शुक्रवार 9 अक्टूबर 2026 - 13:47
अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की सीरत पर अमल ही धार्मिक और राष्ट्रीय जागरूकता की बुनियाद है: मौलाना मोहम्मद मेराज रन्नवी

पेरिस, चेन्नई, तमिलनाडु में नमाज़-ए-जुमा के ख़तीब मौलाना मोहम्मद मेराज रन्नवी ने ख़ुत्बे में शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विकास, जनसेवा और सामूहिक ज़िम्मेदारी की भावना पर ज़ोर देकर कहा, “यह असंभव है कि कोई अली (अ) का मानने वाला हो और उसे दूसरों की फ़िक्र न हो।”

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, चेन्नई, तमिलनाडु: इमामे जुमा मौलाना मोहम्मद मेराज रन्नवी ने जुमे के ख़ुत्बे में शिया समुदाय के शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विकास, धार्मिक चेतना, राष्ट्रीय जागरूकता और सामूहिक ज़िम्मेदारियों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ) की सीरत को व्यावहारिक जीवन में अपनाने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि सच्ची धार्मिक प्रतिबद्धता का तकाज़ा है कि इंसान अपनी ज़ात और निजी हितों से आगे बढ़कर अपनी क़ौम, समाज और ज़रूरतमंद लोगों की भलाई के बारे में भी सोचे।

उन्होने कहा कि हज़रत अमीरुल मोमिनीन अली (अ) की सीरत न्याय, त्याग, मानवता, हमदर्दी, दूसरों की भलाई और जनसेवा की व्यापक शिक्षा देती है। इस सीरत का अनुसरण करने का अर्थ केवल ज़बानी तौर पर श्रद्धा व्यक्त करना नहीं, बल्कि उन उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण और व्यावहारिक जीवन में अपनाना है। हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने के साथ-साथ समाज के सुधार और ज़रूरतमंदों की मदद को भी महत्व देना चाहिए।

चैन्नई के इमाम जुमा ने कहा कि जब लोग अपनी निजी ख़ुशहाली और हितों तक सीमित होकर क़ौम और समाज की समस्याओं से मुँह मोड़ लेते हैं, तो सामूहिक विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है। राष्ट्रीय जागरूकता का तकाज़ा है कि हर व्यक्ति अपनी क्षमताओं और संसाधनों के अनुसार समाज की बेहतरी में योगदान दे, दूसरों की परेशानियों को समझे और ज़रूरत के समय उनकी मदद के लिए आगे आए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति केवल अपनी भलाई के बारे में सोचता है और अपनी क़ौम की परेशानियों, ज़रूरतमंदों की कठिनाइयों तथा सामूहिक समस्याओं को भुला देता है, वह अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) की सीरत के व्यावहारिक संदेश के अनुरूप नहीं हो सकता।

मौलाना मोहम्मद मेराज रन्नवी ने इस सच्चाई को इन शब्दों में बयान किया, “यह असंभव है कि कोई अली (अ) का मानने वाला हो और उसे दूसरों की फ़िक्र न हो।”

उन्होंने कहा कि हज़रत अली (अ) से सच्ची निस्बत का तकाज़ा है कि इंसान के भीतर दूसरों के लिए सच्ची हमदर्दी, भलाई की भावना, त्याग और ज़िम्मेदारी का एहसास मौजूद हो। सामाजिक सेवा और ज़रूरतमंदों की देखभाल के विषय में हज़रत अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) से मंसूब इस फ़रमान को भी विशेष महत्व प्राप्त है।

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