हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, फ़ख़रूल मुजतहेदीन, वहीदुल अस्र, फ़रीदुद्दहर, अफ़क़हुल फ़ुक़हा, अल्लामा सय्यद अबुल हसन रिज़वी कश्मीरी उर्फ़ अब्बू साहब सन 1260 हिजरी बरोज़ जुमा लखनऊ के इल्मी माहौल में पैदा हुए। आपके वालिद, अल्लामा सय्यद अली शाह कश्मीरी, अपने वक़्त के जलीलुलक़द्र आलिम और हिन्दुस्तान के मुम्ताज़ औलमा में शुमार किये जाते थे।
अल्लामा ने इब्तेदाई तालीम अपने वालिदे मोहतरम ही से हासिल की जिन्होंने इबादत, रियाज़त और इल्मी नूर से फ़र्ज़न्द की तरबियत की। वह नमाज़े शब के लिये बेदार होते तो बेटे को मुतालए के लिये जगाते और तहज्जुद के बाद सबक पढ़ाते। अभी अल्लामा की उम्र सिर्फ नौ बरस की थी कि साया ए पदरी से महरूम हो गये। इस सदमे के बाद आपने दीगर उस्ताद से रुजू किया और महज़ चौदह साल की उम्र में इल्मी कमाल की ऐसी मेराज हासिल की कि बड़े बड़े अहले इल्म हैरतज़दा रह गये।
अक़ाइद व कलाम की तालीम जनाब सुलतानुल औलमा सय्यद मुहम्मद से हासिल की जब कि फ़िक़्ह व उसूल की बारिकियों में मुम्ताज़ुल औलमा सय्यद मुहम्मद तक़ी से कस्बे फ़ैज़ किया। दौरान ए दरस अल्लामा की ज़ेहानत और मुतालए की गहराई का यह आलम था कि इल्मी मुबाहिस बाज़ औक़ात दो-दो दिन जारी रहते और उस्ताद को भी तैयारी की ज़रूरत पेश आती।
जवानी ही से आप ज़ुह्द व तक़्वा में बे नज़ीर थे। उनकी तक़रीर, दरस और वाज़ में असरअंगेज़ी नुमायां थी। फ़िक़्ह व उसूल में आपने मुताअद्दिद इस्तेदलाली रसाइल तहरीर किये जिनकी मुम्ताज़ुल औलमा ने तहसीन की। मुफ़्ती मुहम्मद अब्बास मूसवी भी अपने इस शागिर्द ख़ास पर फ़ख़्र करते थे। जब वह किताब "शरीअते गर्रा" पर नज़रेसानी कर रहे थे तो मुतअद्दिद औलमा से मशवरा लिया मगर अल्लामा अबुलहसन की खामोशी ही मतालिब की सेहत की दलील समझी जाती।
इस दौर के मुम्ताज़ तुलाब व अफ़ाज़िल आपके दरस में शिरकत को फ़ख़्र समझते थे। आपके नामवर शागिर्दों में सय्यद मुरतज़ा अलमुल हुदा, मौलवी सय्यद मुहम्मद सादिक़ खुजवी, नजमुल औलमा सय्यद नजमुल हसन रिज़वी, ज़हीरुल औलमा सय्यद आबिद हुसैन भीकपुरी, मौलवी सय्यद नज़ीर हसन भीकपुरी, मौलवी सय्यद सिब्ते हसन जौनपुरी, मौलवी सय्यद मोहम्मद अली अज़ीमाबादी और मौलवी सय्यद मोहम्मद हुसैन नौगानवी शामिल हैं।
आपके मवाइज़ बहुत दिलनशीं होते जिन्हे उस वक़्त के अकाबिर औलमा के मवाइज़ पर फ़ौक़ियत दी जाती थी। मुमताज़ुल औलमा सय्यद मोहम्मद तक़ी अकसर जुमा के ख़ुतबे और वाज़ के लिये आपको अपनी जगह भेजते थे, हालाँकि उस वक़्त आपकी उमर सिर्फ़ बाईस बरस थी।
