शुक्रवार 9 अक्टूबर 2026 - 22:47
इमाम ज़माना (अ) की वास्तविक पहचान का तक़ाज़ा है कि उनकी शिक्षाओं का हमारी ज़िंदगी में व्यावहारिक प्रभाव दिखाई दे: मौलाना शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी

करगिल के केंद्रीय इमामे जुमा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी ने जुमे के ख़ुत्बे में इमाम ज़माना (अ) की पहचान और उनके ज़ुहूर के वास्तविक इंतज़ार के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहा कि केवल ज़बान से इमाम ज़माना (अ) को मान लेना या दुआए फ़रज पढ़ना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक इंतज़ार का तक़ाज़ा यह है कि इंसान अपनी ज़िंदगी को इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप बनाए, अल्लाह और उसके बंदों के अधिकारों को अदा करे, ज़ुल्म व अन्याय से बचे और अपने आचरण में सुधार लाकर समाज में न्याय एवं इंसाफ़ को बढ़ावा देने के लिए व्यावहारिक प्रयास करे। उन्होंने ग़ैबते कुबरा को ईमान, चरित्र और दृढ़ता की परीक्षा बताते हुए पारिवारिक स्थिरता, वैवाहिक जीवन में आपसी समझ और बच्चों की धार्मिक एवं नैतिक परवरिश को भी मोमिनों की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों में शामिल किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 9 अक्टूबर को लद्दाख के करगिल स्थित हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी, केंद्रीय इमामे जुमा करगिल, ने जुमे के ख़ुत्बे में इमाम ज़माना (अ) की पहचान, ग़ैबते कुबरा के दौरान मोमिनों की ज़िम्मेदारियों, ज़ुहूर के वास्तविक इंतज़ार और पारिवारिक जीवन में सुधार के विषयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इमाम ज़माना (अ) से वास्तविक संबंध का तक़ाज़ा है कि इंसान अपनी ज़िंदगी को इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार ढाले, अल्लाह और बंदों के अधिकारों की अदायगी का ध्यान रखे तथा समाज में न्याय, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका निभाए।

इमाम ज़माना (अ) की वास्तविक पहचान का तक़ाज़ा है कि उनकी शिक्षाओं का हमारी ज़िंदगी में व्यावहारिक प्रभाव दिखाई दे: मौलाना शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी

करगिल स्थित हवज़ा इल्मिया असना अशरिया के परिसर में जमीयतुल उलमा असना अशरिया करगिल, लद्दाख के तत्वावधान में आयोजित नमाज़े जुमा के पहले ख़ुत्बे में उन्होंने इमाम ज़माना (अ) की पहचान को दुनिया और आख़िरत की सफलता का महत्वपूर्ण साधन बताया। उन्होंने कहा कि इमाम की पहचान केवल ज़बानी श्रद्धा या दुआए फ़रज पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक तक़ाज़ा यह है कि इंसान अपने चरित्र, कर्मों और रोज़मर्रा के मामलों में धार्मिक शिक्षाओं का पालन करे।

उन्होंने ग़ैबते कुबरा को ईमान, धैर्य, चरित्र और वफ़ादारी की परीक्षा बताते हुए कहा कि इस दौर में मोमिनों की ज़िम्मेदारी है कि वे क़ुरआन मजीद, अहलेबैत (अ) की शिक्षाओं, विश्वसनीय धार्मिक मार्गदर्शन और सच्चे उलमा की हिदायतों से लाभ उठाकर अपनी ज़िंदगी को सही रास्ते पर बनाए रखें। इमाम ज़माना (अ) की ग़ैबत को धार्मिक ज़िम्मेदारियों से ग़फ़लत का बहाना नहीं बनाया जा सकता। इसके बजाय इस दौर में अपने कर्मों को सुधारने और समाज की बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास करना आवश्यक है।

इमाम ज़माना (अ) की वास्तविक पहचान का तक़ाज़ा है कि उनकी शिक्षाओं का हमारी ज़िंदगी में व्यावहारिक प्रभाव दिखाई दे: मौलाना शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी

वास्तविक इंतज़ार न्याय की स्थापना के लिए व्यावहारिक प्रयास का नाम है

मौलाना शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी ने इमाम ज़माना (अ) के ज़ुहूर को न्याय एवं इंसाफ़ की स्थापना और ज़ुल्म व अन्याय के अंत की उम्मीद बताते हुए कहा कि इंतज़ार का عق़ीदा मोमिनों को निराशा से बचाता है और उन्हें सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहने का साहस देता है। हालांकि, वास्तविक इंतज़ार का अर्थ हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में न्याय, सच्चाई, ईमानदारी तथा मज़लूमों के समर्थन को बढ़ावा देना है।

उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन (अ) की कर्बला की तहरीक भी दीन की रक्षा, सत्य के समर्थन और ज़ुल्म के सामने डटे रहने का संदेश देती है। इसलिए अहलेबैत (अ) से वास्तविक प्रेम तभी सार्थक हो सकता है, जब उनकी शिक्षाओं को व्यक्तिगत चरित्र, सामाजिक संबंधों और सामूहिक जीवन में व्यावहारिक रूप से अपनाया जाए।

करगिल के केंद्रीय इमामे जुमा ने बंदों के अधिकारों की अदायगी पर ज़ोर देते हुए कहा कि किसी का माल नाहक़ लेना, क़र्ज़ अदा न करना, ज़मीन पर अवैध क़ब्ज़ा करना, किसी की इज़्ज़त व प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाना और दूसरों के अधिकारों का हनन करना धार्मिक शिक्षाओं के विरुद्ध है। केवल बाहरी इबादतों पर संतोष करने के बजाय इंसान को अपने लेन-देन, कमाई और व्यवहार की समीक्षा करनी चाहिए। यदि किसी का हक़ मारा गया हो, तो उसकी भरपाई और अधिकार लौटाने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इमाम ज़माना (अ) के ज़ुहूर से संबंधित عق़ائد और धार्मिक विषयों को बयान करते समय विश्वसनीय प्रमाणों, शोध और सावधानी से काम लेना चाहिए। धार्मिक عق़ائد से जुड़े सवालों का जवाब भावनात्मक प्रतिक्रिया या अपमानजनक व्यवहार के बजाय ज्ञान, विवेक, तर्क और अच्छे आचरण के साथ दिया जाना चाहिए।

वैवाहिक जीवन में आपसी समझ, तालमेल और सम्मान आवश्यक

जुमे के ख़ुत्बे के दूसरे हिस्से में शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी ने निकाह, वैवाहिक जीवन, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश पर चर्चा करते हुए कहा कि इस्लाम ने निकाह को प्रेम, स्नेह, दया और सुकून का माध्यम बताया है। निकाह केवल एक सामाजिक रस्म या दो व्यक्तियों के साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, वफ़ादारी, सहयोग और ज़िम्मेदारी पर आधारित एक पवित्र रिश्ता है।

उन्होंने कहा कि सफल वैवाहिक जीवन के लिए पति-पत्नी के बीच आपसी समझ और तालमेल बुनियादी महत्व रखते हैं। एक-दूसरे की भावनाओं को समझना, मतभेदों को धैर्यपूर्वक सुनना, आपसी सलाह से समस्याओं को हल करना और एक-दूसरे के आत्मसम्मान का ध्यान रखना घर को शांतिपूर्ण और स्थिर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उनके अनुसार, वैवाहिक विवादों के कारणों में ग़लतफ़हमियाँ, अनावश्यक अपेक्षाएँ, आर्थिक दबाव, दूसरों का हस्तक्षेप, असहिष्णुता और बातचीत की कमी शामिल हो सकती है। इन समस्याओं पर क़ाबू पाने के लिए ज़रूरी है कि पति-पत्नी ग़ुस्से के समय अनुचित शब्दों से बचें, मतभेदों को दुश्मनी में न बदलने दें और एक-दूसरे के जायज़ अधिकारों का सम्मान करें।

उन्होंने शादी से पहले उचित जानकारी हासिल करने तथा दीनदारी, नैतिकता, चरित्र, ज़िम्मेदारी की भावना और आपसी अनुकूलता को महत्व देने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि निकाह का निर्णय गंभीरता और समझदारी से लिया जाना चाहिए। माता-पिता और अभिभावकों को भी विवाह के मामलों में लड़के और लड़की की राय, सहमति तथा भविष्य को महत्व देना चाहिए और ज़बरदस्ती, अनावश्यक दबाव तथा अवास्तविक अपेक्षाओं से बचना चाहिए।

इमाम ज़माना (अ) की वास्तविक पहचान का तक़ाज़ा है कि उनकी शिक्षाओं का हमारी ज़िंदगी में व्यावहारिक प्रभाव दिखाई दे: मौलाना शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी

