हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, करीमपुर, कर्नाटक की मस्जिद-ए-अस्करी में जुमे के ख़ुत्बे के दौरान मौलाना सय्यद वसी हैदर रिज़वी ने कुरआन और हदीस की रोशनी में पवित्रता, तौबा-व-इस्तिग़फ़ार, आत्मसुधार, उम्मत की एकता और मज़लूमों की सहायता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सच्ची धार्मिक चेतना का तक़ाज़ा है कि इंसान अपने बाहरी और आंतरिक व्यक्तित्व को पाकीज़ा बनाए, अपने चरित्र में सुधार करे, धर्म की पवित्र हस्तियों का सम्मान करे तथा ज़ुल्म और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाते हुए मज़लूमों के अधिकारों का समर्थन करे।
आत्मशुद्धि और तौबा इंसान के आध्यात्मिक विकास का ज़रिया
मौलाना सय्यद वसी हैदर रिज़वी ने पहले ख़ुत्बे में शरीर, कपड़ों, माल, विचारों और दिल की पवित्रता के महत्व को बयान करते हुए सूरा-ए-बक़रा की आयत 222 की तिलावत की:
إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ التَّوَّابِينَ وَيُحِبُّ الْمُتَطَهِّرِينَ बेशक अल्लाह तौबा करने वालों और पाकीज़गी अपनाने वालों से प्रेम करता है।
उन्होंने कहा कि इस्लाम में पवित्रता का अर्थ केवल शरीर और कपड़ों की सफ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि माल, विचारों, मन और दिल की पवित्रता भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। इंसान की आध्यात्मिक तरक़्क़ी और नैतिक बुलंदी के लिए ज़रूरी है कि वह अपने बाहरी रूप के साथ-साथ अपने आंतरिक व्यक्तित्व के सुधार पर भी ध्यान दे।
इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ) से वर्णित एक रिवायत का हवाला देते हुए मौलाना ने कहा कि गुनाह इंसान के दिल पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, जबकि तौबा उसके आंतरिक व्यक्तित्व को पाकीज़ा बनाने और आध्यात्मिक जीवन को फिर से सँवारने का ज़रिया है।
रिवायत में आया है:
مَا مِنْ قَلْبٍ إِلَّا وَفِيهِ نُكْتَةٌ بَيْضَاءُ، فَإِذَا أَذْنَبَ خَرَجَ فِي النُّكْتَةِ نُكْتَةٌ سَوْدَاءُ، فَإِنْ تَابَ ذَهَبَ ذَلِكَ السَّوَادُ हर दिल में एक सफ़ेद बिंदु होता है। जब इंसान गुनाह करता है, तो उसमें एक काला बिंदु पैदा हो जाता है, लेकिन तौबा करने से वह कालापन दूर हो जाता है।
मौलाना सय्यद वसी हैदर रिज़वी ने इस रिवायत की व्याख्या करते हुए कहा कि सच्ची तौबा इंसान को अपनी ग़लतियों का एहसास दिलाती है और उसे आत्मसुधार, पाकीज़ा चरित्र तथा नेक अमल की ओर लौटाती है। इसलिए ज़रूरी है कि इंसान गुनाहों से बचे और अपने जीवन को नैतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से बेहतर बनाने की लगातार कोशिश करता रहे।
कुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम (स) का सम्मान तथा मज़लूमों का समर्थन
दूसरे ख़ुत्बे में मौलाना सैयद वसी हैदर रिज़वी ने कुरआन मजीद की बेअदबी, पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) की शान में गुस्ताख़ी और फ़िलिस्तीन के मज़लूम लोगों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म की पवित्र हस्तियों का सम्मान करना और मज़लूमों के अधिकारों की रक्षा करना धार्मिक एवं मानवीय ज़िम्मेदारी है।
उन्होंने ईरान के पूर्व राष्ट्रपति सैयद इब्राहीम रईसी द्वारा संयुक्त राष्ट्र में कुरआन मजीद के सम्मान का मुद्दा उठाए जाने का उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने ईरान, लेबनान और यमन से फ़िलिस्तीनी जनता के समर्थन में उठने वाली आवाज़ों का भी ज़िक्र किया।
