हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक के करीमपुर स्थित मस्जिद-ए-असकरी में इमामे जुमा व जमाअत हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सय्यद वसी हैदर रिज़वी आज़मी ने जुमे के ख़ुतबे में हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा की विलादत, अय्याम-ए-फ़ातिमिया तथा फ़िलिस्तीन और ईरान के हालात पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने मोमिनों को अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की सीरत से सीख लेने और दुनिया में अमन व सलामती की स्थापना के लिए दुआ करने की नसीहत की।
पहले ख़ुतबे में मौलाना सय्यद वसी हैदर रिज़वी आज़मी ने सूरह आले इमरान की आयत 178 की तिलावत और व्याख्या करते हुए अल्लाह की ओर से काफ़िरों को दी जाने वाली मोहलत का उल्लेख किया। इस अवसर पर उन्होंने वाक़िया-ए-कर्बला के बाद दरबार-ए-यज़ीद में हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के ऐतिहासिक ख़ुतबे और उनके साहसपूर्ण रुख़ का वर्णन किया। उन्होंने हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की विलादत के अवसर पर सभी मोमिनों को मुबारकबाद दी और जुमा की भी बधाई दी।
उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम से मंसूब इस रिवायत «أُوصِيكُمْ بِهَا، فَإِنَّهَا شَبِيهَةٌ بِخَدِيجَةَ الْكُبْرَى» का हवाला देते हुए हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की महानता और फ़ज़ीलत बयान की। मौलाना ने कहा कि आप अहलेबैत के परिवार की महान हस्ती और शुजाअत, सब्र, इबादत तथा इस्तिक़ामत की एक रौशन मिसाल हैं।
इस अवसर पर उन्होंने हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा की शान में ये अशआर भी पेश किए:
अली अलैहिस्सलाम की बेटी को झुककर सलाम कर, ऐ इस्लाम!
वह दो इमामों को उनके घर तक सुरक्षित बचाकर लाई हैं।
ख़ुतबे के दौरान अय्याम-ए-फ़ातिमिया के अवसर पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम की मशहूर हदीस «فَاطِمَةُ بَضْعَةٌ مِنِّي، مَنْ أَغْضَبَهَا أَغْضَبَنِي» भी बयान की गई। इसका अर्थ है कि हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं; जिसने उन्हें नाराज़ किया, उसने मुझे नाराज़ किया। मौलाना ने इस हदीस की रोशनी में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की महानता और प्रतिष्ठा तथा अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम से प्रेम और जुड़ाव के महत्व को उजागर किया।
दूसरे ख़ुतबे में मौलाना सैयद वसी हैदर रिज़वी आज़मी ने फ़िलिस्तीन और ईरान के हालात, विशेष रूप से तूफ़ान अल-अक़्सा के बाद सामने आने वाली घटनाओं और क्षेत्र में हुई शहादतों का उल्लेख किया। उन्होंने इस्माइल हनिया, सैयद हसन नसरुल्लाह और आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई की शहादतों का हवाला देते हुए वैश्विक परिस्थितियों के संदर्भ में सवाल उठाया कि युद्ध में जीत और हार का वास्तविक पैमाना क्या है?
उन्होंने कहा कि युद्ध का आकलन केवल सैन्य परिणामों और युद्ध के मैदान में मिलने वाली सफलताओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि विचारधारा, मानवीय विवेक और विश्व जनमत पर पड़ने वाले उसके प्रभावों को भी महत्व दिया जाना चाहिए। उनके अनुसार, अतीत में इसराइल के प्रति दिखाई देने वाली कुछ सहानुभूति के विपरीत, ग़ज़ा में जारी मानवीय त्रासदी के बाद दुनिया के विभिन्न देशों में फ़िलिस्तीनी जनता के समर्थन और इसराइली कार्रवाइयों के विरोध में प्रदर्शन देखने को मिले हैं।
मौलाना ने कहा कि विश्व जनमत में आया यह बदलाव फ़िलिस्तीनी जनता की مظलूमियत को दुनिया के सामने उजागर करने के लिहाज़ से महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस बात पर अफ़सोस जताया कि इस स्थिति की भारी क़ीमत फ़िलिस्तीनी जनता को अपनी जानों की क़ुर्बानी देकर चुकानी पड़ी है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मज़लूमों के अधिकारों, मानवीय जीवन की रक्षा और इंसाफ़ की स्थापना को हर हाल में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
ख़ुतबे के अंत में मौलाना सैयद वसी हैदर रिज़वी आज़मी ने पूरी दुनिया, विशेष रूप से भारत में अमन-ओ-अमान, एकता, आपसी सद्भाव और परस्पर सम्मान को बढ़ावा देने के लिए बारगाह-ए-इलाही में दुआ की।
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