हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, धार्मिक विषयों पर विचार व्यक्त करते समय इफ़रात और तफ़रीत से बचना एक ऐसी बारीक सीमा है, जिसका पालन करना आसान नहीं है। इस पुस्तक में दो गलत दृष्टिकोणों की आलोचना की गई है। पहला यह कि आम लोगों की पसंद को धर्म का मापदंड बना लिया जाए और दूसरा यह कि इस्लाम को समय की बदलती पसंद के अनुसार ढाल दिया जाए।
किसी भी मामले में इफ़रात और तफ़रीत से बचकर संतुलन की ओर बढ़ना आसान नहीं है। ऐसा लगता है कि संतुलन का मार्ग हमेशा एक पतली रेखा की तरह होता है, जिससे थोड़ी-सी भी लापरवाही व्यक्ति को बाहर कर सकती है। धार्मिक ग्रंथों में ‘सिरात’ को बाल से भी पतला बताया जाना इसी बात की ओर संकेत करता है कि हर मामले में संतुलन बनाए रखना कठिन होता है।
कुछ लोग इतने अधिक आम लोगों की पसंद से प्रभावित होते हैं कि उनके लिए आम लोगों की पसंद ही एकमात्र मापदंड बन जाती है। जबकि आम लोगों की सोच अक्सर अतीत की ओर अधिक होती है और वे वर्तमान तथा भविष्य पर ध्यान नहीं देते।
दूसरी ओर, कुछ लोग वर्तमान समय की परिस्थितियों पर ध्यान देते हैं और भविष्य के बारे में सोचते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से वे इस्लाम की शिक्षाओं को समय की पसंद के अनुसार ढालने लगते हैं। वे ‘स्वतंत्र इज्तिहाद’ के नाम पर वर्तमान समय की पसंद को मापदंड बना लेते हैं। इसके बजाय कि इस्लाम को अपने समय में सही और गलत का मापदंड मानें, वे समय की प्रचलित सोच और पसंद को ही इस्लाम का मापदंड बना देते हैं।
उदाहरण के तौर पर यह कहा जाता है कि मेहेर नहीं होना चाहिए, क्योंकि वर्तमान समय इसे पसंद नहीं करता। बहुविवाह को महिलाओं की गुलामी के दौर की निशानी बताया जाता है। इसी तरह पर्दे को भी पुराने समय से जोड़ दिया जाता है। किराया, मुज़ारबा और मुज़ारेआ को सामंती व्यवस्था के दौर की परंपराएं बताया जाता है और कहा जाता है कि इस्लाम बुद्धि और इज्तिहाद का धर्म है, इसलिए इज्तिहाद इस तरह के फैसले करता है।
‘नहज़त हाए इस्लामी दर सद साला ए अखीर’, पेज 94 (संक्षिप्त)
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