मौलाना ने कहा कि ज़ुल्म के विरुद्ध आवाज़ उठाना और मज़लूमों के अधिकारों का समर्थन करना एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं मानवीय कर्तव्य है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि मतभेदों के बावजूद सत्य और न्याय का साथ देना आवश्यक है। इंसान को अपने धार्मिक एवं नैतिक सिद्धांतों के आधार पर मज़लूमों का समर्थन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षाएँ इंसान को न्याय, इंसाफ़ और मानवीय गरिमा का पाठ पढ़ाती हैं। इसलिए किसी भी समाज में ज़ुल्म और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना तथा मज़लूमों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयास करना इन शिक्षाओं की बुनियादी माँगों में शामिल है।
हदीस-ए-इफ़्तिराक और धार्मिक रिवायतों के अध्ययन में शोध का महत्व
मौलाना सैयद वसी हैदर रिज़वी ने ख़ुत्बे के दौरान हदीस-ए-इफ़्तिराक का उल्लेख करते हुए मुस्लिम उम्मत में मतभेद और फ़िरक़ाबंदी के विषय पर चर्चा की। उन्होंने शिया स्रोतों में वर्णित उस रिवायत का हवाला दिया, जिसमें हज़रत मूसा (अ) और हज़रत ईसा (अ) की उम्मतों में फ़िरक़ों की संख्या बयान करने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स) की उम्मत में भी फ़िरक़ाबंदी का उल्लेख किया गया है।
रिवायत के शब्द इस प्रकार हैं:
افْتَرَقَتْ أُمَّةُ مُوسَى عَلَيْهِ السَّلَامُ عَلَى إِحْدَى وَسَبْعِينَ فِرْقَةً، وَافْتَرَقَتْ أُمَّةُ عِيسَى عَلَيْهِ السَّلَامُ عَلَى اثْنَتَيْنِ وَسَبْعِينَ فِرْقَةً، وَسَتَفْتَرِقُ أُمَّتِي عَلَى ثَلَاثٍ وَسَبْعِينَ فِرْقَةً، كُلُّهَا فِي النَّارِ إِلَّا وَاحِدَةً हज़रत मूसा (अ) की उम्मत इकहत्तर फ़िरक़ों में विभाजित हुई, हज़रत ईसा (अ) की उम्मत बहत्तर फ़िरक़ों में विभाजित हुई और मेरी उम्मत तिहत्तर फ़िरक़ों में विभाजित होगी। उनमें से एक के अतिरिक्त बाकी सभी जहन्नम में होंगे।
इस रिवायत का संदर्भ पत्रिका ‘तुरासुना’ में प्रकाशित ‘मसादिरुल अक़ाइद इंदश्शीआ’ नामक पुस्तक के पृष्ठ 296 में दिया गया है। उपलब्ध पाठ के अनुसार, इस रिवायत के विभिन्न शब्दों और सनदों से भी इसे बयान किया गया है।
मौलाना सैयद वसी हैदर रिज़वी ने युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए कहा कि धार्मिक रिवायतों का अध्ययन शोध और गहन विचार के साथ किया जाना चाहिए। अक़ीदों को समझने, रिवायतों के अर्थों की समीक्षा करने और धार्मिक मामलों में वैज्ञानिक एवं बौद्धिक समझ विकसित करने की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि मतभेद होने के बावजूद नैतिकता, शिष्टाचार और आपसी सम्मान को बनाए रखना चाहिए।
आत्मसुधार, उम्मत की एकता और न्याय का साथ देने पर ज़ोर
मौलाना सय्यद वसी हैदर रिज़वी ने अपने संबोधन में कहा कि सच्ची धार्मिक चेतना केवल धार्मिक शिक्षाओं की जानकारी रखने का नाम नहीं है, बल्कि उन शिक्षाओं को व्यावहारिक जीवन में अपनाने से प्राप्त होती है। इंसान को अपने चरित्र में सुधार, पवित्रता, तौबा-व-इस्तिग़फ़ार और नैतिक ज़िम्मेदारियों के निर्वहन पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज में एकता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है कि लोग मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें, धार्मिक विषयों को गंभीरता और शोध के साथ समझें तथा सत्य और न्याय की स्थापना के लिए अपनी भूमिका निभाएँ।
जुमे के ख़ुत्बे के अंत में मौलाना ने दुआ की कि अल्लाह तआला मोहम्मद और आले-मोहम्मद (अ) के वसीले से सभी बीमारों को शिफ़ा अता फ़रमाए और तमाम मोमिनीन व मोमिनात को अपनी रहमत और मग़फ़िरत से लाभान्वित फ़रमाए।
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