बच्चों की धार्मिक और नैतिक परवरिश माता-पिता की अहम ज़िम्मेदारी

मौलाना शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी ने पारिवारिक स्थिरता में माता-पिता, बुज़ुर्गों और बच्चों के अधिकारों के महत्व को बयान करते हुए कहा कि एक नेक परिवार की नींव प्रेम, न्याय, सम्मान और अच्छे आचरण पर आधारित होती है। घर के बुज़ुर्गों के अनुभवों से लाभ उठाना, माता-पिता का सम्मान करना और बच्चों की उचित परवरिश करना एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि बच्चों की परवरिश केवल नसीहतों से नहीं होती, बल्कि माता-पिता के व्यावहारिक आचरण का भी उनकी शख़्सियत पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि घर में सच्चाई, नमाज़, ईमानदारी, धैर्य, सम्मान और प्रेम का माहौल हो, तो बच्चों का नैतिक एवं धार्मिक विकास बेहतर ढंग से हो सकता है। इसके विपरीत, लगातार झगड़े, अभद्र भाषा, झूठ और अन्याय बच्चों की परवरिश पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं।

उन्होंने माता-पिता पर ज़ोर दिया कि वे बच्चों को समय दें, उनकी बातें सुनें, उनके सवालों के उचित जवाब दें और उन्हें धार्मिक शिक्षाओं, मानवीय हमदर्दी, अच्छे अख़लाक़ तथा सामाजिक ज़िम्मेदारियों से परिचित कराएँ। इसी तरह परिवार के सभी सदस्यों के साथ न्याय, नरमी और सम्मान का व्यवहार करना भी आवश्यक है।

शादी-ब्याह में सादगी और अनावश्यक ख़र्चों से बचने की ज़रूरत

करगिल के केंद्रीय इमामे जुमा ने शादी-ब्याह में अनावश्यक रस्मों, दिखावे, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और फ़िज़ूलख़र्ची पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे रवैये कुछ परिवारों के लिए आर्थिक कठिनाइयाँ पैदा करते हैं और युवाओं की शादी में देरी का कारण बनते हैं। उन्होंने ज़ोर दिया कि निकाह को आसान बनाया जाए, अनावश्यक माँगों से बचा जाए और युवाओं को सम्मानजनक एवं ज़िम्मेदाराना ढंग से नई ज़िंदगी शुरू करने के अवसर दिए जाएँ।

उन्होंने स्पष्ट किया कि शादी का वास्तविक उद्देश्य एक पाकीज़ा, स्थिर और अच्छे अख़लाक़ वाले परिवार का निर्माण करना है, न कि दौलत और सामाजिक हैसियत का प्रदर्शन। सादगी, संतुलन और आपसी सहयोग से शादी के ख़र्चों को कम किया जा सकता है तथा परिवारों को अनावश्यक आर्थिक दबाव से बचाया जा सकता है।

इमाम ज़माना (अ) की वास्तविक पहचान का तक़ाज़ा है कि उनकी शिक्षाओं का हमारी ज़िंदगी में व्यावहारिक प्रभाव दिखाई दे: मौलाना शेख़ ग़ुलाम अली मुफ़ीदी

ख़िताब के अंत में उन्होंने मोमिनों से अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक और पारिवारिक ज़िंदगी की समीक्षा करने की अपील करते हुए कहा कि इमाम ज़माना (अ) के वास्तविक मुंतज़िर बनने के लिए घरों में प्रेम और सम्मान, लेन-देन में ईमानदारी, समाज में इंसाफ़ और बच्चों की परवरिश में धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों को बुनियादी महत्व देना आवश्यक है।

उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला मोमिनों को इमाम ज़माना (अ) की सही पहचान, अहलेबैत (अ) की मोहब्बत, तक़वा, ख़ुलूस और सत्य के मार्ग पर दृढ़ता प्रदान करे। परिवारों को प्रेम और सुकून का केंद्र बनाए, पति-पत्नी के बीच स्नेह और मोहब्बत क़ायम रखे, नौजवानों के लिए निकाह के रास्ते आसान करे और इमाम ज़माना (अज्जलल्लाहु तआला फ़रजहुश शरीफ़) के ज़ुहूर में जल्द से जल्द फ़रज अता फ़रमाए।

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