हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह मूसा मौसवी इस्फ़हानी ने माहे मुबारक रमज़ान की आमद पर तबरीक पेश की और इस महीने को ख़ुदसाज़ी, इरादा की मज़बूती और तक़वा-ए-इलाही के हुसूल का इलाही मौक़ा क़रार दिया। उन्होंने कहा कि रोज़ादारी रूह की तरबियत और इंसान को नफ़्सानी ख़्वाहिशात के मुक़ाबले में ताक़तवर बनाने में बुनियादी किरदार रखती है।
उन्होंने आयत-ए-शरीफ़ा
«یا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ»
का हवाला देते हुए कहा कि रोज़े का असल फ़लसफ़ा तक़वा तक पहुंचना है।
ख़ुदा-ए-मुतआल ने इस फ़रीज़े को वाजिब क़रार देकर इंसान को 30 रोज़ा मश्क़ के ज़रिए नफ़्स पर क़ाबू और गुनाह के मुक़ाबले में सब्र व इस्तिक़ामत की तालीम दी है।
प्रमुख ए हौज़ा इल्मिया हमदान ने कहा कि रोज़ादारी इंसान के इरादे को मज़बूत करती है। रोज़ेदार सीखता है कि वह अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात को कैसे मैनेज करे। यह महारत सिर्फ़ मआनवी सफ़र में ही नहीं, बल्कि उसकी फ़र्दी, समाजी ज़िंदगी और दुनिया व आख़िरत से मुतअल्लिक़ फ़ैसलों में भी तअय्युन-कुन किरदार अदा करती है।
आयतुल्लाह मौसवी इस्फ़हानी ने कहा कि रोज़े का हक़ीक़ी समर, यानी इरादा और इस्तिक़ामत की क़ुव्वत, इंसान की इलाही शख़्सियत की तश्कील का ज़रिया बनती है और उसे बंदगी के रास्ते पर गामज़न होकर कमाल-ए-हक़ीक़ी तक पहुंचने के लिए तैयार करती है।
उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि तमाम लोग माहे मुबारक रमज़ान की मआनवी बरकात से ईमान की तरक़्क़ी, तहज़ीब-ए-नफ़्स और ख़ुदा-ए-मुतआल से क़ुर्ब हासिल करने में भरपूर फ़ायदा उठाएं।
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