हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , मौलवी शीरज़ादी ने क़ुरआन करीम की हर तरह की बेअदबी की सख़्त अल्फ़ाज़ में मज़म्मत की और कहा कि क़ुरआन अल्लाह तआला का कलाम है, और उसका हर लफ़्ज़ तमाम मुसलमानों के लिए मुक़द्दस और क़ाबिल-ए-एहतराम है।
उन्होंने कहा कि अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि कुछ पश्चिमी समाजों में आज़ादी ए इज़हार-ए-राय की आड़ में इस्लाम की मुक़द्दस किताब की तौहीन की जाती है, जबकि ऐसा अमल किसी भी सूरत में आज़ादी नहीं कहा जा सकता। यह ग़ैर-इंसानी रवैये और अख़लाक़ी पतन को दिखाता है।
इमाम जुमआ मरिवान ने कहा कि दूसरे मज़हबों और धर्मों की मुक़द्दस चीज़ों की तौहीन को आज़ादी-ए-राय कहना बिल्कुल ग़लत है। यह दरअसल क़ानून-शिकनी और बिगड़े हुए समाज की निशानी है।
उन्होंने पुराने वाक़ेआत का हवाला देते हुए कहा कि पिछले सालों में भी कुछ लोगों ने सियासी मक़सद के लिए क़ुरआन करीम की बेअदबी की कोशिश की, लेकिन सबने देखा कि ऐसे काम करने वालों का अंजाम बहुत बुरा हुआ, क्योंकि क़ुरआन की तौहीन हमेशा सख़्त नतीजे लाती है।
आख़िर में मौलवी मुस्तफ़ा शीरज़ादी ने कहा कि आज के इस बेचैन और मतलब-खो चुके दौर में क़ुरआन करीम इंसानियत के लिए हिदायत और रहनुमाई का सबसे बड़ा ज़रिया है।
यह हक़ और बातिल के बीच साफ़ फ़र्क़ बताता है। उनके मुताबिक, आज की सदी में भी क़ुरआन इंसानियत की पूरी रहनुमाई करता है, और जो लोग उसकी बेअदबी करते हैं, वे असल में शैतान के बहकावे में आए हुए और तारीख़ के गुमराह लोग हैं।
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