हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ/11 सितंबर 2026: लखनऊ की शाही आसफी मस्जिद में जुमे की नमाज़ हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी, प्रधानाचार्य हौज़ा-ए-इल्मिया हज़रत गुफरान मआब रहमतुल्लाह अलैह लखनऊ, की इमामत में अदा की गई। जुमे के खुतबे में उन्होंने अल्लाह से डरने, अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की सीरत, अच्छे आचरण, ईमानदारी, तक़य्या, एकता, धार्मिक जिम्मेदारी और मौजूदा हालात के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने खुतबे की शुरुआत में तक़वा-ए-इलाही पर जोर देते हुए दुआ की कि अल्लाह तआला हमारे दिलों, दिमागों और कामों में हमेशा तक़वा बनाए रखने की तौफीक दे।
उन्होंने एक हदीस की व्याख्या करते हुए बनी उमय्या की शासन व्यवस्था और अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की इमामत के तरीके की तुलना की। उन्होंने कहा कि बनी उमय्या की हुकूमत ताकत, जुल्म और सख्ती पर आधारित थी, जबकि अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की इमामत में नरमी, प्रेम, गरिमा, तक़य्या, तक़वा और संघर्ष जैसी विशेषताएं दिखाई देती हैं।
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने स्पष्ट किया कि नरमी कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी और उचित तरीके से मामलों को संभालने का नाम है। अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम की सीरत इंसानों को एक-दूसरे से जोड़ने की शिक्षा देती है। इसलिए उनके अनुयायियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने अच्छे व्यवहार और चरित्र के माध्यम से लोगों को धर्म की ओर आकर्षित करें।
उन्होंने कहा कि अच्छा व्यवहार केवल मस्जिद तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि घर, बाजार और सामाजिक जीवन में भी दिखाई देना चाहिए। इंसान को अपनी पत्नी, बच्चों, दोस्तों और दूसरे लोगों के साथ नरमी से पेश आना चाहिए। उन्होंने ईमानदारी और सच्चाई की अहमियत बताते हुए कहा कि मामूली सांसारिक लाभ के लिए झूठ और धोखाधड़ी से बचना जरूरी है।
तक़य्या की व्याख्या करते हुए मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने कहा कि जब इंसान की जान, माल, सम्मान या धर्म को खतरा हो तो अपने धर्म की रक्षा के लिए समझदारी के साथ काम करना तक़य्या के अर्थ में शामिल है। उन्होंने हदीस में आए ‘इज्तिहाद’ की व्याख्या करते हुए कहा कि यहां इज्तिहाद से मतलब धार्मिक कानून से संबंधित विशेष इस्लाह वाला इज्तिहाद नहीं, बल्कि कोशिश, मेहनत और प्रयास है।
मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने कहा कि अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के मानने वालों की जिम्मेदारी केवल अपनी सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें अपने चरित्र के माध्यम से दूसरों को भी धर्म और अहले-बैत की विलायत की ओर आकर्षित करना चाहिए। पहले इंसान खुद धर्म को समझे और उस पर अमल करे, फिर अपने व्यवहार और चरित्र के माध्यम से दूसरों को उसकी ओर बुलाए।
उन्होंने गैर-मुसलमानों के साथ भी अमानतदारी, न्याय और अच्छे व्यवहार पर जोर देते हुए कहा कि किसी गैर-मुसलमान का माल केवल उसके गैर-मुसलमान होने की वजह से जायज़ नहीं हो जाता। अहले-बैत अलैहिमुस्सलाम के अनुयायियों को हर हाल में ईमानदारी और अमानतदारी का प्रदर्शन करना चाहिए।
मस्जिद गिराए जाने पर चिंता
खुतबे के दूसरे हिस्से में मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने हाल के हालात के संदर्भ में सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने का जिक्र किया। उन्होंने मजलिस उलमा-ए-हिंद के बयान का सार बताते हुए कहा कि मस्जिद को कथित रूप से गैरकानूनी तरीके से गिराए जाने की निंदा की गई है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, प्रशासनिक आदेशों और कार्रवाई का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने, सीसीटीवी फुटेज और वीडियो सार्वजनिक करने, मशीनरी तथा पुलिस कार्रवाई से संबंधित आदेशों की जांच और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।
उन्होंने कहा कि देश में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए न्याय और कानून का प्रभुत्व जरूरी है। शासकों को भी अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी के साथ निभानी चाहिए, ताकि समाज में शांति और व्यवस्था कायम रहे।
