हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , सफीरान-ए-हिदायत मदरस के प्रबंधक हुज्जतुल इस्लाम सैय्यद मूसा महमूदी ने कहा कि यमन के लड़ाके अपने निर्धारित लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब इस गतिरोध से निकलने के लिए अमेरिका से मदद की गुहार लगा रहा है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति इस मामले में हस्तक्षेप से बच रहे हैं और व्यावहारिक रूप से सऊदी अरब तथा उसके अन्य सहयोगियों को अकेला छोड़ दिया है।
उन्होंने हौज़ा न्यूज़ के संवाददाता से बातचीत में कहा कि हाल के सप्ताहों में पश्चिम एशिया में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं। इनमें ईरान के खिलाफ अमेरिका की अभूतपूर्व आर्थिक पाबंदियों की नीति की विफलता भी शामिल है।
हुज्जतुल इस्लाम महमूदी ने कहा कि जब अमेरिका ने देखा कि वह सैन्य मोर्चे पर ईरान की सशस्त्र सेनाओं और उसकी आक्रामक क्षमता का सामना करने में सक्षम नहीं है, तो उसने आर्थिक घेराबंदी और अभूतपूर्व प्रतिबंधों के जरिए ईरान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई। अमेरिका को उम्मीद थी कि ये प्रतिबंध धीरे-धीरे ईरान की व्यवस्था को प्रभावित करेंगे।
उन्होंने कहा कि दुश्मन को उम्मीद थी कि आर्थिक प्रतिबंधों के कारण ईरानी समाज में आंतरिक समस्याएं पैदा होंगी, लेकिन ईरानी जनता की सहनशीलता और दृढ़ता ने एक बार फिर साबित किया कि यह व्यवस्था विदेशी ताकतों के सामने एकजुट होकर खड़ी रहेगी।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका का परमाणु ऊर्जा के प्रति दृष्टिकोण पूरी तरह राजनीतिक है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि अमेरिका ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान के परमाणु विकास और क्षेत्रीय शक्ति को सीमित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अब तक उसकी सभी कोशिशें विफल रही हैं।
हुज्जतुल इस्लाम महमूदी ने जोर देकर कहा कि क्षेत्र में प्रतिरोध का मोर्चा कभी समाप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यमन के लड़ाके अपने लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और सऊदी अरब इस संकट से निकलने के लिए अमेरिका का सहारा लेने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति हस्तक्षेप से बच रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि अमेरिका ने सऊदी अरब और उसके सहयोगियों को मुश्किल समय में अकेला छोड़ दिया है।
उन्होंने कहा कि सऊदी अरब के प्रति अमेरिका की यह दोहरी नीति साबित करती है कि अमेरिका किसी देश से तब तक दोस्ती रखता है, जब तक वह देश स्थिर और किसी समस्या से मुक्त रहता है।
अंत में उन्होंने कहा कि अमेरिका की यह दोहरी और पाखंडपूर्ण नीति आज दुनिया के स्वतंत्र राष्ट्रों के सामने पूरी तरह उजागर हो चुकी है। इसलिए हमें अपनी स्वतंत्रता और शक्ति की कद्र करनी चाहिए तथा उन सभी तत्वों से दूर रहना चाहिए जो हमारी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर करते हैं।
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