हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, कम उम्र की लेखिका ज़ारा का संबंध अमरोहा के ऐतिहासिक मोहल्ले दानिशमंदान के एक धार्मिक और प्रतिष्ठित परिवार से है। इसी मोहल्ले में ‘बड़ा इमामबाड़ा’ के नाम से प्रसिद्ध अजाखाना वज़ीरुन्निसा का निर्माण ज़ारा के पिता जवाद रज़ा के परदादा ने करवाया था। यह इमारत आज भी इस परिवार की धार्मिक सेवाओं की याद दिलाती है।
ज़ारा के पिता रज़ा जवाद पेशे से इंजीनियर हैं और बेंगलुरु में रिलायंस के कैंपा कोला प्लांट से जुड़े हुए हैं। पिता की नौकरी के सिलसिले में ज़ारा बेंगलुरु में रहती हैं, जहाँ वह क्राइसालिस हाई स्कूल में छठी कक्षा की छात्रा हैं। अपने वतन से दूर रहने के बावजूद उनके व्यक्तित्व में अमरोहा की शैक्षिक और साहित्यिक संस्कृति की झलक दिखाई देती है।
ज़ारा का ननिहाल लखनऊ के एक प्रतिष्ठित धार्मिक परिवार से संबंध रखता है। प्रसिद्ध धर्मगुरु आयतुल्लाह मौलाना सैयद हमीदुल हसन उनकी माता मेहर के सगे मामा हैं। इस प्रकार ज़ारा के व्यक्तित्व में अमरोहा और लखनऊ की दो महान शैक्षिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का संगम दिखाई देता है।
पुस्तक का विस्तृत परिचय
पुस्तक के शीर्षक में प्रश्नचिह्न और तीन बिंदु पाठकों के मन में तुरंत जिज्ञासा पैदा करते हैं। क्या ये वास्तव में सपने हैं या किसी वास्तविकता का छिपा हुआ रूप? यही रहस्य पुस्तक का मुख्य आकर्षण प्रतीत होता है।
पुस्तक के अध्यायों के नामों से पता चलता है कि ज़ारा ने अपनी कहानियों का आधार विभिन्न मनोवैज्ञानिक भय को बनाया है। पहले अध्याय का शीर्षक ‘Demonophobia’ है, जिसका अर्थ भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं का डर है। दूसरे अध्याय का नाम ‘Coulrophobia’ है, जिसका अर्थ जोकरों या विदूषकों से डरना है। तीसरे अध्याय का शीर्षक ‘Eipostrophobia’ है। चौथा अध्याय ‘Hemophobia’ यानी खून से डरने पर आधारित है, जबकि पाँचवाँ अध्याय ‘Claustrophobia’ अर्थात तंग और बंद जगहों से डरने के विषय पर है।
महज़ 11 वर्ष की बच्ची द्वारा मानव मनोविज्ञान के इतने जटिल विषयों को कहानियों का रूप देना असाधारण बात है। इससे पता चलता है कि ज़ारा का अध्ययन और अवलोकन उनकी उम्र से कहीं आगे है।
बच्चों की कल्पनाशक्ति स्वतंत्र और निडर होती है। वे बड़ों की तरह वास्तविकता और संभावनाओं की सीमाओं में बंधे नहीं होते। यही कारण है कि उनकी लिखी कहानियों में एक ऐसी नवीनता और ताज़गी देखने को मिलती है, जो कभी-कभी अनुभवी लेखकों की रचनाओं में भी दुर्लभ होती है।
लेखन केवल शब्दों को जोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि इसके लिए अवलोकन, साहस और निरंतर मेहनत की आवश्यकता होती है। इतनी कम उम्र की बच्ची द्वारा इन सभी गुणों को समेटकर एक पुस्तक तैयार करना निश्चित रूप से सराहनीय है।
BriBooks: बच्चों की पुस्तकों के प्रकाशन का मंच
ज़ारा की पुस्तक BriBooks ने प्रकाशित की है, जो बच्चों की रचनाओं के प्रकाशन के लिए समर्पित एक मंच है।
इस संस्था का कहना है कि उसका मानना है कि आज की दुनिया में, जहाँ तकनीक हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रही है, बच्चों को सक्रिय लेखक और उत्साही पाठक बनना चाहिए। इसकी आधुनिक तकनीक बच्चों को पूरी रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ अपनी सुंदर पुस्तकों को आसानी से प्रकाशित करने का अवसर देती है। ज़ारा की सफलता इसी सोच का एक बेहतरीन उदाहरण है।
अमरोहा का शैक्षिक और साहित्यिक महत्व
अमरोहा की धरती का ज्ञान और साहित्य से हमेशा विशेष संबंध रहा है। इस शहर ने उर्दू, फ़ारसी और धार्मिक विज्ञान के ऐसे विद्वानों को जन्म दिया है, जिनकी प्रसिद्धि देश की सीमाओं से बाहर तक पहुँची।
जॉन एलिया और रईस अमरोहवी जैसे शायर, सैयद मोहम्मद तक़ी जैसे विचारक और पत्रकार, कमाल अमरोही जैसे फ़िल्म निर्माता तथा सादिक़ैन जैसे महान चित्रकार और सुलेखक इसी धरती की उपज हैं।
काव्य गोष्ठियों, धार्मिक सभाओं और मर्सियाख़्वानी की परंपरा ने भी यहाँ की संस्कृति को समृद्ध बनाया है। मोहल्ले का नाम ‘दानिशमंदान’ स्वयं इस क्षेत्र के शैक्षिक और बौद्धिक वातावरण की गवाही देता है।
ऐसे माहौल से एक नन्ही लेखिका का उभरकर सामने आना इस बात का संकेत है कि ज्ञान और साहित्य की मशाल आज भी रोशन है और नई पीढ़ी इसे आगे बढ़ाने के लिए तैयार है।
ज़ारा की इस सफलता में परिवार के प्रोत्साहन की भी महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि बच्चों के सपने तभी आगे बढ़ते हैं, जब उन्हें सुनने, समझने और उनकी सराहना करने वाले लोग मिलते हैं।
ज़ारा की यह पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है
पुस्तक को नीचे दिए गए लिंक के माध्यम से खरीदा और पढ़ा जा सकता है:
https://www.bribooks.com/bookstore/the-nightmares-or-is-it-by-zaara-raza/
बच्चों का हौसला बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उनकी रचनाओं को पढ़ा जाए और उनके प्रयासों की सराहना की जाए।
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