क्षेत्र की स्थिति और प्रतिरोध का जिक्र
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने क्षेत्र की मौजूदा स्थिति का जिक्र करते हुए यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन और प्रतिरोध के विभिन्न पहलुओं पर भी बात की। उन्होंने कहा कि बड़ी ताकतों के जुल्म और अत्याचार के बावजूद हालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। प्रतिरोध और दृढ़ता के परिणामस्वरूप हालात बदल सकते हैं।
उन्होंने हिजबुल्लाह के एक महत्वपूर्ण भूमिगत स्थान पर इजरायली हमले का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसी घटनाएं प्रतिरोध के संकल्प को कमजोर नहीं कर सकतीं। उन्होंने मोमिनों को निराशा और भय से बचने तथा दृढ़ता का प्रदर्शन करने की सलाह दी।
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने इजरायल के भविष्य के संबंध में रहबर-ए-मुअज्जम शहीद आयतुल्लाह सैयद अली खामेनेई रज़वानुल्लाह तआला अलैह के पिछले बयान का हवाला देते हुए कहा कि क्षेत्र के हालात को लंबे समय के दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है।
तव्वाबीन का आंदोलन और हज़रत मुख्तार सकफी की तुलना
खुतबे के एक महत्वपूर्ण हिस्से में मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने तव्वाबीन के आंदोलन और हज़रत मुख्तार सकफी के आंदोलन की तुलना की।
उन्होंने कहा कि घटना-ए-कर्बला के बाद कूफा के कुछ लोगों को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मदद न कर पाने पर बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने तौबा तथा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कातिलों से बदला लेने के लिए आंदोलन किया। इतिहास में यह समूह ‘तव्वाबीन’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने कहा कि तव्वाबीन की नीयत में तौबा और पछतावे की भावना मौजूद थी और उनके कई लोग शहीद हुए। हालांकि, उनके व्यावहारिक तरीके की तुलना हज़रत मुख्तार सकफी के आंदोलन से की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि हज़रत मुख्तार सकफी ने पहले कूफा पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कातिलों को तलाश करके उनसे बदला लिया। इस तरह उनका आंदोलन अपने मूल उद्देश्य को हासिल करने के लिहाज से प्रभावी साबित हुआ।
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने इस ऐतिहासिक घटना से यह निष्कर्ष निकाला कि केवल भावनाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सही पहचान, सूझ-बूझ, समझदारी, नेतृत्व और उचित रणनीति भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि जज़्बा अपनी जगह जरूरी है, लेकिन भावनाओं के प्रभाव में इंसान सही फैसले लेने की क्षमता खो सकता है।
मोमिन को खुश करना इबादत है
खुतबे में उन्होंने मोमिन के दिल को खुश करने की अहमियत बताते हुए कहा कि किसी मोमिन को खुश करना इबादत है। बीमार की खबर लेना, किसी को उपहार देना, अच्छे व्यवहार और अच्छे आचरण के माध्यम से किसी का दिल खुश करना भी नेक कामों में शामिल है।
हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी मोमिन को खुश करने के लिए झूठ, चुगली, मजाक उड़ाने या किसी हराम तरीके का इस्तेमाल सही नहीं है। अगर किसी पसंदीदा या पुण्य के काम के लिए हराम तरीका अपनाया जाए तो वह पुण्य का काम नहीं रह जाता।
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने हज़रत मुख्तार सकफी के चरित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम को खुश किया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कातिलों से बदला लिया। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक व्यक्तियों और उनके कार्यों को भावनाओं के बजाय सूझ-बूझ और ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ में समझने की जरूरत है।
अंत में मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने दुआ की कि अल्लाह तआला ईमान वालों को भावनाओं की बाढ़ में बहने के बजाय सत्य और सूझ-बूझ के साथ फैसले करने, अपने धार्मिक नेतृत्व पर भरोसा रखने, आपसी एकता और भाईचारा कायम रखने तथा पैगंबर मुहम्मद और उनके परिवार की सीरत पर अमल करने की तौफीक दे। उन्होंने पीड़ितों और प्रतिरोध करने वालों की सफलता, क्षेत्र में शांति की स्थापना तथा जुल्म और अन्याय के अंत के लिए भी दुआ की।
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