शुक्रवार 16 अक्टूबर 2026 - 05:48
वो ज़ैनब (स.अ.), जिनके सब्र के सामने ज़ुल्म के महलों को घुटने टेकने पड़े!

कुछ हस्तियाँ तारीख़ में सिर्फ़ जन्म नहीं लेतीं, बल्कि तारीख़ का रुख़ बदल देती हैं। कुछ हस्तियों का दुनिया में आना सिर्फ़ एक घर को रोशन नहीं करतीं, बल्कि पूरी इंसानियत को हिम्मत, सब्र और हक़ का रास्ता दिखाती हैं। और कुछ अज़ीम हस्तियाँ ऐसी होती हैं, जिनके किरदार के सामने ज़ुल्म का ग़ुरूर मिट्टी में मिल जाता है।

लेखकः सय्यद साजिद मुहम्मद रिज़वी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी! कुछ हस्तियाँ तारीख़ में सिर्फ़ जन्म नहीं लेतीं, बल्कि तारीख़ का रुख़ बदल देती हैं। कुछ हस्तियों का दुनिया में आना सिर्फ़ एक घर को रोशन नहीं करतीं, बल्कि पूरी इंसानियत को हिम्मत, सब्र और हक़ का रास्ता दिखाती हैं। और कुछ अज़ीम हस्तियाँ ऐसी होती हैं, जिनके किरदार के सामने ज़ुल्म का ग़ुरूर मिट्टी में मिल जाता है।
ऐसी ही अज़ीम हस्ती हैं—  हज़रत इमाम अली (अ.स.) की बेटी, सैय्यदा फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की लाडली और रसूल-ए-अकरम (स.अ.व.) की नवासी, हज़रत ज़ैनब-ए-कुबरा (स.अ.)।
हज़रत ज़ैनब (स.अ.) की विलादत सिर्फ़ एक शहज़ादी की आमद नहीं थी, बल्कि सब्र की अज़मत, शुजाअत की बुलंदी, वफ़ा की मिसाल और हक़ की हिफ़ाज़त के एक अज़ीम बाब का आग़ाज़ था।
वो घर जहाँ रसूल-ए-ख़ुदा (स.अ.व.) की मोहब्बत की ख़ुशबू थी, जहाँ हज़रत अली (अ.स.) की शुजाअत का परचम लहराता था और जहाँ हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की पाकीज़गी का नूर बिखरता था, उसी घर में हज़रत ज़ैनब (स.अ.) ने आँखें खोलीं।
वो ज़ैनब (स.अ.) जिनकी परवरिश जनाब-ए-फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) की आग़ोश में हुई, जिनके किरदार में हैदर-ए-कर्रार (अ.स.) की शुजाअत नज़र आई और जिनकी ज़िंदगी ने दुनिया को बताया कि औरत का सब्र उसकी कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसकी अज़ीम ताक़त भी हो सकता है।
ज़ैनब (स.अ.) वो नाम है जिसे मुसीबतें तो आज़मा सकीं, मगर तोड़ न सकीं; जिसे ज़माने ने रुलाया, मगर हक़ से हटा न सका; और जिसे ज़ुल्म ने घेरने की कोशिश की, मगर उसकी आवाज़ को दबा न सका।
कर्बला की सरज़मीन पर जब इमाम हुसैन (अ.स.) ने हक़ की राह में अपनी अज़ीम क़ुर्बानी पेश की, जब अहले-बैत (अ.स.) पर मुसीबतों के पहाड़ टूटे और ख़ैमों की वीरानी ने हर दिल को ग़मगीन कर दिया, तब हज़रत ज़ैनब (स.अ.) ने अपने सब्र और इस्तिक़ामत से दुनिया को एक ऐसा सबक़ दिया जो क़यामत तक याद रखा जाएगा।
उन्होंने साबित किया कि हक़ की राह में बहादुरी सिर्फ़ तलवार उठाने का नाम नहीं, बल्कि मुसीबतों के तूफ़ान में भी अपने ईमान, अपने उसूल और अपनी आवाज़ को ज़िंदा रखने का नाम है।
