हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मौलाना तनवीरुल हसन, इमाम-ए-जुमा गाज़ीपुर ने जुमे के ख़ुत्बे में सूरह-ए-अहज़ाब की आयत 21 का हवाला देते हुए कहा कि परवरदिगार-ए-आलम ने रसूल-ए-अकरम (स) की ज़िंदगी को तमाम इंसानों के लिए बेहतरीन नमूना-ए-अमल क़रार दिया है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अल्लाह की ज़ात पर ईमान रखता है, आख़िरत पर यक़ीन करता है और कसरत से ज़िक्र-ए-ख़ुदा करता है, उसके लिए रसूल (स) की सीरत बेहतरीन नमूना-ए-अमल है।
उन्होंने कहा कि इस आयत में अल्लाह तआला ने एक अहम बात की ओर इशारा किया है कि केवल रसूल (स) की सीरत का बयान करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उस पर अमल करना भी ज़रूरी है। आज हममें से हर मुसलमान यह कहता है कि वह रसूल-ए-अकरम (स) की सीरत पर अमल करता है। जगह-जगह बयानात, मजलिसें और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, लेकिन हमें गंभीरता से यह विचार करना चाहिए कि इन धार्मिक शिक्षाओं का हमारे जीवन पर कितना असर हो रहा है।
मौलाना तनवीरुल हसन ने कहा कि हमें यह तलाश करने की आवश्यकता है कि इतनी तबलीग और धार्मिक शिक्षाओं के बावजूद उनके प्रभाव में कमी क्यों दिखाई देती है। इसके लिए हमें रसूल-ए-अकरम (स) के दौर का अध्ययन करना चाहिए और देखना चाहिए कि उस समय पैगंबर (स) की तबलीग ने किस प्रकार एक जाहिल समाज को बदलकर इंसानियत, तौहीद और आख़िरत की सोच से परिचित कराया।
उन्होंने कहा कि रसूल-ए-अकरम (स) ऐसे दौर में मबऊस हुए जब अरब समाज जाहिलियत, भौतिकवाद और बुराइयों में डूबा हुआ था। इंसानियत की क़द्र कम हो चुकी थी और लोग दुनिया तथा भौतिक लाभ को ही जीवन का उद्देश्य समझते थे। ऐसे माहौल में रसूल (स) ने सबसे पहले लोगों को भौतिकवाद से निकालकर ख़ुदापरस्ती की ओर बुलाया।
ग़ाज़ीपुर के इमाम जुमा ने कहा कि माद्दापरस्ती से मुराद यह सोच है कि इंसान केवल दुनिया को ही सब कुछ समझे, दुनिया में धन और सुख प्राप्त करे और यह मान ले कि मौत के बाद कोई जीवन नहीं। रसूल-ए-अकरम (स) ने इस सोच को समाप्त करते हुए लोगों के सामने आख़िरत की वास्तविकता और उसके लिए तैयारी का विचार प्रस्तुत किया।
अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) फ़रमाते हैं कि इंसान दो प्रकार के हैं: एक दुनिया के बेटे और दूसरे आख़िरत के बेटे। दुनिया के बेटे वे हैं जिनके सभी प्रयास दुनिया हासिल करने के लिए होते हैं, जबकि आख़िरत के बेटे वे हैं जिनका जीवन आख़िरत की कामयाबी के लिए होता है।
मौलाना तनवीरूल हसन ने कहा कि हमें स्वयं से सवाल करना चाहिए कि हम दुनिया के बेटे हैं या आख़िरत के। यदि हमारा जीवन केवल दुनिया प्राप्त करने के लिए है तो हमारी प्राथमिकताएं भी दुनियावी होंगी, लेकिन यदि हमारे अंदर आख़िरत का विश्वास पैदा हो जाए तो हमारे काम और हमारे फैसले भी आख़िरत को ध्यान में रखकर होने लगेंगे।
उन्होंने कहा कि क़ुरआन मजीद में बार-बार आख़िरत का ज़िक्र किया गया है, ताकि इंसान समझ सके कि यह दुनिया स्थायी निवास नहीं बल्कि एक गुज़रगाह है। रसूल-ए-अकरम (स) ने जाहिलियत के समाज में यही आख़िरत का तसव्वुर पैदा किया। जब लोगों के भीतर यह विश्वास मजबूत हुआ तो उनमें तौहीद और ख़ुदापरस्ती की भावना भी मजबूत होती चली गई।
