۲۶ تیر ۱۴۰۳ |۹ محرم ۱۴۴۶ | Jul 16, 2024
نجف

हौज़ा / नजफ अशरफ,ह़ज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा अलह़ाज ह़ाफ़िज़ बशीर हुसैन नजफ़ी ने अज़ादारी और मजालिस के हवाले से मोमनिन को अहम पैगाम दिया हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,नजफ अशरफ,ह़ज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा अलह़ाज ह़ाफ़िज़ बशीर हुसैन नजफ़ी ने अज़ादारी और मजालिस के हवाले से मोमनिन को अहम पैगाम दिया हैं।

पैगाम कुछ इस प्रकार है:

1. अज़ादारी के क़याम और मजालीसे अज़ा आयोजित करते समय कुछ बातों का ध्यान रखें
यह महत्वपूर्ण है कि मजालीसे अज़ा मुकम्मल ख़ुलूस और ख़ुदा के तक़र्रूब के लिए मुनअक़िद की जाएं।
मजालिस में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग जगह की व्यवस्था की जानी चाहिए और इसी तरह महिलाओं के लिए विशेष मजालिस की व्यवस्था की जानी चाहिए जिसमें केवल महिलाएं मौजूद हों।
यह वाजिब है कि मजालिस और अज़ादारी में क़साएद, नौहे, शआएर और बैनर केवल हुसैनी और दीनी होने चाहिए, अज़ादारी और इन मामलों को सांसारिक उद्देश्यों और भौतिक या राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करना जायज़ नहीं है। इसलिए, जो कोई भी हुसैनी शआएर और हुसैनी इन्किलाब को सांसारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने का साधन बनाता है, वह अपने कार्यों से  हुसैनी इन्किलाब और क़ियामे हुसैनी का अपमान करता है और शिया के मुक़द्दिसात के  उल्लंघन का साहस करता है।

2. मजालिस और मातमी जुलूसों का समय इस प्रकार निर्धारित किया जाना चाहिए कि वे दीन के बुनयादी वाजेबात, उदाहरण के लिए: नमाज़ आदि के साथ टकराव न हो , इसलिए ज़रूरी है के अज़ादारी की इबादत को नमाज़ के अव्वल वक़्त से पहले मुकम्मल कर लिया जाये या फिर अव्वल वक़्त में नमाज़ अदा करने के बाद शुरू किया जाए , और अगर अज़ादारी के जुलूस के दौरान नमाज़ का वक़्त हो जाता है तो अंजुमन के मुनतज़मीन के लिए ज़रूरी है के वो जुलूस को रोक कर वहीं अव्वल वक़्त में नमाज़ अदा करें और फिर से अज़ादारी की अज़ीम इबादत में मशग़ूल हो जाएं ताकि दुनिया वाले अज़ादारी, हुसैनी शआएर और हुसैनी इन्किलाब के असली लक्ष्य और उद्देश्यों को जान सकें।

3. सैय्यद अल-शोहदा (अस) ने सिर्फ और सिर्फ दीन और सैय्यद अल-मुर्सलीन (स अ व आ व) की शरीअत की स्थापना और संरक्षण के लिए इतने मसाएब सहे और महान बलिदान दिए
सैय्यद अल-शोहदा (अस) फ़रमाते हैं
’’ ألا ترون ان الحق لا یعمل بہ و ان الباطل لا یتناھی عنہ لیرغب المؤمن فی لقاء اﷲ محقا‘‘ 
अर्थात्: क्या तुम नहीं देख रहे कि हक़ पर अमल नहीं किया जा रहा है और किसी को बातिल से रोका नहीं जा रहा है ताकि मोमिन अल्लाह से हक़ीक़ी मुलाक़ात को दोस्त रखे। 
जो शख़्स भी नमाज़ को छोड़ता है चाहे वो शआएरे हुसैनी की ख़ातिर ही क्यों न हों उसका सैय्यद अल-शोहदा (अस) के ख़ुद्दाम और नौकरों के साथ कोई ताल्लुक़ नही है  क्योंकि इमाम हुसैन (अस) ने शरीयत को बचाने और स्थापित करने के लिए सारी कुर्बानियां दीं और हमारी अज़ादारी का मकसद भी हुसैनी इन्किलाब  और शरीयत को कायम रखना है और नमाज़ शरीयत का अहम और बुनयादी रुक्न है इसलिए, जो कोई नमाज़ छोड़ता है वह अज़ादारी के मूल उद्देश्य को नष्ट करना चाहता है।

4. शआएरे  हुसैनी का क़याम चाहे जिस सूरत में भी हो अगर वो शरीयत के ख़िलाफ़ नहीं है तो ऐसा करना न सिर्फ शरीयत की नजर में पसंदीदा काम है, बल्कि शरीयत हम से इसकी मांग भी करती है और मासूमीन (अस) ने भी इसकी बहुत ताकीद की है।
मुसलमानों! इस महान कार्य के लिए जल्दी करो ताकि हम पैगंबरों, इमामों, हज़रत ज़हरा (स अ) और फरिश्तों के साथ इस कार्य में भाग ले सकें और इमाम ज़माना (अ.स.) की ख़िदमत में शोक व्यक्त करें और इस तरीके से आलमी इन्किलाब बरपा करने के लिए इमाम ज़माना (अ.स.) को मददगार मुहैया करें।

5. ज़रूरी है के मासूमीन (अस) की तरफ़ मंसूब तस्वीरों से बचा जाए हमारे नज़दीक जीरूह की मुसव्वरी हराम है और तस्वीर बना कर उसकी निस्बत मासूमीन (अस) की तरफ़ देना उससे बढ़ कर हराम है इसलिए ज़रूरी है के मातमी जुलूसों और मजालिसे अज़ा को ऐसे कामों से पाक रखा जाये जिससे इमाम हुसैन (अस) के मुक़द्दस इन्किलाब और उनकी क़ुर्बानियों की तौहीन हो।

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