कूफ़ा के दरबार में जब तकब्बुर ने सिर उठाया, तो ज़ैनब (स.अ.) की आवाज़ ने उसे आईना दिखाया। शाम के दरबार में जब यज़ीद अपनी हुकूमत के नशे में चूर था, तब ज़ैनब (स.अ.) के ख़ुत्बे ने उसके घमंड को चुनौती दी और दुनिया को बता दिया कि हुकूमत की ताक़त हमेशा हक़ की ताक़त से बड़ी नहीं होती।
यज़ीद के पास हुकूमत थी, मगर ज़ैनब (स.अ.) के पास हक़ था।
यज़ीद के पास दरबार था, मगर ज़ैनब (स.अ.) के पास किरदार था।
यज़ीद के पास सत्ता थी, मगर ज़ैनब (स.अ.) के पास वो सब्र और इस्तिक़ामत थी जिसके सामने ज़ुल्म का ग़ुरूर हमेशा के लिए बेनक़ाब हो गया।
जिस ज़ुल्म को अपनी जीत पर नाज़ था, हज़रत ज़ैनब (स.अ.) ने उसी ज़ुल्म को तारीख़ के सामने शर्मिंदा कर दिया।
ज़ैनब (स.अ.) ने दुनिया को बताया कि मज़लूम होना शिकस्त नहीं, अगर इंसान हक़ पर क़ायम रहे; असीर होना बेबसी नहीं, अगर ज़ुबान पर सच्चाई बाक़ी रहे; और मुसीबतों में घिर जाना हार नहीं, अगर इंसान का किरदार बुलंद रहे।
आज भी जब कोई मज़लूम अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाता है, जब कोई इंसान मुश्किलों के बावजूद सच का साथ नहीं छोड़ता और जब कोई ज़ालिम की ताक़त के सामने झुकने से इनकार करता है, तो हज़रत ज़ैनब (स.अ.) का किरदार उसके लिए हिम्मत और इस्तिक़ामत की मिसाल बन जाता है।
हज़रत ज़ैनब (स.अ.) की विलादत हमें याद दिलाती है कि इंसान की असली अज़मत उसके तख़्त और ताज में नहीं, बल्कि उसके ईमान, सब्र, शुजाअत और किरदार में होती है।
सलाम उस बेटी पर जिसने कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा रखा!
सलाम उस बहन पर जिसने अपने भाई इमाम हुसैन (अ.स.) की क़ुर्बानी के मक़सद को दुनिया तक पहुँचाया!
सलाम उस ख़ातून पर जिसने असीरी के सफ़र को भी हक़ की गवाही बना दिया!
सलाम उस ज़ैनब (स.अ.) पर जिनकी इस्तिक़ामत ने ज़ुल्म के महलों को हिला दिया और जिनकी आवाज़ सदियों बाद भी हक़ की बुलंदी की गवाही देती है!

विलादत-ए-बासआदत हज़रत ज़ैनब-ए-कुबरा (स.अ.) तमाम मोहिब्बान-ए-अहले-बैत (अ.स.) को दिली मुबारकबाद!

ज़ैनब (स.अ.) सिर्फ़ एक नाम नहीं, हिम्मत की पहचान हैं। ज़ैनब (स.अ.) सिर्फ़ एक किरदार नहीं, सब्र की तफ़सीर हैं। ज़ैनब (स.अ.) सिर्फ़ तारीख़ का एक बाब नहीं, बल्कि हर दौर के मज़लूमों के लिए हक़ की बुलंद आवाज़ हैं।
ज़ुल्म चाहे कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, हज़रत ज़ैनब (स.अ.) की सीरत हमें यही पैग़ाम देती है कि हक़, सब्र और इस्तिक़ामत की आवाज़ को हमेशा के लिए ख़ामोश नहीं किया जा सकता। 

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