हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन अल्लामा मोहम्मद इरफान भोल नजफी ने दरस ए अखलाक में ज्ञान और वक्तृत्व कला के विषय पर चर्चा करते हुए एक प्रभावशाली वक्ता की शैक्षणिक जिम्मेदारियों, बातचीत में विवेक और श्रोताओं के वैचारिक एवं नैतिक प्रशिक्षण के महत्वपूर्ण पहलुओं को बयान किया।
उन्होंने अपने व्याख्यान की शुरुआत कुरआन मजीद की इस आयत से की:
إِنَّمَا يَخْشَى اللّٰهَ مِنْ عِبَادِهِ الْعُلَمَاءُ ۗ إِنَّ اللّٰهَ عَزِيزٌ غَفُورٌ
अल्लाह के बंदों में से वास्तव में उससे वही डरते हैं जो ज्ञान रखते हैं। बेशक अल्लाह प्रभुत्वशाली और बहुत क्षमा करने वाला है। (सूरह फ़ातिर, आयत 28)
अल्लामा मोहम्मद इरफान भोल नजफी ने वक्तृत्व कला के महत्व को बताते हुए कहा कि हिकमत का अर्थ यह नहीं है कि वक्ता मिम्बर पर हर तरह की बात बयान करे, बल्कि वास्तविक हिकमत यह है कि सही, प्रमाणिक और लाभदायक बात श्रोताओं तक पहुंचाई जाए। इसी तरह एक ही मजलिस में अपने पूरे ज्ञान का प्रदर्शन करना भी हिकमत नहीं है, बल्कि बुद्धिमानी यह है कि श्रोताओं की जरूरतों, समझने की क्षमता और समय एवं परिस्थिति के अनुसार बातचीत की जाए।

उन्होंने आगे कहा कि वक्तृत्व कला में स्थान, समय, श्रोताओं का मानसिक स्तर और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। एक प्रभावशाली वक्ता वही होता है, जो हालात और श्रोताओं की ज़रूरत के अनुसार अपना संदेश प्रस्तुत करे, ताकि उसकी बात लोगों के लिए समझने योग्य, लाभदायक और प्रभावशाली हो।
अल्लामा मोहम्मद इरफान भोल नजफी ने प्रमाणिक ज्ञान की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वक्तृत्व कला के लिए ज्ञान का भंडार होना जरूरी है, लेकिन केवल जानकारी इकट्ठा कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका प्रमाणिक और विश्वसनीय होना भी आवश्यक है। खतीब की जिम्मेदारी है कि मिम्बर पर कोई बात बयान करने से पहले उसकी जांच-पड़ताल करे और जहां तक संभव हो, विश्वसनीय विद्वतापूर्ण स्रोतों से उसकी पुष्टि करे, ताकि गैर-प्रमाणिक रिवायतों और गलत जानकारियों के प्रसार से बचा जा सके।
उन्होंने वक्तृत्व कला के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि खिताबत केवल सुंदर शब्दों, ऊंची आवाज या बोलने के अंदाज का नाम नहीं है, बल्कि इसका मूल उद्देश्य श्रोताओं तक सही संदेश पहुंचाना, उनका वैचारिक और नैतिक प्रशिक्षण करना तथा उन्हें वास्तविक तथ्यों की ओर आकर्षित करना है। इसलिए एक खतीब को अपनी बातचीत में शैक्षणिक परिपक्वता, वैचारिक दूरदर्शिता और नैतिक जिम्मेदारी का प्रदर्शन करना चाहिए।

अंत में इस बात पर जोर दिया गया कि ज्ञान प्राप्त करना अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन ज्ञान को सही ढंग से समझना, उस पर अमल करना और उसे उचित तरीके से दूसरों तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। एक जिम्मेदार खतीब वही है, जो अपने ज्ञान, व्यक्तिगत आचरण, सही वक्तृत्व शैली और प्रभावशाली प्रचार के माध्यम से समाज के सुधार और नैतिक प्रशिक्षण का माध्यम बने।
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