शनिवार 8 अगस्त 2026 - 08:10
दुनिया ने प्रतिरोध की अहमियत को समझ लिया, ईरानी राष्ट्र अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटेगा।आयतुल्लाह आराफी

हौज़ा / क़ुम अल मुकद्दस के इमाम ए जुमआ आयतुल्लाह अली रज़ा आराफी ने ईरान की हालिया जंग और प्रतिरोध को वैश्विक एवं सभ्यतागत स्तर पर एक महत्वपूर्ण अनुभव बताते हुए कहा कि इस युद्ध ने दुनिया के सामने आठ महत्वपूर्ण सबक पेश किए हैं। इनमें वैश्विक नैतिक और कानूनी व्यवस्था की विफलता, अमेरिका और ज़ायोनी शासन की वास्तविकता का उजागर होना तथा प्रतिरोध की अहमियत का दुनिया के सामने स्पष्ट होना शामिल है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , क़ुम के इमाम ए जुमआ आयतुल्लाह अली रज़ा आराफी ने क़ुम मुक़द्दसा में नमाज़ जुमआ के ख़ुत्बों में कहा कि प्रतिरोध बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण धैर्य का नाम है। ईरानी राष्ट्र ने इसी रास्ते को अपनाते हुए इस्लामी सभ्यता की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया है।

उन्होंने हालिया युद्ध के आठ महत्वपूर्ण सबक बताते हुए कहा कि पहला सबक आधुनिक दुनिया की नैतिक व्यवस्था का पतन है, क्योंकि बड़ी शक्तियों ने मानवीय और नैतिक सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। दूसरा सबक वैश्विक कानूनी और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विफलता है। सुरक्षा परिषद सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अत्याचार के सामने या तो खामोश रहीं या फिर अत्याचारियों का साथ देती नज़र आईं।

तीसरे सबक के रूप में उन्होंने अमेरिका और ज़ायोनी शासन की वास्तविकता के उजागर होने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बच्चों की हत्या, जनसंहार, बुनियादी ढांचे की तबाही और बेरहम कार्रवाइयों ने उनकी वास्तविकता दुनिया के सामने स्पष्ट कर दी है। चौथा सबक यह है कि दुश्मन के वादों और बातचीत पर भरोसा करने की कोई गारंटी नहीं रह गई है, क्योंकि उन्होंने अपने समझौतों का भी पालन नहीं किया।

आयतुल्लाह आराफी ने कहा कि पांचवां सबक यह है कि क्षेत्र के देशों ने समझ लिया है कि अमेरिका से मांगी गई उधार की सुरक्षा उनके लिए लाभदायक नहीं है। छठे सबक के रूप में उन्होंने अमेरिका को ‘शीशे का महल’ बताते हुए कहा कि दुनिया ने देख लिया है कि ईरान और प्रतिरोध के मोर्चे के मुकाबले अमेरिका की शक्ति सीमित है।

उन्होंने सातवें सबक के रूप में ईरानी राष्ट्र के संकल्प और दृढ़ता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राष्ट्र इस्लाम, क्रांति, नेतृत्व और सशस्त्र बलों के समर्थन में अपने रास्ते से पीछे नहीं हटेगा। आठवें और सबसे महत्वपूर्ण सबक के बारे में उन्होंने कहा कि दुनिया ने प्रतिरोध की अहमियत को समझ लिया है और दुश्मन का ईरानी राष्ट्र को अपनी शर्तों पर झुकाने का सपना कभी पूरा नहीं होगा।

ईरान के मदरसा एवं धार्मिक शिक्षण संस्थानों के प्रमुख आयतुल्लाह आराफी ने आगे कहा कि प्रतिरोध को जारी रखने के लिए जागरूकता, अंतर्दृष्टि, साहस, मैदान में मौजूदगी, वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति, सामाजिक एकता और नेतृत्व का अनुसरण आवश्यक है। उन्होंने मजबूत सैन्य और रक्षा शक्ति को आज के दौर में देश के अस्तित्व के लिए अनिवार्य बताते हुए जिहादी प्रबंधन और जनता के सहयोग पर जोर दिया।

आयतुल्लाह आराफी ने सांस्कृतिक सुधार, धार्मिक मूल्यों और हिजाब के मुद्दे पर भी ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रतिरोध को जारी रखने के लिए समाज की पवित्रता और नैतिक मजबूती आवश्यक है।

उन्होंने अरबईन के शानदार आयोजन में ईरान और इराक़ की जनता तथा आयोजकों के प्रयासों की सराहना करते हुए अरबईन को एक महान सभ्यतागत पूंजी बताया और कहा कि इस पर अधिक शोध और निवेश किए जाने की जरूरत है।

उन्होंने क़ुरआन की आयतों का हवाला देते हुए कहा कि धैर्य और तक़वा दुश्मन की साज़िशों के मुकाबले इंसान को मजबूत बनाते हैं। उनके अनुसार, जब धैर्य किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत विशेषता से आगे बढ़कर समाज की सामूहिक संस्कृति बन जाता है, तो राष्ट्र कठिनाइयों के सामने अजेय हो जाता है।

आयतुल्लाह आराफी ने जोर देकर कहा कि प्रतिरोध वास्तव में आज़ादी, सम्मान और बड़े सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सक्रिय, सामूहिक और आदर्शवादी धैर्य है। यही विचार इस्लामी क्रांति की वैचारिक विरासत बनकर पूरे इस्लामी जगत में एक विचारधारा का रूप ले चुका है।

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