ग़ाज़ीपुर के इमाम जुमा ने कहा कि आज हमारे समाज में भी तबलीग की कमी नहीं है। घर-घर में धार्मिक बातें पहुंच रही हैं, मजलिसें हो रही हैं और बड़ी संख्या में लोग धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं, लेकिन यदि इंसान दुनिया की मोहब्बत और भौतिकवाद में डूबा रहेगा तो इन शिक्षाओं का वास्तविक प्रभाव उसके जीवन में दिखाई नहीं देगा।
उन्होंने कहा कि जब इंसान दुनिया-परस्ती से निकलकर आख़िरत-परस्ती की ओर बढ़ेगा, तब इस्लामी शिक्षाओं, अहल-ए-बैत (अ) के फ़रमानों और अल्लाह की हिदायत का प्रभाव उसके व्यवहार में दिखाई देना शुरू होगा।
मौलाना तनवीरुल हसन ने कहा कि इस्लामी शिक्षाओं का वास्तविक प्रभाव उसी व्यक्ति पर होता है जिसके दिल में आख़िरत का विश्वास मौजूद हो। इसलिए हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आख़िरत पर हमारा यक़ीन मजबूत हो। जब इंसान पूरे विश्वास के साथ कोई नेक अमल करता है तो उसका असर उसके चरित्र और जीवन में दिखाई देता है।
उन्होने कहा कि रसूल-ए-अकरम (स) ने लोगों की तर्बियत के लिए केवल عقائد और इबादत पर ज़ोर नहीं दिया, बल्कि समाज में मौजूद अच्छी विशेषताओं को भी सही दिशा दी। अरब समाज में अनेक बुराइयों के साथ कुछ अच्छी आदतें भी मौजूद थीं, जिनमें मेहमाननवाज़ी एक महत्वपूर्ण विशेषता थी।
ग़ाज़ीपुर के इमाम जुमा ने कहा कि अरब लोग मेहमाननवाज़ तो थे, लेकिन मेहमान की वास्तविक अज़मत और मेहमाननवाज़ी की आध्यात्मिक अहमियत से पूरी तरह परिचित नहीं थे। रसूल-ए-अकरम (स) ने मेहमाननवाज़ी को केवल सामाजिक परंपरा नहीं रहने दिया, बल्कि इसे इंसानी मोहब्बत, हिदायत और नेकी का माध्यम बना दिया।
उन्होंने कहा कि क़ुरआन मजीद में हज़रत इब्राहीम (अ), जो शैख़ुल-अंबिया हैं, की मेहमाननवाज़ी का उल्लेख मिलता है। उनकी ज़िंदगी में मेहमाननवाज़ी को विशेष महत्व प्राप्त था। रिवायतों में आता है कि हज़रत इब्राहीम (अ) मेहमान के बिना खाना पसंद नहीं करते थे और मेहमान की तलाश में रास्ते तक चले जाते थे।
मौलाना ने एक वाक़िये का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बार हज़रत इब्राहीम (अ) एक अजनबी व्यक्ति को अपने घर लाए और उसके सामने खाना पेश किया। जब उन्होंने उसे बिस्मिल्लाह पढ़ने के लिए कहा तो उस व्यक्ति ने बताया कि वह अल्लाह को नहीं मानता और बिस्मिल्लाह का अर्थ भी नहीं जानता। इस पर हज़रत इब्राहीम (अ) ने उसे अपने दस्तरख़्वान से उठा दिया। उस व्यक्ति के जाने के बाद हज़रत जिब्रईल (अ) आए और अल्लाह का पैग़ाम पहुंचाया कि ऐ इब्राहीम! अल्लाह ने उसके कुफ्र के बावजूद उसका रिज़्क बंद नहीं किया, लेकिन तुमने एक लुक़्मा खिलाने के लिए उसे दस्तरख़्वान से उठा दिया। यह सुनकर हज़रत इब्राहीम (अ) तुरंत उस व्यक्ति की तलाश में गए और उसे वापस बुलाया। जब उस व्यक्ति को पूरी घटना का पता चला तो उसने कहा कि जो अल्लाह उसे न मानने वाले व्यक्ति का भी रिज़्क बंद नहीं करता, वह कितना करीम है। इसके बाद उसने अल्लाह की तौहीद को स्वीकार किया और ईमान ले आया।
मौलाना ने कहा कि इस वाक़िये से स्पष्ट होता है कि मेहमान नवाज़ी केवल खाना खिलाने का नाम नहीं, बल्कि कभी-कभी यह किसी इंसान के दिल तक पहुंचने और उसे हिदायत की ओर लाने का माध्यम भी बन सकती है।
उन्होंने कहा कि हममें से बहुत से लोग मेहमान नवाज़ी की इस महान सुन्नत को भूलते जा रहे हैं। जबकि मेहमान और मेज़बान के बीच मोहब्बत, अपनापन और भाईचारा पैदा करने में मेहमान नवाज़ी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
