हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन मुर्तज़ा आग़ा तेहरानी ने माह-ए-मुबारक रमज़ान की तक़रीब में, जो आस्तान-ए-मुक़द्दस मस्जिद जमकरान में मुनअक़िद हुई, इस बात की तरफ़ इशारा किया कि दुआ-ए-इफ्तिताह हज़रत वली-ए-अस्र(अज) की जानिब से शियों तक पहुँची है। उन्होंने कहा कि यह दुआ नुव्वाब-ए-अरबा के ज़रिये, जिनमें मोहम्मद बिन उस्मान (इमाम ज़माना(अज) के दूसरे नायब) भी शामिल हैं, शियों के हवाले की गई और यह गहरे तौहीदी व तरबियती मआरिफ़ पर मुश्तमिल है।
उन्होंने फ़िक्रे اللهم اَذِنتَ لی فی دُعائک و مسألَتِک»” की तशरीह करते हुए कहा कि हम में से बहुत से लोग दुआ को एक मामूली अमल समझते हैं, जबकि ख़ुदा-ए-मुतआल से हमकलाम होने की इजाज़त मिलना ही उसकी ख़ास इनायत है। जिस तरह किसी बड़ी शख़्सियत से मुलाक़ात फ़ख़्र समझी जाती है, उसी तरह बारगाह-ए-इलाही में हाज़िरी की इजाज़त भी बेमिसाल एज़ाज़ है।
उन्होंने दोहराया कि क़ुरआन आगाह करता है इंसान जब ख़ुद को बेनियाज़ समझता है तो सरकशी करता है। कुछ सख़्तियाँ दरअस्ल इंसान को अपनी हक़ीक़त पहचानने और ख़ुदा की तरफ़ पलटने का मौक़ा देती हैं।
उन्होंने हिदायत-ए-आम और हिदायत-ए-ख़ास का फ़र्क़ बयान करते हुए कहा कि अंबिया तमाम लोगों की हिदायत के लिए आए, मगर ख़ास इनायत उन लोगों के लिए है जो अपने इख़्तियार से बंदगी का रास्ता चुनते हैं। जिस तरह एक आम दावत में कुछ लोग ही बुलंद मरातिब तक पहुँचते हैं, उसी तरह राह-ए-सुलूक में भी अहल-ए-इजाबत में से ख़ास अफ़राद मुंतख़ब होते हैं।
उन्होंने कहा कि ज़ालिमों को दी जाने वाली मुहलत, रज़ामंदी की निशानी नहीं, बल्कि इम्तिहान का मौक़ा है। आख़िरकार हर शख़्स अपने आमाल का नतीजा देखेगा।
आख़िर में उन्होंने सैय्यदुश्शोहदा हज़रत इमाम हुसैन(अ) की ख़िदमत में सलाम पेश करते हुए कहा कि इमाम हुसैन(अ) से मोहब्बत और तवस्सुल शिफ़ाबख़्श और निजातबख़्श है। उन्होंने ताकीद की कि इस माह-ए-मुबारक से ज़ुहूर-ए-इमाम(अज) की क़ुर्बत हासिल करने के लिए फ़ायदा उठाना चाहिए।
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