकी कमजोरी का एक कारण है।
- विलासितापूर्ण जीवन और संकट सहने की कम क्षमता: कृत्रिम सुख-सुविधाओं ने उनमें प्रतिरोध और बड़े संकटों को सहन करने की क्षमता कम कर दी है।
- ईरान की जानकारी का अभाव: वे ईरान की नई युद्ध रणनीति तथा गैर-पारंपरिक और असमान युद्ध के तरीकों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।
- राजनीतिक गतिरोध: अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था आंतरिक राजनीतिक गतिरोध का शिकार हो चुकी है और बहुत-सी आवाजों को प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।
- दोहरे मापदंड: जहां लोकतंत्र और जनता की शासन व्यवस्था नहीं है, ऐसे देश अमेरिका के करीब हैं, जबकि लोकतांत्रिक देश भी उसके लिए स्वीकार्य नहीं हैं। इससे वैश्विक नफरत बढ़ती है।
- गलत आकलन: अमेरिका ने ईरान, उसकी सशस्त्र सेनाओं, जनता और यहां तक कि अपने विरोधियों को भी सही ढंग से नहीं समझा और ऐसे फैसले किए, जिनके कारण वह युद्ध में उलझ गया।
उन्होंने आगे कहा कि ईरान की जनता, इस्लामी क्रांति, प्रतिरोध की धुरी और उम्मते मुस्लिमा साम्राज्यवाद के मुकाबले में मजबूती से खड़ी रहेगी।
इज्जत, धैर्य और बसीरत सफलता के सिद्धांत हैं
आयतुल्लाह आराफी ने पहले खुत्बे में कहा कि इज्जत, धैर्य व प्रतिरोध और बसीरत इस्लामी समाज के बुनियादी सिद्धांत हैं। उन्होंने सूरह यूसुफ की आयत «कुल हाज़िही सबीली अदऊ इलल्लाहि अला बसीरतिन» की व्याख्या करते हुए कहा कि अल्लाह की ओर बुलावा केवल सामान्य जानकारी पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें बुद्धि, विवेक और गहरी बसीरत भी होनी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बसीरत के दो बुनियादी पहलू हैं: आस्थागत बसीरत, यानी ईश्वर, आख़िरत और अस्तित्व की वास्तविकताओं की पहचान; और सामाजिक एवं राजनीतिक बसीरत, यानी सत्य के मार्ग, दुश्मन की साजिशों, फितनों और झूठे प्रचार को पहचानना।
उनके अनुसार, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने वाक़िया-ए-आशूरा के दौरान इस आयत की तिलावत करके स्पष्ट किया कि अल्लाह की पहचान के साथ हुज्जत-ए-खुदा, सीधे मार्ग और दुश्मन की धोखाधड़ी को पहचानना भी जरूरी है।
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