रसूल-ए-अकरम (स) से मंसूब एक रिवायत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मेहमान अल्लाह की ओर से एक विशेष हदिया है। जब अल्लाह किसी बंदे के साथ भलाई का इरादा करता है तो उसे मेहमाननवाज़ी का अवसर प्रदान करता है और उसके घर मेहमान भेजता है। रिवायत के अनुसार, मेहमान के जाने के बाद अल्लाह मेज़बान के रिज़्क में इज़ाफ़ा करता है। इतना ही नहीं, मेहमान घर वालों के गुनाहों की मग़फ़िरत का भी ज़रिया बनता है।
मौलाना ने कहा कि मेहमान नवाज़ी इंसान को केवल दुनियावी लाभ नहीं देती, बल्कि यह उसके आध्यात्मिक जीवन के लिए भी फ़ायदेमंद है। इसलिए हमें रसूल-ए-अकरम (स) और अंबिया (अ) की सीरत से मेहमाननवाज़ी का सबक लेना चाहिए।
उन्होंने मदीना के एक व्यक्ति का वाक़िया बयान करते हुए कहा कि वह व्यक्ति रोज़ किसी न किसी मेहमान को अपने घर लाता था। उसकी पत्नी लगातार खाना तैयार करते-करते थक गई और उसने रसूल-ए-अकरम (स) से शिकायत की कि उसके पति को रोज़ मेहमान लाने से रोकें। रसूल-ए-अकरम (स) ने सीधे कोई जवाब देने के बजाय उस व्यक्ति से फ़रमाया कि अगले दिन मैं तुम्हारा मेहमान बनूंगा। जब रसूल (स) उसके घर आए और खाना खाया तो आपने उसे निर्देश दिया कि जब मैं घर से निकलूं तो अपनी पत्नी से कहना कि वह मेरे पीछे दरवाज़े तक आए। जब रसूल-ए-अकरम (स) घर से बाहर निकलने लगे तो उसकी पत्नी ने एक ऐसा दृश्य देखा कि वह बेहोश होकर गिर पड़ी। बाद में उसने बताया कि उसने देखा कि रसूल (स) के पीछे कुछ बलाएं और मुसीबतें घर से बाहर जाती दिखाई दे रही थीं।
मौलाना ने कहा कि इस वाक़िये से मेहमाननवाज़ी की बरकत और उसकी आध्यात्मिक अहमियत को समझा जा सकता है। मेहमान घर में केवल खाना खाने नहीं आता, बल्कि वह अपने साथ अल्लाह की रहमत और बरकत लेकर आता है। मेहमाननवाज़ी रिज़्क में इज़ाफ़े, गुनाहों की मग़फ़िरत और घर से मुसीबतों के दूर होने का माध्यम बन सकती है।
उन्होंने कहा कि आज हम दुनियावी व्यस्तताओं और भौतिक सोच में इतने व्यस्त हो गए हैं कि मेहमाननवाज़ी जैसी महत्वपूर्ण इस्लामी परंपरा को भी बोझ समझने लगे हैं। हमें अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है और रसूल-ए-अकरम (स) की सीरत को अपने घरों और समाज में जीवित करने की कोशिश करनी चाहिए।
मौलाना तनवीरुल हसन ने कहा कि यदि हम चाहते हैं कि हमारे समाज में मोहब्बत, भाईचारा, बरकत और धार्मिक मूल्यों को बढ़ावा मिले तो हमें आख़िरत पर विश्वास मजबूत करना होगा और रसूल-ए-अकरम (स) की सीरत को अपने जीवन का नमूना बनाना होगा। केवल रसूल (स) का नाम लेना और उनकी सीरत का बयान करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक कामयाबी यह है कि हमारे व्यवहार, हमारे घर, हमारे रिश्ते और हमारा सामाजिक जीवन भी रसूल-ए-अकरम (स) की सीरत की तस्वीर पेश करें।
ख़ुत्बे के अंत में मौलाना ने दुआ करते हुए कहा कि परवरदिगार-ए-आलम हमें रसूल-ए-अकरम (स) की सीरत पर सच्चे अर्थों में अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। हमारे दिलों में आख़िरत का यक़ीन मजबूत करे, हमें दुनिया-परस्ती से बचाए और मेहमाननवाज़ी तथा अन्य इस्लामी शिक्षाओं को अपनी ज़िंदगी में अपनाने की तौफ़ीक़ दे।
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