हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, भीकपुर, बिहार/ हौज़ा-ए-इल्मिया आयतुल्लाह खामेनेई, भीकपुर, बिहार, भारत की ओर से शहीद रहबर के चहलुम के अवसर पर एक विशेष शैक्षिक, वैचारिक और साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शहीद रहबर की याद, उनकी वैचारिक और क्रांतिकारी सेवाओं तथा विलायत-ए-फ़क़ीह के सिद्धांत के प्रचार के लिए उनके संघर्ष को श्रद्धांजलि दी गई। इस अवसर पर क्षेत्र के बड़ी संख्या में विलायत-ए-फ़क़ीह से श्रद्धा रखने वाले लोगों ने भाग लिया और शहीद रहबर के प्रति अपनी श्रद्धा और जुड़ाव व्यक्त किया।

बिहार की धरती, विशेष रूप से भीकपुर क्षेत्र, पिछले कई वर्षों से विलायत-ए-फ़क़ीह, इस्लामी क्रांति, महान रहबर और शहीद रहबर की विचारधारा के प्रचार के लिए विभिन्न शैक्षिक, वैचारिक और साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। यहां कभी वैचारिक बैठक, कभी साहित्यिक सभा और कभी शहीद रहबर तथा अन्य शहीदों की याद में शैक्षिक एवं वैचारिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें उलमा, शायर, शोधकर्ता, लेखक, शिक्षक, प्रोफेसर, वकील और साहित्य से जुड़े लोग सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
इसी क्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी हौज़ा-ए-इल्मिया आयतुल्लाह खामेनेई है, जो पिछले 18 वर्षों से हर वर्ष विलायत सम्मेलन आयोजित करता आ रहा है। इन सम्मेलनों और अन्य शैक्षिक एवं साहित्यिक कार्यक्रमों में विलायत-ए-फ़क़ीह, इस्लामी क्रांति और क्रांतिकारी विचारधारा के विषयों पर अब तक लगभग दो हजार क्रांतिकारी और वैचारिक कविताएं प्रस्तुत की जा चुकी हैं। वहीं विलायत-ए-फ़क़ीह, महान रहबर, शहीद रहबर और क्रांतिकारी विचारों के विभिन्न पहलुओं पर अनेक लेख भी प्रस्तुत किए गए हैं। इसी दौरान कई पुस्तकों के विमोचन समारोह भी आयोजित किए जा चुके हैं। इन शैक्षिक और वैचारिक गतिविधियों के अंतर्गत प्रस्तुत किए गए लेखों की कुल संख्या लगभग तीन हजार तक पहुंच चुकी है।
इसी क्रम में भीकपुर में शहीद रहबर का चहलुम बेहद श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य शहीद रहबर के जीवन, उनकी वैचारिक और क्रांतिकारी सेवाओं, विलायत-ए-फ़क़ीह से उनकी प्रतिबद्धता तथा उनके विचारों और सिद्धांतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना था।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हौज़ा-ए-इल्मिया आयतुल्लाह खामेनेई के संस्थापक हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद शमा मुहम्मद रिज़वी ने शहीद रहबर के विचारों को जीवित रखने और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शहीद रहबर की याद में लगातार सभाएं, बैठकें तथा शैक्षिक और वैचारिक कार्यक्रम आयोजित करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है, ताकि उनके बलिदानों, विचारों और सिद्धांतों को समाज में और अधिक उजागर किया जा सके।
उन्होंने शायरों से विशेष रूप से आग्रह किया कि शहीद रहबर और विलायत-ए-फ़क़ीह के संदेश को काव्य के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाए। उनके इस आह्वान पर शायरों ने विलायत-ए-फ़क़ीह, ज्ञान और विवेक, नैतिकता, जनहित, चिंतन, सहनशीलता और इस्लामी क्रांति जैसे विषयों पर अपनी क्रांतिकारी कविताएं प्रस्तुत कीं और अपने काव्य के माध्यम से शहीद रहबर को श्रद्धांजलि दी।
मौलाना सैयद शमा मुहम्मद रिज़वी ने अपने संबोधन में वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में रहबरे-मुअज़्ज़म से संबंधित विभिन्न शोधपरक और वैचारिक बिंदु भी प्रस्तुत किए। उन्होंने वर्तमान रहबरे-मुअज़्ज़म हज़रत आयतुल्लाह सैयद मुजतबा खामेनेई के संबंध में संकल्प, प्रतिज्ञा और वफादारी के अर्थ पर प्रकाश डालते हुए विलायत-ए-फ़क़ीह से अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत करने का आह्वान किया।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि शहीद रहबर को केवल किसी एक विशेष अवसर पर याद करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हर शैक्षिक और वैचारिक कार्यक्रम में शहीदों, विशेष रूप से शहीद रहबर की सेवाओं और बलिदानों को उजागर किया जाना चाहिए। उन्होंने घोषणा की कि इंशाअल्लाह अगले महीने से विभिन्न क्षेत्रों में भी शहीदों की याद में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, ताकि उनके बलिदानों और विचारों को आम किया जा सके।