एहतियात और इख़लास का यह आलम था कि बुलूग़ से क़ब्ल ही चार सौ रुपये जमा किये। बुलूग़ के बाद एक शख़्स ने क़र्ज़ लिया मगर वापस न किया, इसके बावजूद 1283 हिजरी में सिर्फ़ "एहतिमाल ए वुजूबे ए हज" पर हज का अज़्म फ़रमा लिया, हालाँकि आपके उस्ताद इस शर्त पर हज वाजिब नहीं समझते थे।
इख़लास का एक दिलनशीं मंज़र उस वक़्त देखने में आया जब ज़िलहिज्जा के आख़िरी अय्याम में आप मुतालेए में मशगूल थे और ख़ुद्दाम मजलिस ए अज़ा की तैयारी कर रहे थे। आपकी निगाह ताज़िये के सामान पर पड़ी तो चेहरा फ़क़ हो गया। पूछने पर फ़रमाया: मुझे डर है कि कहीं इख़लास छिन न जाये।
अल्लामा ने 1289 हि में नवाबीने लखनऊ की मदद से बनामे इमानीया एक मदरसा क़ायम किया, जो इब्तिदा में "हुसैनया ए मुम्ताज़ुल औलमा" में क़ायम हुआ। बाद अज़ां मदरसा मुख़्तलिफ़ मक़ामात पर मुन्तक़िल होता रहा, यहाँ तक कि इसी इल्मी तहरीक की बदौलत "मदरसा नाज़िमिया" और "मदरसा सुल्तानिया" जैसे दो बड़े इदारे वजूद में आये, जो आज भी इल्मे दीन के फ़रोग़ में मस्रूफ़े अमल हैं।
ताहम जब आपके क़ायम कर्दा मदरसे की सरगर्मियाँ मोक़ूफ़ हो गयीं, तो अल्लामा को इस पर गहरा रंज हुआ, इसी सदमे के बाइस उन्होंने इराक़ हिजरत करने का फ़ैसला किया।
इल्मी मस्रूफ़ियात के बावजूद अल्लामा ने तसनीफ़ व तालीफ़ के मैदान में भी क़लमी जौहर दिखाये और कसीर तादाद में इल्मी आसार छोड़े जिनमें: उनकी तसानीफ़ में "शरहे फ़ुसूल" (इल्मे कलाम), "शरह अरबईन" (चालीस अहादीस की शरह), हवाशी बर रसाइल ए शैख़ मुर्तज़ा, तालीक़ात बर क़वानीनुल उसूल, और "रिसाला दर मसअला ए निजासत ए माए क़लील" जैसे इल्मी व फ़िक्री शहपारे के नाम लिये जा सकते हैं।
अल्लाह ने आपको चार फ़र्ज़न्द अता फ़रमाये: जिन्हे सय्यद ज़ैनुल आबेदीन, आयतुल्लाह सय्यद मोहम्मद जाफ़र, आयतुल्लाह सय्यद मोहम्मद बाक़िर, और अल्लामा सय्यद मोहम्मद हादी के नाम से पहचाना जाता है।
आख़िरकार यह रोशन इल्मी चराग़ 24 मुहर्रम 1313 हिजरी में कर्बलाए मुअल्ला में ख़ामोश हो गया। कर्बला में शान से तशीये जनाज़ा हुई। नमाज़ ए जनाज़ा आपके फ़र्ज़न्द आयतुल्लाह मोहम्मद जाफ़र ने पढ़ाई और हरमे इमाम हुसैन अ: के बाबे ज़ैनबिया के क़रीब, मक़बरा नवाब नवाज़िश अली काबुली में सुपुर्द ए ख़ाक कर दिया गया।
माखूज़ अज़: नुजूमुल हिदाया, तहक़ीक़ो तालीफ़: मौलाना सैयद रज़ी ज़ैदी फंदेड़वी जिल्द-10 पेज-136 दानिशनामा ए इस्लाम इंटरनेशनल नूर माइक्रो फ़िल्म सेंटर, दिल्ली, 2024 ईस्वी।
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