बुधवार 28 अक्टूबर 2026 - 22:55
नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर गंभीर चर्चा

नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर आयोजित एक विद्वतापूर्ण परिचर्चा में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद सादिक हुसैनी ने शिया इमामिया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए सूफीवाद को समानांतर धर्म मानने के सवाल को निराधार बताया। परिचर्चा में विद्वानों ने सूफीवाद की धार्मिक स्थिति, इस्लामी शिक्षाओं से उसके संबंध और वर्तमान युग में उसकी उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान पद्मश्री अख्तरुल वासे ने कहा कि केवल नीले और पीले कपड़े पहन लेने से कोई सूफी नहीं बन जाता। शेख जुनैद बगदादी ने एक महत्वपूर्ण बात कही है कि जिस व्यक्ति में त्याग, आज्ञाकारिता, सूफ (सादगी), धैर्य, संतोष, सादगीपूर्ण जीवन और फकीरी जैसी विशेषताएँ एकत्र हो जाएँ, वही वास्तविक सूफी है। उन्होंने नई दिल्ली में सूफीवाद पर आयोजित एक विद्वतापूर्ण परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए ये विचार व्यक्त किए।

नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर गंभीर चर्चा

मानसिक अस्थिरता और वैचारिक टकराव के इस दौर में संवाद को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय नई पत्रिका ‘इमकानात’ ने अपने दूसरे अंक के मुख्य विषय पर रविवार को ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत के केंद्रीय कार्यालय में एक विद्वतापूर्ण परिचर्चा आयोजित की। विषय की महत्ता और प्रासंगिकता के कारण इसमें बड़ी संख्या में विद्वानों ने भाग लिया। परिचर्चा में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ इस सवाल के संदर्भ में सूफीवाद की धार्मिक स्थिति, उसके वैचारिक एवं व्यावहारिक पहलुओं और इस्लाम के मूल स्रोतों से उसके संबंध पर विस्तार से चर्चा हुई।

मौलवी ज़िया उर रहमान अलीमी ने विषय पर अपने विस्तृत अध्ययन का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि सूफीवाद के मूल तत्व, जैसे आस्था, नेक अमल और अच्छे नैतिक गुण, यदि प्रमाणिक रूप से कुरआन, सुन्नत और सर्वमान्य इस्लामी सिद्धांतों से लिए गए हों, तो उन्हें धर्म के समानांतर मानना उचित नहीं है। ये तत्व इस्लामी शरीअत के दायरे में ही अपनी शैक्षणिक और व्यावहारिक महत्ता रखते हैं।

नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर गंभीर चर्चा

उन्होंने कहा कि सूफियों के आध्यात्मिक साधना और आत्मिक प्रशिक्षण से संबंधित प्रयास शरीअत के मुकाबले कोई स्वतंत्र धार्मिक विधान नहीं हैं, बल्कि आत्मशुद्धि, एहसान, आध्यात्मिक साधना और आंतरिक सुधार से जुड़े विषयों में शरीअत के सिद्धांतों को लागू करने तथा उन्हें समझने के विभिन्न तरीके हैं। इसलिए इन प्रयासों में सही और गलत, दोनों की संभावना स्वीकार की जानी चाहिए। ठीक इसी तरह, फिक्ह के विद्वानों और धर्मशास्त्रियों की शाखागत धार्मिक समस्याओं से संबंधित राय और शोध में भी मतभेद तथा त्रुटि की संभावना रहती है।

इससे पहले परिचर्चा के संयोजक अहमद जावेद ने चर्चा की शुरुआत करते हुए सवाल उठाया कि यदि इस्लाम को ऐतिहासिक दृष्टि से कोई नया धर्म मानने के बजाय हज़रत आदम (अ) से लेकर आज तक जारी एक निरंतर ईश्वरीय धर्म के रूप में देखा जाता है और अन्य धार्मिक ज्ञान-विधाओं को भी इसी निरंतरता का हिस्सा माना जाता है, तो सूफीवाद और आत्मशुद्धि को इससे अलग क्यों समझा जाए? यदि फिक्ह, हदीस और तफसीर की तरह सूफीवाद और आत्मशुद्धि भी ज्ञान की एक शाखा हैं, तो उन्हें भी इसी धार्मिक और बौद्धिक परंपरा का हिस्सा क्यों न माना जाए?

नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर गंभीर चर्चा

उन्होंने सूफीवाद की कुछ शिक्षाओं में संसार से विरक्ति, ध्यान और एकाग्रता जैसी पद्धतियों की बौद्ध धर्म तथा योग से समानता के संबंध में भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि सूफीवाद को एक व्यवस्थित ज्ञान-विधा के रूप में समझने के बजाय उसे रहस्यों और गूढ़ बातों तक सीमित रखने से इस बौद्धिक परंपरा को नुकसान पहुँचा है। उनके अनुसार, सूफी साहित्य में कम से कम पाँच-छह ऐसे ज्ञान-विषयों की चर्चा मिलती है, जिनमें मनोविज्ञान, आध्यात्मिक साधना, मन का उपचार और रहस्यमय ज्ञान जैसे विषय शामिल हैं।

डॉ. सैयद कमरुल इस्लाम ने मौलवी ज़िया उर रहमान अलीमी के शोधपत्र पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सूफीवाद के अनुयायियों को आलोचकों की आपत्तियों को मामूली नहीं समझना चाहिए, बल्कि उन्हें गंभीरता से लेते हुए आधुनिक सोच रखने वाले लोगों के सवालों को समझने और उनके तर्कसंगत जवाब देने की आवश्यकता है। उन्होंने इस दिशा में शोधपत्र को एक अच्छा प्रयास बताया।

नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर गंभीर चर्चा

डॉ. वारिस मजाहिरी ने भी इस शोधपत्र को गंभीर संवाद और विद्वतापूर्ण शोध का अच्छा उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि सूफीवाद को समानांतर धर्म मानने से संबंधित बहस के संदर्भ में इस विषय पर चर्चा आवश्यक है। उनके अनुसार, मौलवी अमीन अहसन इस्लाही, मौलवी वहीदुद्दीन खान और जावेद अहमद गामदी जैसे लेखकों ने सूफीवाद के बारे में इस प्रकार के विचार प्रस्तुत किए हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केवल इस बहस पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय यह देखना अधिक आवश्यक है कि वर्तमान युग की समस्याओं और नई पीढ़ी की जरूरतों के संदर्भ में सूफीवाद कितना उपयोगी है।

नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर गंभीर चर्चा

प्रोफेसर कंवर मोहम्मद यूसुफ अमीन ने अपने विचार रखते हुए सूफीवाद के संबंध में आधुनिक सोच रखने वाले लोगों की आपत्तियों का विद्वतापूर्ण जवाब देने का प्रयास किया। वहीं, हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद सादिक हुसैनी ने सूफीवाद और इरफान के विषय पर शिया इमामिया दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा कि सूफीवाद को समानांतर धर्म मानने का सवाल निराधार है।

नई दिल्ली में ‘क्या सूफीवाद एक समानांतर धर्म है?’ विषय पर गंभीर चर्चा

परिचर्चा का संचालन पत्रिका ‘इमकानात’ के मुख्य संपादक मौलवी डॉ. जीशान अहमद मिस्बाही ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत मौलवी इरशाद अहमद सईदी द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुई, जबकि जनाब हसन तालिब ने पैगंबर-ए-इस्लाम (स) की प्रशंसा में नात के अशआर प्रस्तुत किए। इस अवसर पर मौलवी अब्दुल मुईद अजहरी ने विषय की भूमिका प्रस्तुत की।

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परिचर्चा का समापन पत्रिका ‘इमकानात’ के निदेशक और परिचर्चा के सह-अध्यक्ष मौलवी हसन सईद सफवी की दुआ के साथ हुआ। इस विद्वतापूर्ण बैठक में बड़ी संख्या में विद्वानों और ज्ञान-प्रेमियों ने भाग लिया। इनमें हक़ानी कासमी, डॉ. महमूद आसिम, डॉ. मोहम्मद अली, सैयद तालीफ हैदर, मौलवी मंजर मोहसिन, डॉ. मूसा रज़ा, मौलवी शौकत सईदी, मौलवी फैज़ान अज़ीज़ी, डॉ. इमरान अलीमी, मौलवी मोहम्मद अहमद सलफी, सैयद शादाब हुसैन रिज़वी, शाह इमरान हुसैन और डॉ. अनज़र अकील के नाम उल्लेखनीय हैं।

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