कार्यक्रम की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि इसमें उलमा और ख़तीबों के साथ-साथ शोधकर्ताओं, लेखकों, प्रोफेसरों, शिक्षकों और वकीलों ने भी भाग लिया। इस तरह यह सभा केवल एक धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक शैक्षिक, वैचारिक और साहित्यिक बैठक का रूप ले गई, जहां जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों ने शहीद रहबर की विचारधारा और विलायत-ए-फ़क़ीह के विषय पर अपने विचार और जुड़ाव व्यक्त किए।
कार्यक्रम की शुरुआत पवित्र क़ुरआन की तिलावत से हुई। तिलावत और कार्यक्रम के संचालन की जिम्मेदारी मौलाना मुहम्मद रज़ा मारूफ़ी ने निभाई। उन्होंने कार्यक्रम के विभिन्न चरणों को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया।
इसके बाद मदहख़्वानी और काव्य सभा का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें शायरों ने विलायत-ए-फ़क़ीह, शहीद रहबर और क्रांतिकारी विचारधारा के विषयों पर अपनी काव्यात्मक श्रद्धांजलि प्रस्तुत की। इस अवसर पर सैयद इक़बाल हुसैन एडवोकेट, सैयद इंतज़ार हुसैन रिज़वी और परवेज़ भीकपुरी ने अपने काव्य के माध्यम से शहीद रहबर और विलायत-ए-फ़क़ीह की विचारधारा के प्रति अपनी श्रद्धा और जुड़ाव व्यक्त किया। शायरों ने ज्ञान और विवेक, नैतिकता, जनहित, चिंतन, सहनशीलता और इस्लामी क्रांति जैसे विभिन्न विषयों को अपनी कविताओं का हिस्सा बनाया, जिससे कार्यक्रम का साहित्यिक और वैचारिक वातावरण और अधिक प्रभावशाली हो गया।
कार्यक्रम की एक विशेष और उल्लेखनीय बात आधुनिक विज्ञान के शिक्षक, लेख लेखक और शोधकर्ता सैयद आले इब्राहीम रिज़वी का संबोधन था, जो उन्होंने अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत किया। उन्होंने शहीद रहबर के इतिहास, उनकी वैचारिक संघर्ष यात्रा और सेवाओं का विस्तार से उल्लेख किया तथा इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि शहीद रहबर का व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा आज भी विभिन्न वर्गों में याद की जा रही है। उनका संबोधन इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था कि इसके माध्यम से शहीद रहबर के विचारों और सेवाओं को आधुनिक शिक्षित और अंग्रेजी जानने वाले वर्ग तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।
कार्यक्रम के अंत में उलमा, शायरों, शोधकर्ताओं और अन्य प्रतिभागियों ने शहीद रहबर तथा सभी शहीदों की सेवाओं और बलिदानों को श्रद्धांजलि दी और इस संकल्प को दोहराया कि विलायत-ए-फ़क़ीह, एकता, जागरूकता और क्रांतिकारी विचारधारा के संदेश को समाज में आम करने के लिए शैक्षिक, वैचारिक और साहित्यिक गतिविधियों का यह सिलसिला आगे भी जारी रखा जाएगा।

भीकपुर में आयोजित यह कार्यक्रम न केवल शहीद रहबर की याद को ताजा करने का माध्यम बना, बल्कि इस क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से जारी शैक्षिक, वैचारिक और साहित्यिक गतिविधियों की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी साबित हुआ। हौज़ा-ए-इल्मिया आयतुल्लाह खामेनेई की ओर से जारी यह सिलसिला इस संदेश का प्रतीक है कि व्यक्ति दुनिया से विदा हो सकते हैं, लेकिन उनके विचार, सिद्धांत और संदेश जीवित रहते हैं।
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