हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, बुशहर के दीर शहर में गुमनाम शहीदों की मज़ार के पास इस्लामी गणतंत्र दिवस के समारोह में हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद अली हुसैनी ने कहा,ईरानी लोगों का सपना स्वतंत्रता, आज़ादी और इस्लामी गणतंत्र का नारा था जिसे 12 फरवर्दीन 1358 (1979) में साकार किया गया।
उन्होंने कहा कि लोगों की ताग़ूत (शाही) शासन के खिलाफ़ लड़ाई का मोर्चा मस्जिदें और हुसैनियाएं थीं उन्होंने जोर देकर कहा,लोगों के नारे धार्मिक थे और उनकी लड़ाई का चरमोत्कर्ष भी धार्मिक दिनों में होता था। साथ ही लोगों का नेता भी एक मरजा-ए-तकलीद था, जो दर्शाता है कि हमारा समाज इस्लामी मूल्यों को चाहता था।उन्होंने आगे कहा,लोग चाहते थे कि देश का शासन और शासक उनके द्वारा चुने जाएँ, न कि विदेशियों द्वारा थोपे जाएँ।
हुज्जतुल इस्लाम हुसैनी ने कहा कि इस्लामी गणतंत्र दिवस धार्मिक लोकतंत्र" का प्रतीक है और इस्लाम व जनता का शासन साथ-साथ चल सकता है, क्योंकि यहाँ के लोग इस्लाम से प्यार करते हैं और चाहते हैं कि उनके नेता धर्म के दायरे में शासन करें।
उन्होंने इमाम ख़मेनेई रह.का हवाला देते हुए कहा,इमाम ने जनमत संग्रह कराकर दुनिया को यह संदेश दिया कि लोगों की राय सर्वोपरि है। ईरानी समाज को गर्व है कि वह एक ऐसी व्यवस्था में रहता है जो किसी विदेशी के दबाव में नहीं झुकती।
उन्होंने ईरान की सैन्य ताक़त का उदाहरण देते हुए कहा,एक समय हमारे पास तारों की बाड़ तक नहीं थी, लेकिन आज हमारे सटीक मिसाइल हमलों ने अमेरिकी सैन्य अड्डे 'अयन अल-असद' को ध्वस्त कर दिया और इज़राइल को उसकी सीमाओं तक पीछे धकेल दिया।
अंत में, उन्होंने इस साल के नारे लोगों की भागीदारी पर ज़ोर देते हुए कहा,अर्थव्यवस्था जन-आधारित होनी चाहिए जब तक लोग मैदान में हैं, दुश्मन कुछ भी गलत नहीं कर सकता। आज भी इस्लामी व्यवस्था का समर्थन जनता करती है और लोग नेतृत्व के साथ खड़े हैं।
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