रविवार 12 जुलाई 2026 - 06:19
इस्लाम: प्रेम और मानवता का धर्म, यहाँ तक कि युद्ध के मैदान में भी

अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) ने एक आदेश-पत्र में युद्ध की स्थिति में भी मानवीय नैतिकता और अधिकारों का पालन करने के सिद्धांत बताए हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, निम्नलिखित रिवायत "नहजुल बलाग़ा"  किताब से ली गई है। इस रिवायत का पाठ इस प्रकार है:

قال امیرالمؤمنین علیه السلام:

فَإِذَا کَانَتِ الْهَزِیمَةُ بِإِذْنِ اللَّهِ فَلَا تَقْتُلُوا مُدْبِراً، وَلَا تُصِیبُوا مُعْوِراً، وَلَا تُجْهِزُوا عَلَی جَرِیحٍ، وَلَا تُهِیجُوا النِّسَاءَ بِأَذًی، وَإِنْ شَتَمْنَ أَعْرَاضَکُمْ وَسَبَبْنَ أُمَرَاءَکُمْ.

अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) ने फरमाया:

"जब अल्लाह की अनुमति और सहायता से विजय प्राप्त हो जाए, तो जो लोग पीठ फेरकर भाग रहे हों उन्हें मत मारो, जो असहाय और लड़ने में असमर्थ हों उन्हें नुकसान मत पहुँचाओ, घायल व्यक्ति का वध मत करो, और महिलाओं को किसी प्रकार की पीड़ा या कष्ट मत दो, चाहे वे तुम्हारे सम्मान के विरुद्ध अपशब्द कहें या तुम्हारे सेनापतियों को बुरा-भला कहें।"

 नहजुल बलाग़ा, पत्र संख्या 14।

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