हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, तारागढ़, अजमेर में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सय्यद नक़ी महदी ज़ैदी ने नमाज़े जुमा के ख़ुत्बे में तक़वा-ए-इलाही अपनाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने इमाम हसन अस्करी (अलैहिस्सलाम) के वसीयतनामे की व्याख्या का सिलसिला जारी रखते हुए माफ़ी और दरगुज़र की अहमियत बयान की। उन्होंने कहा कि इस्लाम ने इंसानी समाज में प्रेम, सुधार और आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए माफ करने और दरगुज़र से काम लेने की विशेष रूप से ताकीद की है।
उन्होंने क़ुरआन मजीद की सूरह बक़रा की आयत "وَأَن تَعْفُوا أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ" का हवाला देते हुए कहा कि दूसरों को माफ करना तक़वे के अधिक करीब है। इसी तरह सूरह नूर की आयत "وَلْیَعْفُوا وَلْیَصْفَحُوا أَلَا تُحِبُّونَ أَن یَغْفِرَ اللّٰهُ لَكُمْ" के ज़रिए माफ़ी और दरगुज़र की प्रेरणा दी गई है कि इंसान दूसरों की गलतियों को माफ कर दे। क्या वह यह पसंद नहीं करता कि अल्लाह उसे माफ कर दे?
मौलाना सैयद नक़ी मेहदी ज़ैदी ने 'अफ़्व' और 'सफ़्ह' के अर्थ समझाते हुए कहा कि अफ़्व का मतलब यह है कि इंसान किसी व्यक्ति से उस अधिकार या सज़ा के मामले में दरगुज़र करे, जिसका वह हक़दार हो। जबकि सफ़्ह का मतलब दिल से गलती को माफ करके उसे नज़रअंदाज़ करना है। उन्होंने कहा कि 'अफ़्व' अल्लाह के अच्छे नामों में भी शामिल है।
उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) की हदीस "ارْحَمُوا مَنْ فِي الْأَرْضِ يَرْحَمْكُمْ مَنْ فِي السَّمَاءِ" का हवाला देते हुए कहा कि जो लोग ज़मीन वालों पर रहम करते हैं, अल्लाह उन पर रहम करता है।
तारागढ़ के इमामे जुमा ने सूरह आले इमरान में मुत्तक़ी लोगों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए आयत "وَالْكَاظِمِينَ الْغَيْظَ وَالْعَافِينَ عَنِ النَّاسِ وَاللّٰهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ" की तिलावत की। उन्होंने कहा कि तक़वा वाले लोग वे हैं जो अपने गुस्से पर काबू रखते हैं और लोगों की गलतियों को माफ कर देते हैं, जबकि अल्लाह नेकी करने वालों को पसंद करता है।
उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) से बयान की गई एक रिवायत का हवाला देते हुए कहा कि जब इंसान को गुस्सा आए तो उसे माफ़ी के ज़रिए दूर करना चाहिए, क्योंकि क़यामत के दिन अल्लाह की ओर से उन लोगों को विशेष इनाम दिया जाएगा जो दूसरों को माफ करने वाले होंगे। इसी तरह एक अन्य रिवायत में माफ़ी और दरगुज़र को इंसान की इज़्ज़त बढ़ाने का ज़रिया बताया गया है।
मौलाना नक़ी मेहदी ज़ैदी ने हज़रत अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अलैहिस्सलाम) की इमाम हसन मुज्तबा (अलैहिस्सलाम) को की गई वसीयत का हवाला देते हुए कहा कि कुछ मौकों पर अच्छे तरीके से माफ कर देना सज़ा देने से अधिक प्रभावी होता है। उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अलैहिस्सलाम) की एक रिवायत भी बयान की, जिसमें कहा गया है कि दुनिया और आख़िरत की महान विशेषताओं में से एक यह है कि इंसान अपने ऊपर ज़ुल्म करने वाले को माफ कर दे, उससे संबंध बनाए जो उससे संबंध तोड़ चुका हो और जो उसके साथ अज्ञानता से पेश आए, उसके सामने धैर्य से काम ले।
उन्होंने हज़रत अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अलैहिस्सलाम) की मुनाजात "إِلَهِي أُفَكِّرُ فِي عَفْوِكَ فَتَهُونُ عَلَيَّ خَطِيئَتِي..." का हवाला देते हुए कहा कि इंसान को अल्लाह की माफ़ी और उसकी पकड़, दोनों को ध्यान में रखना चाहिए। इसी तरह नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली (अलैहिस्सलाम) के कथनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अल्लाह अपने बंदों के छोटे-बड़े, खुले और छिपे हुए सभी कर्मों का हिसाब लेगा। अगर वह अज़ाब देगा तो यह बंदों के कर्मों का परिणाम होगा और अगर माफ कर देगा तो यह उसके करम का प्रमाण होगा।
ख़तीबे जुमा ने पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) और एक देहाती के बीच हुई घटना का ज़िक्र करते हुए कहा कि जब उस देहाती ने क़यामत के दिन हिसाब लेने वाले के बारे में सवाल किया और पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम) ने बताया कि अल्लाह हिसाब लेगा, तो उसने अल्लाह की रहमत और करम पर भरोसा जताया। इस घटना से यह बात स्पष्ट होती है कि अल्लाह शक्ति रखने के बावजूद अपने बंदों को माफ करने वाला है।
मौलाना नक़ी मेहदी ज़ैदी ने इमाम हसन मुज्तबा (अलैहिस्सलाम) और एक शाम के रहने वाले व्यक्ति के बीच पेश आए प्रसिद्ध घटना को भी माफ़ी और सहनशीलता की व्यावहारिक मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि एक शाम के व्यक्ति ने इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) के सामने कठोर बातें कहीं, लेकिन इमाम ने जवाब में सख्ती के बजाय अत्यंत प्रेम और दया का प्रदर्शन किया। आपने उसे अपनी ज़रूरतें बताने और मदद मांगने के लिए आमंत्रित किया। इमाम हसन (अलैहिस्सलाम) के इस उदार व्यवहार से वह व्यक्ति प्रभावित हुआ और अपने पिछले व्यवहार पर शर्मिंदा हुआ।
उन्होंने कहा कि माफ़ी और दरगुज़र केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि इस्लामी تربियत और तक़वे का व्यावहारिक रूप है। अगर इंसान गुस्से के समय अपने नफ़्स पर काबू रखते हुए दूसरों की गलतियों को माफ कर दे और सुधार तथा भलाई का रास्ता अपनाए, तो इससे न केवल व्यक्ति का नैतिक विकास होता है, बल्कि समाज में भी प्रेम, विश्वास और आपसी संबंध मजबूत होते हैं।
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